वर्तमान में प्रदेश में सबसे बड़ी मांग तृतीय श्रेणी शिक्षकों के ट्रांसफर की है जिसको लेकर शहीद स्मारक पर पिछले दो दिन से शिक्षक साथी धरने पर है, अभी तक सरकार और शिक्षकों के बीच बात नहीं बन पाई है।
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@JVVNLCCare टोंक जिले के सोनवा गांव में एक एक वार्ड में चार दिन से लाइट नहीं आ रही है बिगर समस्या की समाधान की ही कंप्लेंट को बंद कर दिया रिजॉल्व कर दिया जाता है कृपया समस्या का समाधान करें 2 दिन से कंप्लेंट करने के बाद भी कुछ नहीं हो रहा है
@JVVNLCCare प्रिय उपभोक्ता, आपका शिकायत क्रमांक 2113120007336 दिनांक 04/06/2026 02:29 PM है। विद्युत सम्बन्धित शिकायत एवं अन्य सुविधाओं के लिए बिजली मित्र ऐप का प्रयोग करें।
प्रिय उपभोक्ता, आपका शिकायत क्रमांक 2113120007400 दिनांक 05/06/2026 06:59 AM है।
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हमारी भी सुनो सरकार: राजस्थान शिक्षा विभाग में 'बिन विदाई की शादी' और यथास्थान का सर्कस
राजस्थान शिक्षा विभाग में इन दिनों 'वर्क फ्रॉम होम' का एक नया और अतरंगी प्रशासनिक वर्जन चल रहा है। इसे तकनीकी भाषा में 'यथास्थान कार्यग्रहण' कहते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप में यह किसी चमत्कार से कम नहीं—पद बदला, रुतबा बढ़ा, वेतन बढ़ा, पर कुर्सी वही पुरानी है!
1. अजब पदोन्नति की गजब कहानी
हाल ही में करीब 12,000 व्याख्याताओं (Lecturers) की DPC (विभागीय पदोन्नति समिति) हुई। आदेश जारी हुए, तो लगा कि व्यवस्था बदलेगी, लेकिन विभाग ने 'बिन फेरे हम तेरे' की तर्ज पर 'बिन विदाई हम वहीं' का खेल शुरू कर दिया।
आमतौर पर पदोन्नति का अर्थ होता है—नई जिम्मेदारी और नया कार्यक्षेत्र। लेकिन यहाँ प्रशासनिक नियम ही 'यू-टर्न' ले चुके हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी विवाह में वरमाला हो गई, फेरे पड़ गए, पर दुल्हन की विदाई ही नहीं हुई। कहने को तो वह 'विवाहिता' (पदोन्नत) है, पर बैठी अपने पीहर (पुरानी स्कूल) में ही है।
2. एक कुर्सी, तीन 'साहब' और प्रशासनिक मोहपाश
13 अप्रैल को व्याख्याता बने शिक्षक 20 अप्रैल को उसी पुरानी मेज पर जा बैठे, जहाँ वे कल तक सेकंड ग्रेड थे। विडंबना देखिए:
वाइस प्रिंसिपल और प्रिंसिपल पहले से ही इसी 'मोहपाश' में बंधे हैं।
हालात ये हैं कि शहरों के स्कूलों में 'यथास्थान' के चक्कर में एक ही कुर्सी पर दो-दो, तीन-तीन अधिकारी एक-दूसरे का मुँह ताक रहे हैं।
दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों के सैकड़ों स्कूल 'नेतृत्व विहीन' (बिना प्रिंसिपल) पड़े हैं।
सवाल यह है: जब काम वही करना है और जगह वही रहनी है, तो इस कागजी पदोन्नति का औचित्य क्या है? क्या यह केवल वेतन बढ़ाने का एक खर्चीला तरीका है?
3. नीतिगत 'अपंगता' या 'कछुआ चाल'?
इस हास्यास्पद स्थिति के लिए शिक्षक जिम्मेदार नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग की अदूरदर्शी नीतियां जिम्मेदार हैं। विभाग ने DPC की फाइलें तो दौड़ाईं, लेकिन जब बात पोस्टिंग की आई, तो अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए।
यह सरकार की कैसी प्रशासनिक कुशलता है जो 12,000 लोगों को प्रमोट तो कर देती है, लेकिन उन्हें सही जगह तैनात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती? एक तरफ रिक्त पदों का आंकड़ा दिखाकर वाहवाही लूटी जाती है, तो दूसरी तरफ धरातल पर 'यथास्थान' का झुनझुना थमा दिया जाता है।
4. रनवे पर खड़ा 'हवाई जहाज' और छात्र का भविष्य
यह नीति नहीं, बल्कि नीतिगत दिवालियापन है। इसे यूँ समझिए: आपने 'फ्लाइट' का पूरा टिकट कटाया है, लेकिन जहाज रनवे पर खड़ा होकर ही उड़ान भरने का नाटक कर रहा है। ऊंचे पद का भारी-भरकम वेतन तो दिया जा रहा है, लेकिन उस पद की उपयोगिता शून्य है।
नुकसान किसका?
इस पूरे सर्कस में अंततः नुकसान सिर्फ उस छात्र का हो रहा है, जिसके स्कूल में पद तो कागजों पर भरे हैं, लेकिन शिक्षक विभाग की दिशाहीन फाइलों में 'यथास्थान' कैद हैं।
निष्कर्ष: व्यवस्था का जनाजा या रसूखदारों का खेल?
राजस्थान का शिक्षा विभाग आज रसूखदारों के आगे नतमस्तक है या अपनी अक्षमता छिपा रहा है। खाली पदों के जाल में विभाग खुद ही फंस चुका है। यह रवैया साफ दर्शाता है कि विभाग को शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा 'आंकड़ों की बाजीगरी' में दिलचस्पी है।
सरकार को अब सोचना होगा—क्या शिक्षा विभाग अपनी रीढ़ की हड्डी को गिरवी रखकर केवल व्यवस्था का जनाजा निकालेगा, या फिर इन 'विवाहिताओं' (पदोन्नत शिक्षकों) को उनकी असली कर्मस्थली तक पहुँचाने का साहस दिखाएगा?
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