मुझे याद है वो दिन।
अचानक सभी अपने टेरेस से शोर मचाने लगे। मैं एक किताब पढ़ रही थी, रिश्तेदारों ने अपने छत से शंख बजाना शुरू किया। मुझे समझ नहीं आया था यह सब क्यों? मुझे बाद में पता चला कि ऐसा आह्वान किस्मतवाले ने किया था।
तुम सिने जगत के पागलों के दीवाने हो वे किसी मूर्ख़ के।
मेरे प्यारे दोस्तों सोचा तो नहीं था कि जीवन में ये दिन भी आएंगे, मुझे इस तरह की बेबसी महसूस होगी, पुलिस पर दबाव आपके सामने है।
ये बात सच है कि मेरी लड़ाई अकेले मेरी नहीं रह गई, ये कहानी बहुत सी अनगिनत बच्चियों की है, ZEE जैसे बड़े संस्थान से लड़ने के लिए न तो मेरे पास पैसे हैं और न ही उतना बड़ा रसूख-ताक़त.
मेरी अपील है कि आप मुझे आर्थिक मदद करें, अब मुझे कानूनी मदद लेनी होगी, इस लड़ाई मे मेरा साथ दें, मैं जल्द लड़कियों के लिए एक LEGAL FIRM शुरु करूंगी जिससे की हम अन्य बच्चियों को भी काऩूनी मदद मुहैया करा सकें।
आपके साथ का इंतज़ार रहेगा, मैं आपके साथ अपनी अकाउंट DETAILS साझा कर रही हूं ताकि आप मेरी मदद कर सकें।
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NOTE-मैं हर TRANSACTION DETAIL आप लोगों के साथ साझा करती रहूंगी।
सिंधु घाटी बनाम हिन्दू घाटी ..
तो पहले बताइये कि सिंधु घाटी के अवशेषों को जब आपने बचपन मे पढ़ा, तो क्या समझा था? आपने सवाल भी परीक्षा में हल किया होगा-
सिंधु घाटी के शहरों के प्रमुख गुण बताइये।
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उत्तर लिखा- यहां अन्न के गोदाम थे, बंदरगाह थे, समकोण पर काटती सड़कें, उनके किनारे दोनों तरफ जल निकासी की नाली..
स्नानागार थे, बाजार थे, प्रशासनिक शहर अलग था, आम शहर अलग। सीलें थी, नर्तकियां थी, बैलगाड़ी थी।
तो क्या सिंधु घाटी सभ्यता बड़े बड़े गांव की सभ्यता थी??
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शहरीकरण एक सभ्यता का पिनाकल है- सबसे उत्कृष्ट फल। शहर का मलतब आसपास के गांवों का एक केंद्र।
जो आसपास के गांव, बस्तियो, दस्तकारों और खेतों की उपज का एक्सचेंज करने वाला इंटरफेस।
शहर में खेत नही होते।
तब फैक्ट्री भी नही होती थी।
सब कुछ आसपास के गांवों से आता। यहां भंडारण होता, बल्किंग और ग्रेडिंग होती। देश विदेश भेजा जाता।
याने सिर्फ शहर नही, आसपास बडी मात्रा में गांव बसे थे, पूरी व्यवस्था थी। गांव के अवशेष खत्म हो जाते हैं।
शहरों के अवशेष रह गए।
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तो सील बताती है कि हुंडी, याने बैंकिंग सिस्टम चलता था। व्यापार पर चुंगी दी जाती याने, सिटी की एक गवरमेंट थी।
ऑर्गनाइज्ड शहर बताते हैं कि बसाने वाले आर्किटेक्चर समझते थे। जल जनित रोग और स्वास्थ्य से वाकिफ थे।
सामूहिक स्नानागार सोशल मीडिया थे, जहां लोग पानी मे डूबे गपियाते थे। जाहिर है यह निर्माण निजी नही होगा। तो सरकार का ध्यान वेलफेयर पर था।
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तकरीबन सभी शहरों में ईंटों का आकार एक जैसा है। याने कोई सेंट्रल गवरमेंट भी थी।
ये जो बंदरगाह थे, वे नदियों के पास थे, याने नहर खोदकर विशाल तालाब और उसके किनारों पर बंदरगाह बनाने की विद्या, तकनीक, फाइनांस और गवर्मेंट मौजूद थे।
इस तरह आधुनिक युग मे, आप जो वेलफेयर गवरनेन्स से अपेक्षा करते है, वह सब कुछ सिंधु घाटी सभ्यता में दिखता है।
तो मान लीजिये दुनिया जब कांसे और पत्थर से जूझ रही थी, भारत मे एक पूरा विकसित देश मौजूद था।
इसके बाद एकाएक ...
सब कुछ नष्ट हो जाता है।
गायब। वैनीश!!! छू ss
चोले गोयछे!!!
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इतिहास फिर से शुरू होता है। एक नया भारत बनता है, जहां सोसायटी प्रिमिटिव स्टेज में जा चुकी है।
गौ पूजा, यज्ञ हवन, (ऋग्वेद) जादू- टोना (अथर्ववेद) में लौट गई। इनमे जंगल मे बसने वाले छोटे छोटे कबीलों, उनकी बेसिक मिनिमल लाइफ का विवरण मिलता है।
सभ्यता यहां से वह फिर जीरो से शुरू करती है। ग्राम, विश्, जन, जनपद, महाजनपद .. कोई एक हजार साल बाद एक ऑर्गनाइज्ड नगर मिलता है।
बिम्बिसार का पोता उदायिन, मगध की नई राजधानी बसाता है - पाटलिपुत्र..
ऐसा क्या हुआ, जो भारत की सभ्यता एकाएक गायब हो जाती है। जिस जगह पर वह थी, उसी बिंदु पर लौटने में एक हजार साल लगते है??
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सिंधु घाटी सभ्यता में एक दाढ़ी वाले की तस्वीर मिली है। उसकी नाक कटी हुई है। हो न हो, मुझे लगता है कि इस आदमी ने ही जरूर कुछ गड़बड़ की होगी।
कोई लिखित प्रमाण तो नही, मगर इतिहास अगर भविष्य की झलक देता है, तो वर्तमान से भी इतिहास की झलक देखी जा सकती है।
आखिर तीन हजार साल बाद भी एक दाढ़ी वाले को हिन्दू सभ्यता का नाश करते देख ही रहे हैं।
तो सिंधु सभ्यता में ऐसा क्यों नही हो सकता।
दो हजार साल बाद भारत की खुदाई से बन्द पड़े कारखाने, खाली गोदाम, बेतरतीब विशाल शहर, और ऑक्सीजन के अभाव में मरे लोगो के कंकाल से भरे मन्दिर और, भव्य राजप्रासाद ले खंडहर मिलेंगे।
तो उसके साथ एक दाढ़ी वाले की अनगिनत तस्वीरे भी मिलेंगी।
मोर को दाना खिलाते हुए...
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तब इतिहासकारों के सामने प्रश्न होगा। ये कौन सी सभ्यता है??
सिंधु सभ्यता या हिन्दू सभ्यता..
😋
चंडीगढ़ मेयर चुनाव में लोकतंत्र को जिस तरह से कुचला गया है, वह पूरे देश के सामने है। सत्ता के लिए नियम, कानून, लोकतंत्र, इसकी मर्यादा और संविधान को ताक पर रख दिया।
देश की जनता देख रही है कि एक नगर तक की व्यवस्था में भी विपक्ष और जनता की आवाज को खुलेआम दबाया जा रहा है। अगर स्थानीय निकायों में वे इस हद तक जा सकते हैं तो राज्य और केंद्रीय चुनावों में जनता भरोसा कैसे करे? जनता में भारी पैमाने पर संदेह व्याप्त हो रहा है।
गांधी का डैथ वारंट...
वारंट पर दस्तखत खुद गांधी के थे। सजा तय कर दी थी, बस मौत का समय तय होना था।
तय हुआ 25 जून 1934..
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पूना के विश्रामबाग में हत्या तय हुई। डैथ वारंट, याने मौत के उस परवाने को पूना पैक्ट कहते हैं।
इस पैक्ट में गांधी ने, दलितों को मांग से दोगुनी सीट दे दी थी। दूसरे पक्ष, याने अम्बेडकर को सेपरेट इलेक्टोरेट से 65-70 सीट, दलितों के लिए मिलने की आशा थी।
गांधी सेपरेट इलेक्टोरेट के पक्ष में नही थे, क्योकि यह हिन्दुओ को बांटने की बात होती। अगर सीट ही चाहिए, तो हम बिना सेपरेट इलेक्टोरेट के 149 सीट रिजर्व कर देंगे- ऑफ़र किया।
दोगुनी सीट कौन छोड़ता। अम्बेडकर को मानना ही था। समझौता हो गया।
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लेकिन ये समझौता, डैथ वारंट बनना था। एक्स्ट्रा सीटे सवर्ण हिन्दुओ की जेब से जो निकलनी थी।
सवर्णों में गांधी के प्रति चिढ़, गुस्सा और नफरत फैल गयी। पर गांधी को फर्क न पड़ा। वे तो वे जेल से छूटते ही अछूतोद्धार यात्रा पर निकल गए।
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असहयोग आंदोलन, चंपारण, अहमदाबाद मिल, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में आपको पता है। पर क्या आपने कभी खोजा, की गांधी 1932 के बाद, जब भी जेल से बाहर रहे, कौन सा काम करते रहे??
हरिजन यात्रा-
जो मुझसे पूछ रहे थे, गांधी ने दलितों के लिए क्या किया?? सर्च कर लें।
अछूतोद्धार की यात्रा, कम चर्चित पहलू है।दरअसल सीटे, पद और आरक्षण से कुछ नही होता। 70 सालों में आज सैकड़ों दलित और आदिवासी MLA, MP, CM हो चुके। मंत्री,अफसर, पुलिस, प्रोफेसर, कलेक्टर, जज हो चुके।
राष्ट्रपति भी हो चुके। दलित दिल पर हाथ रखकर कहें- क्या सम्मान मिल गया, बराबरी मिली?? पद पर बैठकर भी क्या,अपमान नही झेलते??
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अम्बेडकर को भरोसा था- बिलों, कानूनों और राजनीतिक अधिकारों से स्वर्ण- अवर्ण का भेद मिट जाएगा।
गांधी ने उन्हें यह करने का अवसर दिया- पूना पैक्ट से,और कानून मंत्री बनवाकर। लेकिन गांधी हिंदुओ को बेहतर जानते थे।
जानते थे, भेदभाव सिर्फ बिल से नही मिटेगा। दिल से मिटाना होगा। हरिजन यात्रा, जनता और समाज को यही समझाने की कोशिश थी।
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तो 1933-34 में वो भारत घूम रहे थे। अंग्रेजो के खिलाफ नहीं, दलितों और सवर्णो के बीच सदियो से बनी मानसिक खाई को भरने के लिए।
हिन्दूओ को एकता और बराबरी का संदेश देने के लिए। बेझिझक अपनी सीट पर एक दलित को अपना प्रतिनिधि चुनने का दम देने के लिए..
और इसका नतीजा उन्हें भुगतना था।
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तिलक का अखबार केसरी, उनकी मृत्यु के बाद उनके दामाद के पास था। वे हिन्दू महासभा से जुड़े था।
कल्याण (गीताप्रेस) केसरी और उस समय के सारे अखबार, पत्रिकाएं जो ज्यादातर सवर्णो के हाथ मे थे- गांधी के विरूद्ध गोदी मीडिया बन गए।
पहली बार गांधी को हिन्दू विरोधी बताना, मुसलमान समर्थक कहना, उनकी बातों का अन्यार्थ निकाल कर आलोचना करना शुरू हुआ।
इस नफरत का गढ़ पूना था।और यही उनकी हत्या का पहला प्रयास हुआ। दूसरा, तीसरा, पांचवा भी। छठा सफल प्रयास भी इन्हीं लोगो ने किया।
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गांधी की हरिजन यात्रा सीमित सफल रही। एक तबके में अस्पृश्यता के विरुद्ध जागृति आयी। कम से कम गांधी के भक्त समर्थक, अपने जीवन में इसे उतारने की कोशिश करने लगे।
मद्रास में कांग्रेस सरकार ने "सिविल डिसेबिलिटी एक्ट" खत्म किया। जी हां-वहां कानूनन दलितों को सार्वजनिक सेवाओ का उपयोग करने की मनाही हुआ करती थी।
फिर मालाबार टेंपल एंट्री एक्ट पास किया। इसमे अछूतों को मन्दिर प्रवेश की कानूनी अधिकारिता मिली।
यात्रा की कोशिश, दलितों के भीतर भी ताकत लाने की थी। उनमे शिक्षा, साफ सफाई, और एकता का संदेश दिया। दलित भी नेशनल मूवमेंट, और कांग्रेस से जुड़े।
उस दौर का सबसे बड़ा चेहरा, गांधी उनके पक्ष है-ये बात उन्हें तनकर खड़े होने के लिए बड़ी हिम्मत देती।
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यात्रा के पूना में थी, विश्रामबाग सभा में गांधी जा रहे थे। दो कारें थी। पहली कार आगे निकल गयी। दूसरी कार, रेलवे क्रासिंग की वजह से रुक गयी।
गांधी दूसरी कार में थे। पहली कार पर, गांधी के होने की उम्मीद में,बम फेंका गया। 2 पुलिसवाले, नगरपालिका अध्यक्ष और अन्य सात लोग बुरी तरह घायल हुए।
25 जून 1934 को रेलवे क्रासिंग ने गांधी को बचा लिया। पर 30 जनवरी 1948 को नही।
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गांधी को अंग्रेजो ने नही मारा। मुसलमानो ने नही मारा। बंटवारे, दंगे, 55 करोड़, गलियारा, या किसी और कारण ने नही मारा।
अंग्रेजी सत्ता हटते ही, एक सवर्ण हिन्दू ने मारा। वही हिन्दू जो पिछले 16 साल से उन्हें मारने की फिराक में था।
जी हां- गांधी पर बम फेंकने वाले उस दिन पकड़े नही गए, मगर गांधी के सचिव प्यारेलाल लिखते है कि इस षड्यंत्र में गोडसे शामिल था।
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हां, तो कोई पूछ रहा था, कि गांधी ने दलितों के लिए क्या किया है..
इसे कहते हैं सादा जीवन उच्च विचार 🙏
ये इंसान चाहता तो रेड कार्पेट की जगह यहां स्लीपवैल का गद्दा बिछवा कर भी चल सकता था लेकिन इस इंसान ने बचपन में ग़रीबी देखी है। इसे पता है ग़रीब समंदर किनारे कैसे चलते हैं।🤣🤣
तोता था, और तोती भी ...
बहुत दिनों से साथ थे, रहते थे किसी बाग में, और बाग था शहर में।
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आज खालिद की जमानत की डेढ़ हजारवीं सुनवाई थी। जज साहबान लंच करने चले गये, फिर वापस न आ पाए, इसलिए सुनवाई टल गई। ये खबर उबाऊ है, अतः आप तोता तोती की रोचक कहानी पर लौटिये।
तो तोती आयी थी गांव से, ओबवीयसली मायके की बड़ी याद सताती थी। कई तानों से परेशान तोते ने तय किया, अबकी बार ससुराल तो हो ही आया जाये।
तोतो को ट्रेन का रिजर्वेशन तो करवाना नही होता, सो अगले ही दिन जलपान के पश्चात दोनों उड़ चले।
गांव दूर था, शाम होते होते एक बियाबान में पहुँच गए। सुनसान, वीरानेव रात गुजारना तय हुआ। पर हाल देख तोते ले मुंह से निकल गया- "ये बियाबान तो देखो, लगता है कि जैसे यहां उल्लू रहते हैं"
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कहना था कि एक उल्लू आ गया।
तो उल्लू भाई ने तोते से कहा- डियर तोतू, हमारा इलाका है, आप पहली बार आये हैं। सपत्नीक आये है, तनिक हमारे खोह में पधारिये, जलपान कीजिए। मेहमानवाजी का मौका कीजिए।
भई, भूख तो लगी थी। तोते ने तोती को देखा ,और तोती ने तोते को..
और आंखों ही आँखों मे इशारा हो गया, और डिनर गवारा हो गया। दोनों उल्लू के निवास गए, वहां खाने-पीने और पीने-खाने का उत्तम प्रबंध था।
पार्टी के बाद दोनों ने होस्ट को धन्यवाद दिया, विदा ली, चलने लगे।
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कि उल्लू ने कहा- तोता जी, आप जाओ, लेकिन मेरी पत्नी को कहां ले जा रहे हो?
तोते को काटो को खून नही- "अरे ये क्या बात हुई, ये मेरी पत्नी है, तुम्हारी कैसे हो सकती है। तुम उल्लू हो, उल्लू और तोते का जोड़ क्या?"
उल्लू तो अड़ा था।
बोला- देखो, ये तो मेरी ही बीवी है। और किसी का बाप मुझे इससे जुदा नही करा सकता। तुम्हे दिक्कत हो, तो रिपोर्ट कर दो, कोर्ट चले जाओ।
तोता हक्का बक्का था।
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जब अपराधी न्याय व्यवस्था की दुहाई देने लगे।
जब छोटे मोटे झगड़ों में, बहस में और मीडिया में "रिपोर्ट कर दो" "कोर्ट चले जाओ" "किसी का बाप भी मुझे गिरफ्तार नही कर सकता" जैसे जुमले सुने जाते है, तो जान लीजिए, की पुलिस और ज्यूडिशियरी बिकी हुई है।
नही, आपके प्रदेश की नही, उस उल्लूओ के उस बियाबान की बात कर रहा हूँ।
तो तोते ने रिपोर्ट की, मुकदमा किया। कोर्ट में जज साहब ने सारी दलीलें सुनी, और फैसला दिया -
" तोती किसकी बीवी है, इसका उल्लू के पास कोई सबूत नही, तोते के पास भी नही।
लेकिन, क्योकि ये उल्लू राष्ट्र है, उल्लू की आस्था का मसला है, तोती तो डेफिनेटली उल्लू की ही बीवी है।
ग्रांटेड टू आउल"
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लुटा पिटा तोता थके उदास परों से लौट रहा था, की पीछे उल्लू ने आवाज दी। रुका, पलटकर देखा, तो तोती भी साथ थी।
उल्लू ने तोते के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराकर कहा- अपनी पत्नी अपने साथ लेते जाओ।
तोता स्तम्भित था।
"और सुनो, ये जगह भी पहले एक खूबसूरत बाग थी। पर जब यहां से न्याय खत्म हो गया, बाग उजड़ गया।
बियाबान हो गया, सब चले गए, अब बस उल्लू रहते है"-
उल्लू ने निराशा भरी सांस छोड़ी।
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याद रखो दोस्त- उल्लू बोला
उल्लुओं को कभी दोष न दो। उल्लूओं के रहने से बाग बियाबान नही होते। लेकिन जहां की न्याय व्यवस्था मजाक बन जाये, वहां के शहर, गांव, बगीचे, बाग...
सिर्फ उल्लुओं का घर रह जाते हैं!!!
मेरे पास बाप है..
सदी के महानायक और रुपहले परदे के बादशाह अमिताभ बच्चन महान अभिनेता है। पर रोल में डूब जाने की कला उसने अवश्य ही पोलिटीशयन अमिताभ से सीखी है।
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इलाहाबाद से, तब के कद्दावर पोलिटीशयन, हेमवती नंदन बहुगुणा को हराकर अमिताभ बच्चन 1985 में कांग्रेस के सांसद बने थे।
राजीव गांधी से उनका जुड़ाव पहले ही हो चुका था। वो दौर कुली फ़िल्म के दौरान पेट में लगी मशहूर चोट का था। रिकवर होने के दौरान वे दिल्ली में थे, जब पहली बार राजीव के साथ आंध्र प्रदेश के चुनावी दौरे में साथ गए।
गांधी परिवार से बच्चन परिवार का पुराना नाता रहा। दोनो फैमलीज इलाहाबाद से थीं। हरिवंश आकाशवाणी में कार्यरत थे, और नेहरू जी का सम्मान उन्हें प्राप्त था।
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बहरहाल सांसद अमिताभ, फिल्मों और नेतागिरी में बैलेंस बनाने का संघर्ष करते रहे। मर्द की आधी शूटिंग, और आखरी रास्ता की पूरी शूटिंग सांसद अमिताभ ने की थी।
इस दौरान बोफोर्स स्केंडल में उनका नाम आया। खबर थी कि बोफोर्स की दलाली में अमिताभ के भाई अजिताभ बच्चन ने मोटा माल कमाया है और विदेशों में खूब प्रोपर्टी बनाई है।
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बोफोर्स एक धुएं का बबूला था। स्मोक बम जो राजीव गांधी और उनके नजदीकी समझे जाने वालों को लपेटने के लिए फेंका गया था।
अजिताभ का नाम अमिताभ की वजह से आया, अमिताभ का राजीव से नजदीकी की वजह से। राजनीति की घृणित चाल से व्यथित अमिताभ ने 1987 में सांसदी से इस्तीफा दे दिया।
फिर बच्चन ब्रदर्स ने स्विट्जरलैंड की अदालत मुकदमा ठोक दिया। आखिर चार साल बाद खबर छापने वाले स्विस अखबार ने माफी मांगी।
मगर ये बाद की बात है। भारत मे तो बदनामी का परनाला खुल चुका था। उस वक्त अमिताभ के इस्तीफे को मीडिया ने विपक्ष की जीत, और अगला नम्बर राजीव का होने की तरह दिखाया।
अमिताभ के इस्तीफे को आत्मस्वीकृति की तरह पेश करने से, राजीव पर आरोपो को बल मिला। छवि गिरी, और वे बोफोर्स की बदनामी से कभी मुक्त न हो सके।
सम्भवतः इसके बाद दोनो परिवार के रिश्ते पहले जैसे कभी न हो सके।
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बहरहाल, अमिताभ फिर से फिल्मों में आये। विजय दीनानाथ चौहान बनकर नेशनल अवार्ड जीता, तो लाल बादशाह जैसी मूर्खतापूर्ण फिल्में भी की। गिरती पॉपुलरटी के बीच अमिताभ ने अस्थायी सन्यास लिया।
एबीसीएल नाम की कम्पनी बनाई। जिसकी तमाम घटिया फिल्मों में जमापूंजी डुबाकर दिवालिया हो गए।
इस वक्त अमर सिंह ने साथ दिया। टीवी और केबीसी ने उन्हें नई जिंदगी दी। फिल्मों में भी वे उम्र के अनुरूप रोल करते हुए फिर से छा गए।
इस रिसर्जेंट अमिताभ को समाजवादी पार्टी की छत्रछाया मिली थी। फिर तो अमिताभ, सैफई के दरबार मे हर साल ठुमकते दिखते थे। पत्नी जया, जिनकी रीढ़ ज्यादा मजबूत है, सपा से राज्यसभा भी भेजी गईं।
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बहरहाल अब सपा के सितारे वैसे बुलंद नही। कांग्रेस भी मझधार में है।
इस दौर में गुजरात के गधों का विज्ञापन करते अमिताभ को "कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में" की टैगलाइन बोलते देखा गया।
ट्विटर पर अक्सर वाहियात ट्वीट करने वाले महानायक, आज अयोध्या में भी दिखे। नए पिता को नमस्कार करते..
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इलाहाबाद से, सैफई से ,अहमदाबाद से, अयोध्या तक जीवन मे सुविधानुसार मुताबिक नए नए पिता बनाते हरिवंश पुत्र को वहां देखकर मधुशाला की लाइने बरबस ही याद आयी
मुसलमान औ' हिन्दू है दो,
एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय,
एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक
मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर
मेल कराती मधुशाला..
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मधुशाला, मेरे पिता की फेवरिट कृति थी, जिसे वे, कैसेट रिवर्स कर करके सुना करते थे।
मेरे पिता अब नही हैं। उनकी सुखद स्मृति अनायास ही जगाने के लिए अमिताभ का आज शुक्रगुजार हूं।
जो आज अस्सी बरस की उम्र में नए पिता के सामने बिछे जा रहे थे। और आसपास वालो को जता रहे थे..
मेरे पास बाप है !!!
.@vikasbha जी कह रहे थे कि मोदी जी ना अन्न-जल का त्याग कर दिया है 22 जनवरी तक। लेकिन यहाँ पर मोदी की पानी का पूरा ग्लास पीते दिख रहे है।
तो क्या मोदी जी ने विकास से झूठ बोला राम के नाम पर?
प्रधानमंत्री मंचों से टेसुएं बहा रहे हैं कि उनको बचपन में प्रधानमंत्री आवास वाला लग्जरी घर क्यों नहीं मिला..लेकिन मोदी जी की सरकार 30 हजार रूपए रिश्वत लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना का घर दे रही है..अम्मा बीजेपी सांसद के सामने ही भांडा फोड़ रही हैं..
BJP सांसद : घर मिला है, किसी ने पैसे तो नहीं लिए?
वृद्धा : हां लिए हैं, 30 हजार
Video उत्तर प्रदेश में जिला बदायूं की है। कार्यक्रम का नाम था "विकसित भारत संकल्प यात्रा" और बात हो रही थी "PM आवास योजना" की।
दिल झकझोर देने वाली खबर !
मध्यप्रदेश भोपाल में अवैध रूप से चल रहे बालिका गृह से 26 लड़कियाँ गायब !
ये बच्चियां गुजरात,झारखंड,राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश के सीहोर, रायसेन, छिंदवाड़ा, बालाघाट के रहने वाली थी !!
हम कितना ही वंदे भारत का जश्न मना लें, भारत की रेलवे तब सुधरेगी जब देश का गरीब आदमी आरामदायक और इज़्ज़त से यात्रा कर पाएगा।
ये वीडियो देख खून खौलता है। माननीय मंत्री @AshwiniVaishnaw जी कृपया मामले का संज्ञान लें और इस TC पर सख़्त कार्यवाही करें।
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