कृष्ण-रुक्मणी की शादी कौन सी विवाह पद्दति में आती है ? कमेंट में बताए
1. राक्षसी विवाह - कन्या को उसके घर से उठा ले जाना तथा उसे बचाने आए लोगो को मार पिट देना।
2. असुर विवाह- जिसमे कन्या के माता पिता को धन देना।
3. प्राजापत्य विवाह-कन्यादान द्वारा
4. गंधर्व विवाह- एकांत में शादी कर लेना काम इच्छा हेतु।
5. पैशाच विवाह- सोई हुई मद से मतवाली या पागल कन्या के साथ एकांत में काम क्रिया करना।
संलग्न वैवाहिक पद्दति मनुस्मृति चैप्टर 3 से है।
विष्णु की चार पत्नियाँ थी- लक्ष्मी, गंगा, सरस्वती, तुलसी ।
रेफरेंस- अध्याय 21, प्रकृति खण्ड, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर।
सवाल है- आज हिंदुओं को बहुपत्नी विवाह को क्यो त्यागना पड़ा क्या ये कुप्रथा थी/है?
थुकला बुद्ध में अपने पिताजी खोज रहा है?🤣🤣
खास बात यह है कि बुद्ध से पहले 27 बुद्ध थे ये बात थुकला के किसी अब्बू को नहीं पता था। इसलिए थुकला के सभी अब्बुओं ने भरभर के बुद्ध को गाली दी अब चुकी वैदिक काल पूरी तरह से डिबंक हो चुका है तो बुद्ध में ही अब्बू खोजने लगा।
मुझे कमेंट में ब्लॉक कर रखा है।
अनुपम खीर, राममंदिर चढ़ावा डकैती को जस्टिफाई कुछ इस तरह कर रहे है की मुग़ल काल में राममंदिर लूट लिया तो उससे ये उबर गए तो तो चढ़ावा चोरी से भी उबर जाएँगे?
मैं ये नहीं समझ पा रहा कि मुग़लो से ये कैसे उबरे थे?
बाबर के बेटे हुमायू को भारत के क्षत्रियों ने पनाह दी और अकबर को अपने घर में जन्म देने के लिए आश्रय दिया फिर अकबर के 9 रतन में 4 ब्राह्मण क्षत्रिय शामिल थे फिर जहांगीर से लेकर औरंगजेब तक की सेवा में इनके वंशजे सभी शामिल रहे तो उबरे कैसे थे और किससे थे?
प्रश्न: ठाकुर का कुआँ खोद देते थे लेकिन ख़ुद का क्यो नहीं खोद पाए?
जवाब: इसको जानने के लिए 1668 CA में फ्रांस के डॉ बर्नियर का आँखो देखा हाल पर नजर डाले।
बर्नियर के अनुसार भारत में कारीगरों को उनके काम का उचित पुरस्कार नहीं मिलता था। यहाँ तक कि धनी लोग चीजें सस्ते मूल्य पर लेना चाहते थे। जब किसी अमीर को कारीगर की आवश्यकता होती, तो वह उसे बाजार से पकड़वा मंगाता, उससे जबरन काम करवाता और काम पूरा होने पर उसकी योग्यता के अनुसार नहीं बल्कि अपनी इच्छा से थोड़ी-बहुत मजदूरी देकर विदा कर देता। कारीगर को यह मार और अपमान सहना पड़ता था, क्योंकि विरोध करने पर कोड़ों और दमन का डर था।
बर्नियर साफ़ लिखते हैं कि यहाँ के कारीगर यूरोप की बनी चीज़ों की अच्छी नकल कर लेते थे। शिकारी और बंदूकें सुंदर बनती थीं, सोने के गहने उत्कृष्ट होते थे, और कई कलाएँ इतनी उन्नत थीं कि कोई यूरोपियन सुनार भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता था। यानी समस्या कारीगर की योग्यता में नहीं थी। समस्या उस समाज में थी जहाँ कारीगर को इंसान नहीं, “मजदूरी कराने की वस्तु” समझा जाता था।
यह दृश्य केवल आर्थिक शोषण नहीं था, यह सामाजिक अन्याय था। जो लोग श्रम करते थे, जो समाज को सुंदर वस्तुएँ देते थे, जो हथियार, कपड़े, गहने, मकान और उपयोगी सामान बनाते थे—उन्हीं को सबसे कम सम्मान मिलता था। दूसरी ओर जो उच्च वर्ग स्वयं उत्पादन नहीं करता था, वही धन, प्रतिष्ठा और सत्ता पर बैठा था। यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना थी।
बर्नियर आगे बताते हैं कि इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि कारीगरों में उत्साह खत्म होता गया। जब किसी कलाकार को यह पता हो कि उसकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलेगा, उसका सम्मान नहीं होगा, उसे जबरन काम करना पड़ेगा और पैसे मांगने पर अपमान मिलेगा, तो वह नई चीज़ बनाने का साहस क्यों करेगा? यही कारण था कि भारत में अच्छी चीज़ें बनने की संभावना होते हुए भी शिक्षा और प्रोत्साहन के अभाव में शिल्प-कला व्यापक रूप से विकसित नहीं हो सकी।
यहाँ भारतीय उच्च वर्ग की कड़ी आलोचना ज़रूरी है। उच्च वर्ग ने कारीगरों की कला का उपभोग तो किया, लेकिन उनके जीवन की रक्षा नहीं की। उन्होंने महलों, गहनों, हथियारों और विलासिता की वस्तुओं का आनंद लिया, लेकिन उन्हें बनाने वाले हाथों को सम्मान नहीं दिया। यह वही मानसिकता थी जिसमें श्रम को नीचा और आराम को ऊँचा माना गया। उत्पादन करने वाला “निम्न” बना दिया गया और उपभोग करने वाला “श्रेष्ठ” कहलाया।
बर्नियर के विवरण से यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में शिक्षा का भयंकर अभाव था। यदि कारीगरों को व्यवस्थित शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक सम्मान मिलता, तो भारत की कारीगरी दुनिया में और ऊँचे स्तर पर पहुँच सकती थी। लेकिन उच्च वर्ग की जातिवादी और सामंती मानसिकता ने ज्ञान और कला को सीमित कर दिया। कारीगरों को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें दबाकर रखा गया।
बर्नियर एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि बादशाह और बड़े अमीरों के यहाँ अनेक कारीगर काम करते थे। वे अपने घरों या बादशाही कारखानों में बैठकर काम बनाते थे और अपने शिष्यों तथा लड़कों को सिखाते भी थे। इसका मतलब यह है कि दरबारी संरक्षण ने कुछ हद तक कला को बचाए रखा। मुग़ल दरबारों और अमीरों की संरक्षण-व्यवस्था के कारण कई कारीगरों को नियमित काम, साधन और प्रशिक्षण का अवसर मिला। इसलिए कहा जा सकता है कि जहाँ भारतीय सामाजिक उच्च वर्ग आम तौर पर कारीगरों का शोषण कर रहा था, वहीं बादशाही कारखानों और दरबारी संरक्षण ने कई कलाओं को पूरी तरह मिटने से बचाया।
लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि केवल दरबारी संरक्षण पर्याप्त नहीं था। असली न्याय तब होता जब कारीगर स्वतंत्र नागरिक की तरह सम्मान पाते, अपनी मजदूरी खुद तय कर पाते, शिक्षा प्राप्त करते और उनके बच्चों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिलता। बर्नियर की आलोचना इसी बात की ओर इशारा करती है कि भारत की शिल्प-कला इसलिए पिछड़ी नहीं कि यहाँ प्रतिभा नहीं थी, बल्कि इसलिए पिछड़ी क्योंकि प्रतिभा को दबाने वाली सामाजिक व्यवस्था मौजूद थी।
इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष साफ़ है: भारत के कारीगर महान थे, लेकिन उन्हें कुचलने वाली व्यवस्था उससे भी अधिक क्रूर थी। उच्च वर्ग ने श्रम का सम्मान नहीं किया, बेगारी कराई, उचित मेहनताना नहीं दिया और दमन के सहारे कलाकारों को चुप रखा। यदि भारत के श्रमिकों और कारीगरों को सम्मान, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता मिलती, तो भारत की कला और उद्योग दुनिया में बहुत आगे होते।
अब आप समझ चुके होंगे किठाकुर का कुआँ क्यो ख़ुद जाता था लेकिन बहुजनों का नहीं।
ब्राह्मण अपना इतिहास बुद्धिज्म में खोज रहा है टिपिटक में खोज रहा है क्योकि वो भी जान चुका है वेद में कोई इतिहास नहीं है वो काल्पनिक गपोड़ गाथा है जो मुस्लिम आगमन पर रची गई है। इसलिए बहुजनों को चाहिए वो भी अपना इतिहास पुरातत्व और ऑथेंटिक सबूत के आधार पर ही तलाश करे अन्यथा ब्राह्मणवादी गप्पो की B Team बनकर रह जाना होगा।
बताओ @grok ऋग्वेद के किस मंत्र में पार्वती के पुत्र हाथी सर वाले गणेश वैदिक देवता है?
सीधी बात बताना अगर न मिले तो जबरन किसी का क्लेम मत गपोड़ना की विद्वानों ने मान लिया है इसलिए मान लो।
11 वी सदी में जातिवाद आ चुका था इसके बारे अलबरूनी ने अपना आँखो देखा डिटेल्स में लिखा।
अलबरूनी की नज़र में भारतीय जाति-व्यवस्था: जन्म, वर्ण और बहिष्कार
अलबरूनी के वर्णन से स्पष्ट होता है कि भारतीय जाति-व्यवस्था केवल सामाजिक बँटवारा नहीं थी, बल्कि उसे धार्मिक कल्पनाओं के सहारे वैधता दी गई थी। शरीर के अलग-अलग अंगों से अलग-अलग वर्णों की उत्पत्ति बताकर समाज में ऊँच-नीच को प्राकृतिक और ईश्वरीय व्यवस्था की तरह प्रस्तुत किया गया।
इस व्यवस्था में ब्राह्मणों को ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न माना गया, इसलिए उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया गया। क्षत्रियों को कंधों और हाथों से उत्पन्न बताया गया, इसलिए उन्हें शक्ति और शासन से जोड़ा गया। वैश्यों को जाँघों से उत्पन्न माना गया और उन्हें व्यापार, कृषि तथा उत्पादन से संबंधित किया गया। शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताकर सेवा-कार्य तक सीमित रखा गया। यानी मनुष्य का स्थान उसकी योग्यता या कर्म से नहीं, बल्कि जन्म से तय कर दिया गया।
अलबरूनी बताते हैं कि पहले दो वर्णों में बहुत बड़ा सामाजिक अंतर नहीं दिखता था। वे एक ही नगर और गाँव में रहते थे। लेकिन शूद्रों और उनसे नीचे माने गए समूहों की स्थिति अलग थी। शूद्रों के बाद कई ऐसी जातियाँ थीं जिन्हें चार वर्णों में स्थान ही नहीं दिया गया। इनमें धोबी, मोची, जुलाहे, मदारी, टोकरी बनाने वाले, ढाल बनाने वाले, मछली पकड़ने वाले और शिकार करने वाले जैसे श्रमजीवी समुदाय शामिल थे।
यहाँ जाति-व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। जिन लोगों के श्रम से समाज चलता था, उन्हें ही सम्मानजनक स्थान नहीं दिया गया। उनके काम समाज के लिए आवश्यक थे, लेकिन उनके साथ बराबरी का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाता था। वे चार वर्णों के गाँवों और नगरों के बाहर रहते थे। इससे पता चलता है कि जाति केवल धार्मिक पहचान नहीं थी, बल्कि निवास, पेशा और सामाजिक संबंधों को भी नियंत्रित करती थी।
अलबरूनी कुछ समुदायों का वर्णन और भी अधिक बहिष्कृत रूप में करते हैं। हाड़ी, चंडाल और बधतौ जैसे समूहों को किसी वर्ण या जाति में भी गिना नहीं जाता था। उनका काम गाँव की सफाई, मृत पशुओं को उठाना और समाज द्वारा अपमानजनक माने गए कार्य करना था। इन्हें अछूत समझा जाता था। लोकमत में इनके बारे में अपमानजनक कहानियाँ गढ़ी गईं, ताकि उनके बहिष्कार को धार्मिक और नैतिक आधार दिया जा सके।
भोजन और छुआछूत के नियमों में भी जातिगत दूरी साफ दिखाई देती है। ब्राह्मण भोजन करते समय अलग मंडली बनाकर बैठते थे। अलग-अलग वर्णों के लोग एक साथ नहीं बैठ सकते थे। यदि दो लोगों के आसन पास भी हों, तो उनके बीच तख्ता, कपड़ा या कोई आड़ रखी जाती थी। एक लकीर खींच देने मात्र से भी वे अपने को अलग मानते थे। भोजन में भी यदि कोई एक थाली से खा ले, तो बचा हुआ भोजन दूसरे के लिए झूठा माना जाता था। यह दिखाता है कि जाति-व्यवस्था शरीर, स्पर्श और भोजन तक को नियंत्रित करती थी।
अलबरूनी का यह वर्णन बताता है कि भारतीय जाति-व्यवस्था केवल चार वर्णों का सिद्धांत नहीं थी। उसके नीचे अनेक जातियाँ, उपजातियाँ और बहिष्कृत समुदाय मौजूद थे। इस व्यवस्था में जन्म के आधार पर ऊँच-नीच तय की गई, श्रम करने वालों को नीचा माना गया और कुछ समूहों को सामान्य मानव समाज से भी बाहर कर दिया गया।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अलबरूनी की किताब भारतीय जाति-व्यवस्था की कठोरता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। यह व्यवस्था केवल पहचान नहीं थी, बल्कि सम्मान, निवास, भोजन, पेशा और मानवीय संबंधों पर नियंत्रण रखने वाली सामाजिक संरचना थी। अलबरूनी का यह विवरण भारतीय समाज में जन्म-आधारित असमानता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य है।
क्या लक्ष्मीबाई और मंगलपाड़े क्रांतिकारी थे?
क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
भारत की इतिहास की किताबों में कुछ नाम बार-बार चमकाए जाते हैं—लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, नाना साहेब। लेकिन सवाल यह है कि जिन SC, ST, OBC और बहुजन नायकों ने जल, जंगल, जमीन, सम्मान और आज़ादी के लिए संघर्ष किया, वे मुख्य अध्यायों में क्यों नहीं दिखते?
यहीं से सवाल उठता है—क्या भारतीय एजुकेशन सिस्टम ने “क्रांतिकारी” की परिभाषा भी जाति देखकर तय की?
क्रांतिकारी कौन है?
क्या वह जो अंग्रेजों की गोली से मारा गया?
क्या वह जिसे फाँसी हुई?
या वह जो जनता, शोषितों और अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ?
रानी लक्ष्मीबाई को वीरांगना बताया जाता है। लेकिन उनके संघर्ष का मुख्य कारण झाँसी राज्य का उत्तराधिकार विवाद था। अंग्रेजों की “Doctrine of Lapse” नीति के तहत गोद लिए गए उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं मिली और झाँसी को अंग्रेजी शासन में मिलाने की कोशिश हुई। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह भारत की जनता को स्वतंत्र कराने की लड़ाई थी, या अपने राज्य और सत्ता को बचाने की लड़ाई?
मंगल पांडे को 1857 की क्रांति का पहला नायक बताया गया। लेकिन वे अंग्रेजी सेना में सिपाही थे। विद्रोह तब हुआ जब कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी की बात फैली और उन्हें मुँह से काटना पड़ता था। सवाल यह है—अगर कारतूस का धार्मिक विवाद न होता, तो क्या मंगल पांडे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करते?
अब दूसरी तरफ देखिए—बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी पासी और ऐसे हजारों लाखो बहुजन योद्धा, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता, सामंती शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। सिने पर गोलिया भी खाई और फाँसी पर भी चढ़े लेकिन पाठ्यपुस्तकों में उनका स्थान सीमित क्यों रहा?
समस्या यह नहीं कि लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे को क्यों पढ़ाया गया। समस्या यह है कि बहुजन नायकों को बराबर जगह क्यों नहीं दी गई।
जब राजघरानों और तथाकथित उच्च जातियों से जुड़े पात्रों को “राष्ट्रीय नायक” बनाया जाता है, लेकिन दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के विद्रोहों को “स्थानीय आंदोलन” बनाकर छोटा कर दिया जाता है, तो यह इतिहास लेखन की भूल नहीं, साफ़ साफ़ ब्राह्मणवादी जातिवादी पक्षपात दिखता है।
जातिवाद सिर्फ गाली या भेदभाव का नाम नहीं है। जातिवाद यह भी है कि इतिहास में किसे नायक बनाया जाए और किसे भुला दिया जाए। किस संघर्ष को “क्रांति” कहा जाए और किसे “विद्रोह” बताकर किनारे कर दिया जाए या इतिहास के पन्नो से नाम ही गायब कर दिया जाय।
इसलिए सवाल फिर वही है—क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
अगर लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे क्रांतिकारी हैं, तो बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी और हजारों लाखो SC, ST, OBC योद्धा इतिहास के केंद्र में क्यों नहीं हैं?
अब इतिहास को श्रद्धा से नहीं, सवालों से पढ़ने का समय है।
क्योंकि इतिहास केवल अतीत नहीं बताता, वह यह भी तय करता है कि आने वाली पीढ़ी किसे अपना नायक मानेगी, अंडभक्त बनेगी या वैज्ञानिक चेतना के साथ खड़ी होगी।
5000 साल की कहानी गलत है. 3000 साल की कहानी भी गलत है.
नंद वंश और मौर्य साम्राज्य का शासन भारत का Golden Age था.
मकदूनिया का खूंखार अलैक्जेंडर, नंद वंश की विशाल सेना देखकर ही यमुना-गंगा नदी को पार नही किया,
और डरकर भाग गया. नंद वंश और मौर्य साम्राज्य ही बौद्ध सभ्यता है. भारत में समस्या बौद्ध सभ्यता के कमजोर होने के बाद शुरू हुई.
गुप्त काल में वैदिक सभ्यता की शुरुआत होनी शुरू हुई. यही वो काल है जब संस्कृत भाषा साहित्य का आरंभ होना शुरू हुआ.
भाषा वैज्ञानिक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का कहना है जाति वर्ण अव्यवस्था ईसा पूर्व नही थी. गुप्त काल में जाति वर्ण अव्यवस्था बनने लगी. जाति वर्ण अव्यवस्था की समस्या 1500 साल पुरानी मानी जा सकती है. जाति वर्ण अव्यवस्था जैसे जैसे मजबूत होते गयी, भारत गुलामी की ज़ंजीरो में बंध गया.
संलग्न पोस्ट की फैक्ट चेकिंग करके बताओ ये कितना गपोड़ हांक रहा है क्योकि संलग्न मूर्ति डुप्लीकेट है ये सिंधु घाटी में पायी नहीं गई है तो किसने ये फर्जी मूर्ति बनाई? @grok
जातंकवादियों को हमेशा इस बात का दर्द रहता है की 5000 साल से पानी नहीं पिने दिया ये फेक क्लेम है लेकिन उन्हें कभी इस बात का दर्द नहीं होता की 5000 साल पहले रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद या कोई देवी देवता बिना सबूत के कैसे गपोड़ दिया गया?
इस पर जातंकवादी की कभी चीख नहीं निकलती।
मनुस्मृति पोलखोल Part-2
चैप्टर 1, श्लोक 7-12,
श्लोक 7
योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ॥ ७॥
अर्थ:
जो इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सभी प्राणियों में व्याप्त और अचिन्त्य है, वही स्वयं प्रकट हुआ।
आलोचना:
जिस बात को प्रमाण से सिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे “इन्द्रियों से परे”, “अचिन्त्य”, “अव्यक्त” कहकर सवालो से भागने की कोशिश।
जब कोई चीज़ न दिखाई दे, न जांची जा सके, न तर्क से समझी जा सके, फिर भी उसे अंतिम सत्य घोषित कर दिया जाए, तो यह ज्ञान नहीं, आस्था के नाम पर गपोड़ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह सत्ता “सर्वभूतमय” यानी सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है, तो ब्राह्मण श्रेष्ठ और शूद्र सेवक कैसे हो गया?
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श्लोक 8
सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ ८॥
अर्थ:
उस परमात्मा ने अनेक प्राणियों को उत्पन्न करने की इच्छा से अपने शरीर से पहले जल उत्पन्न किया और उसमें बीज डाला।
आलोचना:
यहां सृष्टि की व्याख्या वैज्ञानिक आधार पर नहीं, बल्कि कल्पनात्मक रूप में की गई है। “अपने शरीर से जल उत्पन्न किया” और “उसमें बीज डाला”—यह दर्शन नहीं विशुद्ध गपोड़ है।
यह सवाल उठता है कि जो ग्रंथ समाज के कानून, धर्म और कर्तव्य तय करने का दावा करता है, उसकी शुरुआत ही गपोड़ से क्यों होती है जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं?
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श्लोक 9
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥ ९॥
अर्थ:
वह बीज सूर्य के समान चमकने वाला स्वर्णिम अंडा बन गया। उसी में सब लोकों के पितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
आलोचना:
यहां “स्वर्णिम अंडे” से ब्रह्मा के जन्म की गपोड़ कल्पना हांकी गई है। इसे इतिहास, विज्ञान या सामाजिक न्याय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर ब्रह्मा “सर्वलोकपितामह” हैं, यानी सबके पितामह हैं, तो उनकी संतानें जन्म से असमान कैसे हो गईं?
कोई जन्म से पूज्य और कोई जन्म से नीच कैसे घोषित किया गया?
यहीं मनुस्मृति की धूर्तता दिखती है—पहले सबको एक दिव्य स्रोत से उत्पन्न बताओ, फिर आगे जाकर उसी मानव-समाज को वर्णों में बांटकर स्थायी असमानता लागू करो।
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श्लोक 10
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ १०॥
अर्थ:
जल को “नारा” कहा गया है, क्योंकि जल नर से उत्पन्न हुआ है। जल पहले उसका निवास था, इसलिए वह नारायण कहलाया।
आलोचना:
यहां शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर धार्मिक अर्थ गढ़े जा रहे हैं। “नर”, “नारा”, “नारायण”—इन शब्दों को जोड़कर गपोड़ा गया है लेकिन भाषा की ऐसी व्याख्या प्रमाण नहीं बन जाती।
यह तरीका बहुत खतरनाक है,
शब्दों का खेल करके ईश्वर, धर्म, वर्ण और समाज की व्यवस्था गढ़ दी जाती है, फिर कहा जाता है—यह सनातन सत्य है।
सवाल यह है कि क्या समाज का न्याय शब्द-व्युत्पत्ति से तय होगा या मानव-मर्यादा और समानता से?
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श्लोक 11
यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते॥ ११॥
अर्थ:
जो अव्यक्त, नित्य और सत-असत स्वरूप कारण है, उससे उत्पन्न पुरुष संसार में ब्रह्मा कहलाता है।
आलोचना:
यहां फिर “अव्यक्त”, “नित्य”, “सत-असत” जैसे दार्शनिक शब्दों का गपोड़ खड़ा किया गया है ताकि सामान्य मनुष्य सवाल ही न पूछे।
लेकिन कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी भी गपोड़ क्यों न हांके, अगर मनुष्य को जन्म से छोटा-बड़ा बनाती है, तो वह नैतिक नहीं हो सकती।
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श्लोक 12
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम्।
स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद् द्विधा॥ १२॥
अर्थ:
उस अंडे में भगवान ने एक वर्ष तक निवास किया और फिर अपने ध्यान से उस अंडे को दो भागों में बांट दिया।
आलोचना:
“स्वर्णिम अंडा”, “उसमें भगवान का रहना”, “ध्यान से अंडे को दो भागों में बांटना”- ऐसे धूर्तता को प्रमाणिक ज्ञान मानकर समाज की वास्तविक व्यवस्था तय करना खतरनाक है।
तीखा सवाल यह है कि अगर यह सब प्रतीक है, तो फिर इसी ग्रंथ की वर्ण-व्यवस्था को शाब्दिक सत्य क्यों माना गया?
और अगर इसे शाब्दिक सत्य माना जाए, तो फिर इसका प्रमाण क्या है?
यही दोहरा खेल है—जहां बात अवैज्ञानिक लगे, वहां कहा जाता है “यह प्रतीक है”; और जहां सत्ता चाहिए, वहां कहा जाता है “यह धर्मशास्त्र है, मानना पड़ेगा।”
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सबसे बड़ा विरोधाभास यही है:
अगर ईश्वर सबमें है, तो जाति क्यों?
अगर ब्रह्मा सबके पितामह हैं, तो जन्म से ऊंच-नीच क्यों?
अगर सृष्टि एक स्रोत से निकली है, तो मनुष्य का धर्म अलग-अलग वर्णों में क्यों बांटा गया?
अगर यह सब अचिन्त्य है, तो इसे समाज का कानून बनाने का अधिकार किसने दिया?
पश्चिम बंगाल में उन जातियों का नाम बताओ जिन्हें ओबीसी की लिस्ट से बाहर किया गया है ? @grok और ये भी बताओ पश्चिम बंगाल में कितने प्रतिशत ओबीसी है और किस जातिय जनगणना से यह पता चला?
मनुस्मृति पोलखोल part3
चैप्टर 1,
श्लोक 13
ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे।
मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम्॥ १३॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने उस अंडे के दो टुकड़ों से आकाश और पृथ्वी बनाई। बीच में अंतरिक्ष, आठ दिशाएं और जल का स्थायी स्थान बनाया।
आलोचना:
सृष्टि का रचियता “ब्रह्मा द्वारा अंडा फोड़कर पैदा हो गया।
मनुस्मृति की चाल यही है—पहले सृष्टि उत्पत्ति को गपोड़ बनाओ, फिर उसी गपोड़ के नाम पर समाज को भी वर्णों में बांट दो। यानी पहले ब्रह्मांड पर अधिकार, फिर मनुष्य पर अधिकार।
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श्लोक 14
उद्बबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम्।
मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम्॥ १४॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने अपने से सत-असत स्वरूप मन उत्पन्न किया और मन से अहंकार उत्पन्न किया।
आलोचना:
असल अहंकार क्या है?
किसी मनुष्य का खुद को जन्म से श्रेष्ठ मानना।
किसी जाति का खुद को ईश्वर के मुंह से पैदा हुआ बताना।
किसी वर्ग का यह दावा करना कि ज्ञान, पूजा, सत्ता और सम्मान केवल उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
इसलिए मनुस्मृति में “अहंकार” का वर्णन भी अपने आप में विरोधाभासी है। यह ग्रंथ अहंकार की बात करता है, लेकिन सामाजिक अहंकार को धर्म बना देता है।
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श्लोक 15
महान्तमेव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च।
विषयाणां ग्रहीतॄणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च॥ १५॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने महत् तत्व, तीन गुण—सत्त्व, रज, तम—और विषयों को ग्रहण करने वाली पांच इन्द्रियां उत्पन्न कीं।
आलोचना:
यहां सत्त्व, रज और तम की बात करके समाज में मनुष्यों की श्रेणीकरण मानसिकता को मजबूत किया जाता है।
खतरा यह है कि जब किसी व्यक्ति या समुदाय को “सत्त्वगुणी”, “रजोगुणी” या “तमोगुणी” जैसे खांचों में डाल दिया जाता है, तो वास्तविक सामाजिक अन्याय छिप जाता है।
गरीबी, शिक्षा से वंचना, श्रम का शोषण, जातिगत अपमान—इन सबको व्यवस्था की गलती मानने के बजाय व्यक्ति के “गुण” या “कर्म” पर डाल दिया जाता है।
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श्लोक 16
तेषां त्ववयवान्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम्।
संनिवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे॥ १६॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने इन छह तेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों को मिलाकर सभी प्राणियों की रचना की।
आलोचना:
यहां कहा गया कि सभी प्राणियों की रचना उन्हीं सूक्ष्म तत्वों से हुई। अगर सभी प्राणी एक ही तत्वों से बने हैं, तो मनुष्य-मनुष्य में जन्म आधारित ऊंच-नीच कैसे पैदा हो गई?
यही मनुस्मृति का बड़ा विरोधाभास है। सृष्टि के स्तर पर सबको समान तत्वों से बना बताती है, लेकिन समाज के स्तर पर मनुष्य को जन्म से अलग-अलग दर्जों में बांटती है।
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श्लोक 17
यन्मूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तानीमान्याश्रयन्ति षट्।
तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्तिं मनीषिणः॥ १७॥
अर्थ:
इन छह सूक्ष्म अवयवों के आश्रय से शरीर बनता है, इसलिए ज्ञानी लोग उसे शरीर कहते हैं।
आलोचना:
इस श्लोक में शरीर की रचना को सूक्ष्म तत्वों से जोड़ा गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि जब शरीर सबका तत्वों से बना है, तो किसी शरीर को जन्म से पवित्र और किसी शरीर को अपवित्र क्यों माना गया?
जाति-व्यवस्था ने शरीर तक को अपमानित किया। किसी का स्पर्श अपवित्र, किसी का जन्म नीच, किसी का श्रम गंदा—यह सब उसी मानसिकता का परिणाम है, जिसे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने वैचारिक आधार दिया।
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श्लोक 18
तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः।
मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम्॥ १८॥
अर्थ:
आकाश आदि महाभूत अपने-अपने कर्मों सहित उस ब्रह्म में प्रवेश करते हैं, और मन भी अपने सूक्ष्म अवयवों सहित सभी प्राणियों में प्रकट होता है।
आलोचना:
यहां “कर्म” की भाषा को सामाजिक अन्याय सही ठहराने का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है।
गरीब को—पिछले जन्म का कर्म।
जातिगत अपमान को —कर्मफल।
शिक्षा से दूर रखा गया—कह दो उसका धर्म सेवा है।
सत्ता और ज्ञान पर कब्जा—कह दो वह जन्म से योग्य है।
मनुस्मृति का खतरनाक पक्ष यही है कि यह मनुष्य के वर्तमान दुख को बदलने के बजाय उसे दैवी-कर्म व्यवस्था में फंसा देती है।
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श्लोक 19
तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम्।
सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाद्व्ययम्॥ १९॥
अर्थ:
इन सात महातेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों से यह नश्वर संसार अविनाशी तत्व से उत्पन्न होता है।
आलोचना:
यहां संसार को अविनाशी तत्व से उत्पन्न नश्वर रूप बता सामाजिक प्रश्नों से भागने का माध्यम बनती है।
जब जनता समानता मांगेगी, तो कहा जाएगा—यह संसार नश्वर है।
जब शोषित अधिकार मांगेगा, तो कहा जाएगा—कर्मफल है।
जब जाति पर सवाल होगा, तो कहा जाएगा—धर्मशास्त्र सनातन है।
जब तर्क मांगा जाएगा, तो कहा जाएगा—यह सूक्ष्म और अचिन्त्य है।
यानी मनुस्मृति में दर्शन का उपयोग मुक्ति के लिए नहीं, व्यवस्था को स्थायी बनाने के लिए होता दिखता है।
नालंदा जिला में जहां "तथागत बुद्ध" को तेलिया बाबा के रूप में पूजा जाता है...
वहां से पंद्रह किलोमीटर दूर तेतरावां गांव में बुद्ध को "भैरव बाबा" बताकर लोग पूजते...
जब लोगों ने तथागत की मूर्ति देखी तब इसका खुलासा हुआ और फिर इसे बौद्धों को सौंपा गया!
#गौतमबुद्ध
बुद्ध ही ऐतिहासिक है.
बुद्ध धर्म की प्रतिक्रिया मे रामायण महाभारत लिखा गया.महाभारत में बुद्ध का 137 बार जिक्र आता है.शंकुंतला तिवारी ने यह मान्य किया कि वैज्ञानिक आधार पर केवल मात्र बुद्ध ही सही सिद्ध होते है. रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद, पुराण इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है!
NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष .@VinodJakharIN कह रहे हैं कि हाल ही में हुआ UPSC का पेपर एक अनंतन नाम की कोचिंग के कंटेंट में से आया है।
विनोद कह रहे हैं कि 82 सवाल तो हुबहू उसी कोचिंग के मेटेरियल में से पड़े हैं। जब उम्मीदवारों की इस पर नजर पड़ी तो कोचिंग ने तुरंत अपना मैटेरियल बदल डाला।
तो क्या अब UPSC का पेपर भी लीक किया जा रहा है?