आज पहली बार विश्व गुरु होने का गुरूर हो रहा है।डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव जीतने पर अपने नागरिकों को 5000 $ देने का वायदा किया है।ट्रंप साहब हमारी बराबरी नहीं कर पाएंगे।हमने 15 लाख देने का वायदा किया था।इतना ही नहीं,
किसान सम्मान निधि,
PMGKAY,
PMMVY,
लखपति दीदी बहुत लम्बी फ़ेहरिस्त है।कहा तक मुक़ाबला करेंगे !
Zee समूह के मालिक सुभाष चंद्रा पर 22 हज़ार करोड ₹ का कर्ज था।NCLT ने चंद्रा साहब को बड़ी राहत दी है।अब उन्हें सिर्फ 6.5 करोड़ ही चुकाने होंगे।ऐसी लोकलुभावन योजनाएं सिर्फ धन्ना सेठों के लिए होती है।किसान,मज़दूर,छोटे व्यापारी के घर तो बैंकों के गुंडे पहुँच जाते हैं !
सुभाष चंद्रा तो अगस्त में ही दीवाली मान रहे हैं…
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुँचे है।उनके साथ छात्र संजीव लोचब है।जो pellet Gun से जंतर मंतर पर घायल हुए थे।राहुल गांधी संजीव की FIR दर्ज करवाने के लिए गए हैं।
पूर्ण स्वराज से स्वतंत्रता तक: 26 जनवरी 1930 से 15 अगस्त 1947 की यात्रा
भारत की स्वतंत्रता अचानक 15 अगस्त 1947 को नहीं मिली थी। उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, जेल यात्राएं, जनआंदोलन और राजनीतिक संकल्प था। इस यात्रा में 26 जनवरी 1930 एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इससे कुछ सप्ताह पहले, दिसंबर 1929 में लाहौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया था। इसके बाद 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया और लोगों ने स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली।
जब स्वतंत्रता मांग नहीं, संकल्प बनी
इस कहानी की शुरुआत दिसंबर 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन से होती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया। 31 दिसंबर 1929 को रावी नदी के तट पर पंडित नेहरू ने स्वतंत्रता का ध्वज फहराया। लेकिन कांग्रेस चाहती थी कि यह फैसला केवल अधिवेशन तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे देश का संकल्प बने।
इसीलिए तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया जाएगा। उस दिन गांवों और शहरों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, सभाएं हुईं और लोगों ने स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली।
लेकिन सवाल ये था कि ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल कैसे की जाए?
इसका जवाब कुछ ही सप्ताह बाद सामने आया। महात्मा गांधी ने ऐसा मुद्दा चुना जो भारत के हर गरीब और अमीर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा था और वो था नमक। 12 मार्च 1930 को वे साबरमती आश्रम से दांडी के लिए निकले और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ दिया। दांडी मार्च ने पूर्ण स्वराज के संकल्प को सड़कों पर उतार दिया।
इसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तारियों और दमन का दौर चला। पंडित नेहरू समेत कांग्रेस के अनेक नेता जेल भेजे गए। लेकिन दमन आंदोलन की भावना को समाप्त नहीं कर सका।
संकल्प से निर्णायक संघर्ष तक
1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकारें बनाईं। यह स्वतंत्रता की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। अब भारतीय नेताओं के पास केवल ब्रिटिश शासन की आलोचना करने का अनुभव नहीं था, बल्कि वे प्रशासन में काम करके यह भी दिखा रहे थे कि भारतीय अपने राजनीतिक भविष्य का संचालन कर सकते हैं।
लेकिन 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद परिस्थितियां फिर बदल गईं। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया और उसकी प्रांतीय सरकारों ने इस्तीफा दे दिया।
ब्रिटेन ने युद्ध के दौरान भारतीय समर्थन हासिल करने के लिए 1942 में क्रिप्स मिशन भेजा, लेकिन प्रस्ताव कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं हुआ। इसके बाद 8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया और अगले ही दिन कांग्रेस के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन इस बार कहानी अलग थी। नेतृत्व जेल में था, फिर भी आंदोलन देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया। ब्रिटिश सरकार ने इसे दबाने के लिए व्यापक दमन किया, लेकिन 1942 ने यह साफ कर दिया कि भारत पर अब लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
1947: जिस संकल्प का अंत स्वतंत्रता में हुआ
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था। भारत में स्वतंत्रता की मांग को अब टालना लगातार कठिन होता जा रहा था। 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया और सत्ता हस्तांतरण तथा संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। 2 सितंबर 1946 को पंडित नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने कार्यभार संभाला।
यानी जिस कांग्रेस ने वर्षों तक ब्रिटिश सरकार से सत्ता हासिल करने के लिए संघर्ष किया था, उसके नेता अब स्वतंत्र भारत की शासन-व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया में सीधे शामिल हो रहे थे।
14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा में पंडित नेहरू ने ‘Tryst with Destiny’ का वह ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने वर्षों पहले किए गए राष्ट्रीय संकल्प को याद किया।
आधी रात के बाद भारत स्वतंत्र था। लेकिन यह स्वतंत्रता अपने साथ विभाजन की पीड़ा भी लेकर आई थी। लाखों लोग विस्थापित हुए, सांप्रदायिक हिंसा हुई और नए राष्ट्र के सामने गरीबी, शरणार्थियों के पुनर्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी करने जैसी विशाल चुनौतियां थीं।
फिर भी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यही थी- जिस स्वतंत्रता को कांग्रेस ने दिसंबर 1929 में अपना राजनीतिक लक्ष्य बनाया, जिसे 26 जनवरी 1930 को देशव्यापी जन-संकल्प में बदला, जिसके लिए सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों में संघर्ष हुआ, वही लक्ष्य 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के रूप में सामने आया।
. आज 80 वर्ष बाद भी “नियति से साक्षात्कार” के शब्द हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
जय हिंद। जय भारत। वंदेमातरम। जय संविधान।
@INCIndia@Ashok_Kashmir@INCSandesh
“नियति से साक्षात्कार” — स्वतंत्र भारत के स्वप्न का उद्घोष..
“बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था और अब समय आ गया है कि हम अपना संकल्प पूरा करें।”
“आधी रात के समय, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग उठेगा।” -- 2
. यह भाषण मात्र आज़ादी का उत्सव नहीं था, बल्कि भारत के नवनिर्माण का डाक्यूमेंट था। नेहरू जी के यह शब्द राष्ट्रनिर्माण, लोकतंत्र, समानता और जनसेवा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का संकल्प था। -6
Highlights of Media Bite
12 Aug, 2026
Shri Rahul Gandhi, Leader of Opposition (Lok Sabha), addressed the media at the Parliament House precinct, today.
8 अगस्त को उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे जी की रैली हुई।जनसभा के बाद कुछ संगठनों ने हवन करके उस जगह का शुद्धिकरण किया।शायद इसलिए की कांग्रेस अध्यक्ष दलित हैं ?
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आज लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि, गृहमंत्री अमित शाह “या तो दोषी हैं या फिर अयोग्य”। रणनीति साफ़ दिख रही है कि परिसीमन हो या चुनाव नतीजे निशाना मछली की आँख पर है।
Hon'ble Congress President has appointed/ reassigned the following party functionaries as AICC Secretaries, attached to the AICC In-charge, Uttar Pradesh, with immediate effect.
अमित शाह को बचाना है, तो पैलेट गन और AK 47 चलाने के सच को ही नकार रहे हैं।
बाक़ी रही पेपर लीक बिल की हक़ीक़त, तो आज ही फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की पहली सुनवाई थी, आज ही CBI का वकील नहीं पहुँचा।
अभी जब मामला इतना गर्म है, तब ये हाल है, तो बाद में क्या हश्र होगा?
सत्य और सत्याग्रह - दोनों से डरती है मोदी सरकार।
मध्य प्रदेश के आदिवासी भाई-बहन जल सत्याग्रह और भूख हड़ताल पर इसलिए बैठे थे क्योंकि केन-बेतवा परियोजना में उनकी ज़मीन छीन ली गई, लेकिन उन्हें न न्यायपूर्ण मुआवज़ा मिला और न सम्मानजनक पुनर्वास।
"सत्य" यह है कि आदिवासी देश के पहले मालिक हैं - जल, जंगल और ज़मीन पर सबसे पहला हक़ उन्हीं का है।
और उनका "सत्याग्रह" इसलिए है क्योंकि वही हक़ आज उनसे छीना जा रहा है।
अपने अनोखे तरीके से उनकी मांग बस इतनी है कि गुज़र-बसर करने के लिए उचित सहारा तो दो - वरना जिंदगी तो चिता के ही समान है।
मगर यह भी भाजपा सरकार को मंज़ूर नहीं। उनकी बात सुनने के बजाय पुलिस बल से उनका शांतिपूर्ण विरोध भी कुचला जा रहा है।
हम अपने आदिवासी भाई-बहनों के साथ हैं। उन्हें न्याय दिला कर रहेंगे - मुआवज़ा और पुनर्वास तो देना ही पड़ेगा।
Credits for video: Shiksha Pareek and Lok Singh
@faeloreeah @lok_singh_
अगर इस देश के छात्रों और विपक्षी पार्टियों को विदेश ताक़त समर्थन दे रही है और सरकार उन्हें रोकने में नाकाम है तो ऐसी सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है।सरकार ऐसी चाहिए,जो हमारे घर में दख़ल देने वाली हर एक विदेशी ताकत को उखाड़ कर फेंक दें…
आज छात्रों को बहुत बड़ी जीत मिली है।
याद रहे, प्रदर्शन में जिन छात्रों पर घातक हमले हुए - किसी का हाथ टूटा, किसी का पैर, किसी की पसली, पेलेट गन जैसे जानलेवा हथियार का इस्तेमाल किया गया, तो कई चोट खा कर critical हो गए - इन सबके सीधे ज़िम्मेदार गृह मंत्री अमित शाह हैं।
मांग साफ है, इस हमले के organisers से लेकर implementors तक, सभी की जवाबदेही तय हो और उनपर ऐसी कार्रवाई हो जो छात्रों को दिखे - तब जा कर होगा इंसाफ़।
अमित शाह जी, आपको जवाब तो देना ही पड़ेगा।
मेट्रो बंद करो।
रास्ते बंद करो।
दुकानें बंद करो।
Internet बंद करो।
खाना बंद करो।
अपना हक़ मांग रहे छात्रों के ख़िलाफ़ सरकार ने ये क्रूर कदम उठाए।
बस एक चीज़ बंद नहीं कर पाए, मोदी जी - पेपर लीक।
"प्रियंका गांधी उधार नहीं रखतीं"
संसद के मकर द्वार पर @RahulGandhi के लौटते वक्त जब NDA सांसदों ने उनके सामने नारेबाजी की तो पीछे आ रही @priyankagandhi की नज़र थी।जैसे ही वो आगे पहुंचीं, राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी करने वाले सांसदों के सामने रुककर और जमकर नारे लगाए।