मदर टेरेसा: "मानवता की देवी" का नकाब उतारो
सालों तक हमें झूठ परोसा गया।
एक सफेद साड़ी, गले में क्रॉस और हाथ में माला... और मीडिया ने नाम दे दिया "मानवता की देवी"।
अब सच सामने है।
और सच बहुत कड़वा है।
निर्मल हृदय = मौत का कारखाना
कोलकाता में "निर्मल हृदय" के नाम पर क्या था?
कोई अस्पताल नहीं। कोई डॉक्टर नहीं। कोई दवा नहीं।
लेखक अरूप चटर्जी और डॉक्टर रॉबिन फॉक्स ने खुद जाकर लिखा - "यहां मरीजों को तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था"।
क्यों?
क्योंकि मदर टेरेसा का सिद्धांत था - "दर्द में ईसा है। दर्द सहोगे तो स्वर्ग मिलेगा"।
वाह! दूसरों को दर्द दो, और खुद जब बीमार पड़ीं तो सीधे B.M. Birla के AC कमरे में भर्ती हो गईं।
ये सेवा नहीं है, ये पाखंड है।
अरबों का चंदा, और एक भी अस्पताल नहीं
नोबेल का पैसा, दुनिया भर का दान... पैसा आया अरबों में।
आखिर गया कहां?
1 भी मॉडर्न हॉस्पिटल नहीं बना। 1 भी रिसर्च सेंटर नहीं खुला।
आचार्य ओशो ने 40 साल पहले ही पर्दा हटा दिया था - "ये गरीबों की सेवा नहीं है।
ये गरीबी का धंधा है। जितने ज्यादा गरीब, उतना ज्यादा दान"।
सेवा की आड़ में धर्मांतरण की फैक्ट्री
सबसे बड़ा घोटाला यही है।
ओशो ने खुलासा किया: "अनाथालय से बच्चा गोद देना हो तो पहले पूछा जाता था - तुम कैथोलिक हो या प्रोटेस्टेंट?
कैथोलिक हो तो बच्चा मिलेगा, वरना जाओ"।
मतलब साफ है।
लाचार, भूखे, मरते हुए इंसान की मजबूरी का फायदा उठाकर उसका धर्म बदलो।
क्या आप इसे सेवा कहोगे?
ये तो मानवता के साथ धोखा है।
किसने बनाया इन्हें "संत"?*
हमारे देश में अहिल्या बाई ने मंदिर बनवाए, अस्पताल बनवाए।
विवेकानंद ने युवा जगाए।
लेकिन हमें हीरो बना कर दिया गया एक विदेशी नन को।
क्यों?
क्योंकि पश्चिमी मीडिया और मिशनरियों को भारत में "संत" का एक चेहरा चाहिए था।
"मसीहा या प्रोपेगेंडा?
" - अब जवाब साफ है।
ये मसीहा नहीं थी। ये एक ब्रांड थी। "गरीबी + दर्द + धर्मांतरण" का ब्रांड।
जब तक हम सच नहीं बोलेंगे, तब तक हमारे बच्चों को यही झूठ पढ़ाया जाएगा।
अब और चुप नहीं बैठेंगे।
आप इस "संत" के बारे में क्या सोचते हैं?
सच लिखो, डरे मत
भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए राहुल बंसल ने सिविल सर्विसेज जॉइन करने का फैसला लिया...
इसके बाद जो हुआ पढ़कर आप अपना माथा पीट लेंगे,
राहुल बंसल के भाई को अमेरिका जाना था, कोई पेपर असाइनमेंट था जो उसके रिसर्च से जुड़ा हुआ था...
पर वीजा के लिए बर्थ सर्टिफिकेट चाहिए था, जिसे बनवाने के लिए राहुल ब़ंसल के भाई को पांच सौ रूपए देने पड़े थे..
इस बात का राहुल बंसल को गहरा धक्का लगा था, और उसने करप्शन खत्म करने के लिए सिविल सर्विसेज को चुना...
ये सब बाते उन्होने अपने मॉक इंटरव्यू में कही थी...
इसका बदला लेने के लिए राहुल बंसल जी IAS बने छत्तीसगढ़ कैडेर में और अपनी पहली फिल्ड पोस्टिंग में 1 करोड़ रूपए की रिश्वत लेते पकड़े गए...😂😂
लोगों की जेबें खाली कर दो रिश्वत अपने आप रुक जाएगा.. लोगों के पास जब पैसा ही नही रहेगा तो वो रिश्वत कैसे दे पाएंगे,
शायद यही बड़ी सोच रही होगी इन IAS महोदय की...
सुरसा का मुंह हो गया है इन लोगों का,
कितना भी खाएं पेट ही नही भरता...
Gorakhpur, UP under BJP rule.📍
Brahmin Shivkumar Tripathi was publicly butchered with a sword by a backward caste guy.
This happened openly and no one came to rescue him. BJP has created this caste hatred.
Muslims are more safe than Brahmins in India.
"मुसलमान नहीं बनूंगा…"
विभाजन के समय चाचाजी को तपती रेत में जिंदा दफना दिया था मुसलमानों में।
‘विभाजन की विभीषिका’ श्रृंखला में आज एक ऐसी दर्दनाक आपबीती, जो 1947 के विभाजन की त्रासदी और उस दौर की हिंसा की भयावह तस्वीर सामने लाती है।
मियांवाली नगर, पाकिस्तान के गणपतराय सतीजा बताते हैं कि विभाजन के समय उनके चाचाजी करीब 30 वर्ष के थे।
उनके अनुसार, एक दिन दोपहर में कुछ लोगों ने उन्हें पकड़ लिया और इस्लाम कबूल कर मुसलमान बनने के लिए कहा।
चाचाजी ने इनकार करते हुए कहा कि वह मुसलमान नहीं बनेंगे, गणपतराय सतीजा के मुताबिक, इसके बाद उन्हें तपती रेत में जिंदा दफना दिया गया।
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों की पीड़ा की याद है, जिन्होंने 1947 के विभाजन के दौरान अपना घर, परिवार और अपनों को खोया।
विभाजन की विभीषिका, एक ऐसा दर्द, जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता।
#विभाजन_की_विभीषिका
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मेरिट बनाम आरक्षण — सवाल सिर्फ व्यवस्था का नहीं, अवसर की समानता का है। 🇮🇳
क्रिकेट, सेना और ISRO पर हमें गर्व है—तो क्या उनकी सफलता में योग्यता और प्रतिस्पर्धा की भूमिका पर भी खुली बहस नहीं होनी चाहिए?
क्या हर प्रतिभाशाली युवा को समान अवसर मिल रहा है?
आपकी राय क्या है
रजत शुक्ला और निहाल शुक्ला
प्रयागराज में सेप्टिक टैंक में काम करने के दौरान इनकी मौत हो गई…ये करोड़पति ब्राह्मण थे, लोग इन्हें 52 कहकर इनका मजाक उड़ाते हैं, P से पंडित तो P से पीड़ित दोनों ही…
ये हाल है ब्राह्मणों का तभी “आरक्षण” से अछूत हैं!!
बाबासाहेब आंबेडकर ने शिक्षा की ताकत पर सबसे अधिक जोर दिया था। तो सवाल यह है, क्या हम अपने बच्चों की शिक्षा ऐसे हाथों में देना चाहेंगे, जिनकी योग्यता और पढ़ाने की क्षमता पर ही सवाल खड़े हों?
व्यवस्था कोई भी हो, शिक्षक चयन की पहली कसौटी ज्ञान, योग्यता और क्षमता ही नहीं होनी चाहिए?
पूरी दुनियां में भारत के इकबाल को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले मोदी जी को अनपढ़ और चाय वाला बोलकर अपमानित करने वाले वही पढ़े-लिखे कमीना लोग हैं जो मेहमानों के सामने अपने अनपढ़ मां-बाप को घर का नौकर और नौकरानी बोलकर परिचय देते हैं।
सरकार ने इन मीठों को इतना भाव दे दिया कि फिर से इस्तीफ़ा मांगने के लिए उपद्रव करने की तैयारी कर रहे हैं |
अबकी बार ग्रह मंत्री साहब से निवेदन है - सेवा ऐसी करवाना कि पहला हिसाब भी क्लियर हो जाए | 😡
परसों गाय काटी थी.. आज फिर काटने आए थे.. पर साहब अब कभी न काटेंगे..”
@muzafarnagarpol की पीतल पैर में धँसने के बाद मो० जावेद और मो० रियासत को याद आ गए अल्लाह
पुलिस की सतर्कता से बची गौमाता की जान।
कांग्रेस मतलब कट्टरपंथी सोच
उत्तराखंड में कांग्रेस की रैली में मजहबी नारेबाज़ी
नारा ए तकबीर : अल्लाह हूं अकबर
हिंदुओं...
यही काम की सोच हैं।
सावधान रहें
गोरखपुर में कड़ी सुरक्षा के बीच शिव कुमार तिवारी जी का अंतिम संस्कार हो गया है।
इकलौते बेटे ने दी मुखाग्नि,
बेखौफ बदमाशों ने एक अकेले आदमी को घेरकर तलवारों से हमला कर दिया। बहुत ही निर्ममता से शिवकुमार की हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट देख कर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगा....
अपराधियों को पुलिस ने पकड़ लिया...
लेकिन पोस्ट लिखे जाने तक न तो किसी भी अपराधी के घर पर बुलडोजर चला है... न ही अब तक किसी अपराधी का एनकाउंटर हुआ है।
सवाल यह उठता है - बात बात पर “घर ढकेलने” वाला प्रशासन इस बार सुस्त क्यों है ?
ठायँ ठायँ वाली पुलिस के पास पीतल खत्म क्यों हो गए ?
क्या अपराधियों के घुटने इतने मजबूत हैं कि - उसमें पीतल घुस ही नहीं पाई।