मौलाना अब्दुल कलाम आजाद की जगह उसे टाइम ओवैसी साहब होते तो आज मुसलमान इतनी तकलीफ ना झेल रहा होता।
मौलाना साहब ने कांग्रेस पर भरोसा करके बहुत बड़ी गलती की।
ओवैसी की सोच बहुत दूर की है
कांग्रेस के दौर में लाखों मुसलमान को मा*रा गया दं*गों में इस पर कोई बात नहीं करता...Read News
दलितों ने गांधी और नेहरू को अपना नेता नहीं माना उन्होंने ने अपना नेता अंबेडकर को माना, इस पर किसी को आपत्ति नहीं हुई लेकिन अगर कोई मुसलमान अपना नेता मौलाना आज़ाद और मौलाना जौहर को नेता मान रहा है तो तकलीफ़ क्यों हो रही है ?
सपा, कांग्रेस, राजद AIMIM से सिर्फ इसलिए गठबंधन नहीं करती हैं क्योंकि असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम लीडरशिप की बात करते हैं, इससे AIMIM की राजनीतिक विचारधारा का कोई लेना देना नहीं है।
क्योंकि अगर गठबंधन का विचारधारा से कोई लेना देना होता तो कभी उद्धव ठाकरे की शिवसेना का कांग्रेस पार्टी से गठबंधन नहीं होता, कभी महबूबा मुफ्ती की PDP का भाजपा से गठबंधन नहीं होता।
Note: राजनीति में अगर आप विचारधारा ढूंढने निकले हैं, तो आपसे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है..!
भारत में दो सोच थी एक सोच जिन्ना को समर्थन की दूसरी सोच मौलाना आज़ाद को समर्थन दी, आज ओवैसी ने यही तो कहा की हमारी सफ़ों में से मौलाना आज़ाद निकलने चलिए, तुम लोगों को मौलाना आज़ाद से तो जिन्ना वालों को ही तकलीफ़ थी क्या तुम भी जिन्ना वाली सोच के हो ?
ओवैसी ने कहा की हमारी सफो से गांधी नेहरू नहीं निकलेंगे इस लाइन को तथाकथित सेक्युलर लेकर उड़ने लगे जबकि अगली लाइन में उन्होंने कहा कि हमारी सफ़ों से अब मौलाना आज़ाद और मौलाना जौहर निकलेंगे इस लाइन पर बात क्यों नहीं करते, आख़िर अपनी सफ़ों से ऐसे मौलाना क्यों नहीं निकालना चाहते आप ?
दिल्ली 📍
मोनिस ख़ान की हत्या का CCTV फुटेज सामने आया है।
जिन हत्यारों को दिल्ली पुलिस नाबालिग बता रही है क्या वे नाबालिग दिख रहे हैं ?
अगर नाबालिग थे तो उनके पास बंदूके और गाड़ी कहाँ से आई थी ?
मोनिस ख़ान की हत्या एक सोची समझी साजिश थी,और हत्यारों को सिर्फ़ इसलिए बचाया जा रहा है क्यूँकि वे हिंदू हैं।
अगर हत्या किसी हिंदू का हुआ होता और मारने वाला मुसलमान होता तो अबकत उसका इनकाउंट हो जाता है।
यहाँ तक की उसके घर के साथ साथ मस्जिद और मदरसे भी थोड़ दिए जाते।
मेरे यहां एक जनता मेडिकल स्टोर है मैं बच्चों के लिए कोल्ड क्रीम और मॉइश्चराइजर लेने स्टोर पर गया था।
स्टोर वाला मेरा जानकार और हम उम्र था।
उसने मुझे दुकान के अंदर बुला लिया।
हमारी बातचीत शुरू हुई इतने ही दो लड़के जिनकी उम्र 15 से 17 साल थी ....1/2
कॉन्फिडेंट नामक टैबलेट्स की डब्बी जिसकी कीमत 243 रुपए थी लेकर गए।
मैंने केमिस्ट को पूछा भाई यह किस चीज की टैबलेट्स लेकर गए हैं।
केमिस्ट्री हंस कर बोला आप रहने दीजिए पूछ कर क्या करेंगे।
मेरे जिद करने पर केमिस्ट ने बताया कि यह टैबलेट्स यौन उत्तेजना बढ़ाने के लिए होती है।
मैंने पूछा यह नाबालिक लड़के इनका क्या करेंगे अभी तो उनकी शादी भी नहीं हुई।
केमिस्ट्री ने बताया यह लड़के हमेशा मेरे यहां से यह टैबलेट लेकर जाते हैं,
इनकी शादी नहीं हुई लेकिन इनकी दो तीन गर्लफ्रेंड हैं, गलत संगत में पड़े हुए हैं।
अपनी जवानी अभी से बर्बाद कर लेंगे तो शायद शादी तक बीवी के काबिल भी ही नहीं रहेंगे।
वैसे भी यह टैबलेट्स बगैर डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए ,स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं।
लड़कों की संगत आपको कैसी लगी कमेंट में जरूर बताना।
जब मैं कहती हूं कि भाजपा के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में मुसलमानों को अपनी भागीदारी को लेकर गंभीरता से सोचना चाहिए, तो इसके पीछे किसी आंदोलन का विरोध नहीं, बल्कि एक गहरी फिक्र और डर होता है।
यह डर उन मुस्लिम नौजवानों को देखकर पैदा होता है, जो दूसरों के हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते सालों जेल में बंद रहते हैं और फिर एक दिन उन्हें पूछने वाला भी कोई नहीं होता।
🧵 आगे पढ़िए…
- पूजा माथुर
बीते महीने की 29 तारीख को मुस्लिम संगठनों ने मस्जिदों पर होते हमलों के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट करने का एलान किया था। जिस रोज़ ये प्रोटेस्ट होना था, ठीक उसी रोज़ @DelhiPolice के लोग सोशल एक्टिविस्ट नदीम खान के घर पहुंच गए, और उन्हें “हाउस अरेस्ट” कर लिया। नदीम खान ने अपने ही घर में कैद किए जाने के खिलाफ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, अब अदालत ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई है।
संविधान और कानून को ताक पर रखकर ‘ऊपर’ के आदेश से चलने वाले पुलिस अफीसर्स के पास अभी भी वक्त है, कि वो संभल जाएं! अभी न्यायपालिका सिर्फ फटकार और कभी कभार जुर्माना लगा रही है, कल अगर इसी न्याय पालिका का रुख और सख्त हुआ तो कानून का मजाक बना देने वाले अफीसर्स और अपने अधिकारों का नागरिकों के खिलाफ दुरपयोग करने वाले अधिकारियो की नौकरी भी जाती रहेगी। तब कोई ‘ऊपर वाला’ नहीं बचा पाएगा।
जो लोग मुसलमानों से कहते हैं कि इनका साथ दो, यही आगे चलकर गांधी-नेहरू बनेंगे, मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि क्या हमारे सफ़ों से मौलाना आज़ाद और दूसरे मुजाहिदीन-ए-आज़ादी जैसे नेता नहीं बन सकते?
चंद व्यू के लिए मुसलमान भूल जाता है की उसके साथ श्याम मीरा सिंह पास्ट में क्या क्या लिखा।
मुसलमानों पर किस तरह का आपतिजनक शब्द इस्तेमाल किया।
मुफ्ती साहब और जावेद अख्तर के डिबेट के बाद मानो ये इंसान पागल ही हो गया था? इस तरह के शब्द लिखे की मै केवल स्क्रीनशॉट ही लगा सकता हूं।
आज जब इसका सोशल मीडिया अकांउट इंडिया में विद्थेल्ड हुआ तो आप लोगों को क्या ही बोलें।
आप बड़ी जल्दी भूल जाते हो कि आपके साथ किसने क्या क्या किया? बुर्का से लेकर नबी पाक तक पर भी इसने टिप्पणियां की।
मैं किसी भी तरह की मार पीट के खिलाफ हूँ लेकिन इसका मतलब ये नहीं की मैं दिलीप मंडल का भी साथ देने लग जाऊंगा।