प्रेम का कोई तर्क नही होता! इसलिए शायद मैं नही जानती कि तुमसे इतना प्रेम क्यों है मुझे। आत्मा के जैसे दो टुकड़े होते है वही एक टुकड़ा तुम हो मेरा! शायद इसलिए तुम्हारा होना मुझे पूर्ण करता है। बिना कोई शर्त तुमने सहज ही मेरा होना स्वीकार किया जैसे!
सुनो तुम सब कुछ हो मेरा..!!!❣️
आज फिर कमरे में बहुत देर तक खामोशी पसरी रही। बाहर की दुनिया अपनी तमाम आवाज़ों के साथ चलती रही, लेकिन मेरे हिस्से में हमेशा की तरह वही धीमा-सा सन्नाटा था। मेज़ पर रखी किताब खुली हुई थी, मगर आँखें शब्दों पर टिक नहीं रही थीं। खिड़की के बाहर आसमान था, भीतर वही पुराना अकेलापन और इन दोनों के बीच जाने कब तुम आकर बैठ गईं।
तुम्हारे बारे में सोचता हूँ तो अक्सर यही ख्याल आता है कि मेरे जीवन के इस साधारण, वीरान कमरे की दीवारों पर लिपटी अमरबेल हो तुम।
कितना अजीब है न…अमरबेल अपने लिए कोई जमीन नहीं चुनती, वह किसी और के सहारे अपना संसार रचती चली जाती है। शायद प्रेम भी कुछ ऐसा ही है। वह आदमी की जिंदगी में किसी शोर के साथ नहीं आता, बस धीरे-धीरे उसकी दीवारों पर फैलता है, उसकी दरारों में उतरता है, उसकी खामोशियों को हरा करता जाता है और एक दिन आदमी पीछे मुड़कर देखता है तो समझ आता है कि जिस जीवन को वह इतने वर्षों से सूना समझ रहा था, उसमें कहीं बहुत गहराई से मोहब्बत उग आई है।
मेरे साथ भी शायद यही हुआ।
मैंने अपने भीतर बहुत पहले एक कमरा बना लिया था। छोटा-सा, साधारण-सा, जिसमें किसी के आने की जगह तो थी मगर किसी के ठहरने की उम्मीद नहीं थी। उस कमरे में मेरी पुरानी यादें थीं, कुछ अधूरे रिश्तों की परछाइयाँ थीं, कुछ ऐसे सवाल थे जिनके जवाब कभी नहीं मिले और कुछ ऐसी चुप्पियाँ थीं जिन्हें मैंने धीरे-धीरे अपना स्वभाव समझ लिया था।
मैंने उस कमरे को सजाया नहीं, बस उसे वैसे ही रहने दिया। शायद इसलिए कि मुझे डर था कहीं कोई आए और मेरी वीरानी देखकर लौट न जाए।
फिर तुम आईं और सबसे खूबसूरत बात ये रही कि तुमने मेरी दीवारों पर लगी उदासी को देखकर कोई सवाल नहीं किया। तुमने ये नहीं पूछा कि यहाँ इतनी खामोशी क्यों है। तुमने ये नहीं पूछा कि खिड़कियाँ इतनी देर से क्यों बंद हैं। तुमने ये भी नहीं पूछा कि दीवारों पर इतने पुराने निशान किसके हैं।
तुम बस वहीं ठहर गईं।
जैसे तुम्हें मेरे भीतर का यह वीरान कमरा पहले से मालूम था। जैसे तुम जानती थीं कि कुछ घरों में रौशनी बाहर से नहीं लाई जाती, वहाँ बस किसी अपने का होना ही काफी होता है, और तुम्हारा होना मेरे लिए वही रौशनी है।
तुमने मेरी जिंदगी को बदलने की कोशिश नहीं की। शायद इसीलिए तुम मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गईं। तुमने मुझे कोई नया आदमी बनाने की कोशिश नहीं की। तुमने मेरे भीतर बैठे उस आदमी को ही प्यार किया जो थोड़ा थका हुआ था, थोड़ा टूटा हुआ था, थोड़ा चुप था और बहुत कुछ कहकर भी कह नहीं पाता था।
तुमने मेरी चुप्पियों को शब्द नहीं दिए, तुमने उन्हें समझ लिया और शायद किसी को समझ लिया जाना, किसी को प्रेम करने से भी बड़ी बात होती है।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ, आखिर तुम्हारे होने में ऐसा क्या है जो मेरे भीतर इतनी हलचल पैदा कर देता है?
फिर कोई जवाब नहीं मिलता। शायद प्रेम का कोई तर्क नहीं होता। अगर होता, तो मैं तुम्हें इतना क्यों चाहता? तुम्हारे होने का कोई कारण नहीं है मेरे पास। बस इतना जानता हूँ कि जब दिन बहुत भारी हो जाता है, तुम्हारा ख्याल उसे थोड़ा हल्का कर देता है। जब मन बहुत थक जाता है, तुम्हारी याद मेरे पास बैठ जाती है। जब लगता है कि दुनिया की सारी आवाज़ें बेकार हैं, तुम्हारी कल्पना भी मुझे पर्याप्त लगती है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम मेरे जीवन में किसी इंसान की तरह नहीं, किसी मौसम की तरह आई हो। ऐसा मौसम जो कैलेंडर देखकर नहीं आता। जो अचानक उतरता है और भीतर की सारी सूखी जमीन को छू जाता है।
तुम्हारे आने के बाद मुझे अपने अकेलेपन से शिकायत थोड़ी कम हो गई है। अब अकेला बैठता हूँ तो तुम्हें याद कर लेता हूँ। खिड़की से बाहर देखता हूँ तो तुम्हारे बारे में सोचता हूँ। किसी गीत में प्रेम सुनाई देता है तो तुम्हारा चेहरा याद आता है। किसी फूल की खुशबू आती है तो मन कहता है ये ख़ुशबू तुम्हारे पास भी होगी क्या? और फिर मैं मुस्कुरा देता हूँ अकेले। मगर अब वह मुस्कान भी अकेली नहीं होती। क्योंकि उसमें तुम होती हो।
शायद यही वजह है कि मैं तुम्हें अपने जीवन की अमरबेल कहता हूँ। तुमने मेरी दीवारों को ढक लिया है, मगर मेरी दीवारें मिटाई नहीं। मेरी वीरानी को खत्म नहीं किया, मगर उसे खूबसूरत बना दिया। मेरे अंधेरे को उजाला नहीं कहा, बस उसके भीतर बैठकर मेरा हाथ थाम लिया और मोहब्बत शायद यही है..किसी के अंधेरे को देखकर उससे उजाला बनने की उम्मीद न करना। बस उसके अंधेरे में उसके साथ बैठ जाना। तुम मेरे साथ बैठी हो मेरी खामोशी में, मेरी थकान में, मेरी अधूरी नींदों में, मेरे अनकहे वाक्यों में, मेरी उन बातों में जिन्हें मैंने कभी किसी से नहीं कहा और इसीलिए तुम्हारा होना मेरे लिए इतना गहरा है।
मैं तुम्हें अपने जीवन में किसी खूबसूरत चीज़ की तरह नहीं देखता।
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जब इंसान अकेले में खुद को ठीक करना सीख लेता है, तब वह बहानों, अधूरे प्रेम, और सुविधा से भरे रिश्तों की सौदेबाजी नही करता। वह जान चुका होता है कि खोकर भी किसी को जिया जा सकता है। जिसने खुद को अपने हाथो से जोड़ा हो, वह दोबारा उस टूटन को किसी और नाम से स्वीकार नहीं करता..!!!
..राम..
आज फिर जाने क्यों मन ने तुम्हारे नाम से एक पूरा दिन लिख दिया। कोई खास वजह नहीं थी, बस तुम्हारा ख्याल आया और फिर जैसे भीतर कहीं बहुत धीरे से कोई दरवाज़ा खुल गया। उस दरवाज़े के उस पार तुम थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं तुम्हें अपने मन में देखना चाहता हूँ..मेरे पास, इतने पास कि तुम्हारी खामोशी भी मुझे सुनाई दे और तुम्हारी साँसों की आहट तक मेरे दिल को सुकून देने लगे।
मैं अक्सर सोचता हूँ कि आखिर तुम्हारे होने में ऐसा क्या है जो मुझे दुनिया की बाकी तमाम चीज़ों से बेपरवाह कर देता है। फिर कोई जवाब नहीं मिलता। शायद कुछ रिश्तों के जवाब होते ही नहीं हैं, वे बस महसूस किए जाते हैं। जैसे सुबह की पहली धूप को महसूस किया जाता है, जैसे बारिश की पहली बूँद को हथेली पर रोककर महसूस किया जाता है, जैसे किसी पुराने गीत को सुनकर अचानक कोई भूली हुई शाम आँखों के सामने उतर आती है।
तुम्हारे साथ मैं कोई बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें नहीं माँगता। मुझे तो बस एक ऐसी जिंदगी चाहिए जिसमें तुम मेरे सामने बैठी रहो और मैं तुम्हें देखता रहूँ। तुम्हारे हाथ में चाय का प्याला हो, तुम्हारे बालों में हवा उलझती रहे और तुम बीच-बीच में मेरी तरफ देखकर यूँ मुस्कुरा दो जैसे मेरी सारी दुनिया तुम्हारी उस एक मुस्कान में समा गई हो।
कितना अजीब है न…प्रेम में इंसान कितना छोटा-सा हो जाता है। पहले लगता है दुनिया चाहिए, फिर कोई एक इंसान मिल जाता है और पूरी दुनिया की जरूरत ही खत्म हो जाती है। फिर उसकी एक आवाज़ काफी होती है, एक मुस्कान काफी होती है, उसका थोड़ा-सा वक्त काफी होता है, और अगर वह सामने बैठकर बस इतना पूछ ले “थक गए हो?” तो लगता है जैसे जिंदगी ने माथे पर हाथ रखकर सारी थकान अपने पास रख ली हो।
मैं तुम्हारे साथ ऐसा ही कुछ चाहता हूँ।
तुम्हारी जिंदगी में ऐसा आदमी बनना चाहता हूँ जिसके पास लौटकर तुम्हें कभी अपने दुखों को छिपाना न पड़े। तुम रो सको, नाराज़ हो सको, शिकायत कर सको, चुप रह सको और मैं फिर भी वहीं रहूँ। तुम्हें समझाने की जल्दी में तुम्हारे आँसू न रोकूँ, तुम्हारी खामोशी को सवालों से न भरूँ, बस तुम्हारे पास बैठा रहूँ…जब तक तुम्हारा मन खुद हल्का न हो जाए।
मैं चाहता हूँ तुम्हें इतना प्रेम दूँ कि तुम्हें कभी अपने प्रेम के लिए लड़ना न पड़े। तुम्हें कभी ये सोचकर रात न गुजारनी पड़े कि मैं तुम्हें चाहता भी हूँ या नहीं। तुम्हें कभी मेरी आँखों में अपने लिए जगह तलाशनी न पड़े।
तुम्हें बस देखना हो और तुम्हें अपना घर दिखाई दे।
शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही है, जब किसी के पास होना किसी जगह पर होना नहीं, बल्कि अपने घर में होना महसूस होने लगे...और तुम मेरे लिए वही घर हो।
तुम्हारे साथ बिताए हुए छोटे-छोटे पल मैं अपनी यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रखना चाहता हूँ। वो सुबह जब तुम नींद में आँखें मलते हुए मेरे पास आओगी, वो दोपहर जब तुम बिना किसी वजह के मुझसे नाराज़ हो जाओगी, वो शाम जब हम चाय लेकर बरामदे में बैठेंगे, वो रात जब तुम दिनभर की सारी बातें मुझे सुनाते-सुनाते अचानक चुप हो जाओगी और मैं पूछूँगा भी नहीं कि क्या हुआ, क्योंकि तुम्हारी आँखें पहले ही सब बता चुकी होंगी।
मैं तुम्हारे साथ उम्र बिताना चाहता हूँ, सिर्फ वक्त नहीं। वक्त तो हर किसी के साथ गुजर जाता है, लेकिन उम्र किसी एक के साथ जी जाती है।
मैं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ अपनी आदतों को बूढ़ा होते देखना चाहता हूँ। वही चाय, वही शाम, वही बातें, वही छोटी-छोटी नोकझोंक और वही मनाना। फर्क सिर्फ इतना हो कि आज मैं तुम्हें देखकर तुम्हारी खूबसूरती में खो जाता हूँ और तब शायद तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में अपनी पूरी जिंदगी पढ़ता रहूँगा।
तब शायद तुम पूछोगी “अब भी इतनी देर तक क्या देखते रहते हो?” और मैं मुस्कुराकर कहूँगा “तुम्हें नहीं…अपनी पूरी जिंदगी को देख रहा हूँ।” क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ आज की मोहब्बत नहीं हो। मैं तुम्हें अपने आने वाले हर कल में चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ मेरी आखिरी याद भी तुमसे जुड़ी हो। जब जिंदगी बहुत लंबी यात्रा के बाद थकने लगे, तब मेरे पास तुम्हारा हाथ हो। मैं उस हाथ को थामकर बस इतना महसूस कर सकूँ कि मैंने प्रेम किया था..सच्चा, गहरा और पूरी ईमानदारी से किया था।
मुझे नहीं पता जिंदगी हमें कितने साल देगी, लेकिन जितने भी दे…मैं उनमें तुम्हें भर देना चाहता हूँ।
सुबहों में तुम्हें, शामों में तुम्हें, चाय में तुम्हें, बारिश में तुम्हें, गीतों में तुम्हें, खामोशियों में तुम्हें और उन तमाम पलों में तुम्हें जहाँ कोई और नहीं होगा, सिर्फ मैं और मेरी मोहब्बत होगी। तुम मेरे जीवन का वह हिस्सा नहीं हो जिसे मैं अलग करके देख सकूँ।
तुम तो.....
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