जब युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का अर्घ्य देने के लिए श्रीकृष्ण को चुना गया तब भीष्म ने कहा मैंने कृष्ण के अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं देखा जिसमें ब्राह्मण सी बुद्धि, क्षत्रियों सी वीरता, वैश्यों सा धन व शूद्रों सी आयु हो और इस सभा में कोई ऐसा भी नहीं जिसे कृष्ण ने अ��ने तेज से न जीता हो
जब शिशुपाल ने भीष्म के ब्रह्मचर्य पर लांछन लगाएँ युधिष्ठिर का अपमान किया, कृष्ण के अपमान में छली, कृतघ्न, स्त्री घातक, गोघात, दास जैसे अपशब्द पर अपशब्द कहे तो श्री कृष्ण ने अपनी फूफी को, शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा दिया वचन सभा को याद दिलाया पर वो न माना तो अंत में उसका वध किया।
बाहुबली फ़िल्म निश्चित ही काल्पनिक फ़िल्म है परंतु इस फ़िल्म में दिखाया गया माहिष्मती साम्राज्य काल्पनिक नहीं है। महाभारत काल में आर्यावर्त्त के दक्षिण भाग में एक अजय माहिष्मती साम्राज्य हुआ करता था जिसको महाराजा युधिष्ठिर के भाई सहदेव ने युधिष्ठिर के राजस��ू यज्ञ के लिए जीता था।
सहदेव ने दक्षिण में पटचर (इलाहाबाद-बाँदा), चम्बल, अवंती (उज्जैन), भोजकट (भीमा नदी के पास), नाटकेय (खानदेश), पांड्य (तिन्नावली व मदुरा), किष्किन्धा, माहिष्मती (महेश्वर), त्रैपुर (जबलपुर), काठियावड, दंडक (महाराष्ट्र), सुरभिपट्टन (मैसूर), कराड़ा (कर्नाटक) मालाबार (केरल) आदि को जिता।
भीम ने पूर्व दिशा में पांचाल (रूहेलखंड), पुलिंद (हरिद्वार के आस पास), भल्लाट, दशार्ण (छत्तीसगढ़), चेदि (बुंदेलखंड), कोशल (अयोध्या), मल्ल (मालवा), मत्स्य (जयपुर), मलद (शाहबाद),वत्सभूमि (कौशाम्बी), निषाद (मारवाड़),मगध (बिहार), बंग, सुह्म (बंगाल व कलिंग के बीच) आदि राज्यों को जिता।
जरासंध वध युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का श्रीगणेश था। चारों भाई दिग्विजय के लिए निकले। अर्जुन उत्तर में, कश्मीर,कलिंद (गढ़वाल व सहारनपुर), शाकल (सियालकोट), परागज्योतिष (अ��म), उरगा (हज़ारा), अभिसारी (राजौरी), कम्बोज (अफगानिस्तान), किम्पुरुष (नेपाल) हरिवर्ष (तिब्बत) को जीत कर लौटे।
ये देवकीसुत श्री कृष्ण की ही महान नीति थी जिसके फलस्वरूप जरासंध जैसे अधर्मी सम्राट का वध हो पाया। जरासंध वध के तुरंत बाद सभी बंधी राजाओं को मुक्त कराया व सभी राजाओं को उनके राज्य लौटाकर, मगध का राज्य जरासंध के पुत्र सहदेव को अर���पण कर स्वयं द्वारिका लौट आए।
सम्राट बनने की कड़ी शर्त सुन युधिष्ठिर ने कहा मुझे सम्राट पद का अभीष्ट नहीं। तब कृष्ण ने समझाया कि जरासंध की सेनाओं के साथ जन-क्षय से बचने का एक मार्ग है उसे उसके घर में घुस कर अकेले में द्वन्द के लिए ललकारना। जरासंध के दो अंग रक्षक हंस व डिंभक को पहले से रास्ते से हटा दिया था।
युधिष्ठिर के राज्य व्यवस्था के बाद विचार हुआ कि युधिष्ठिर अपने आप को सम्राट घोषित करें। श्री कृष्ण को द्वारिका से बुलवाया गया। कृष्ण ने कहा, जो जरासंध को जीतेगा वही सम्राट बनने योग्य है। जिसने ऐल व इश्वाकुवंश की एक सो शाखाएँ पर अनचाहे अत्याचार किए हैं व 86 राजाओं का क़ैद किया है।
इंद्रप्रस्थ बसाने के लिए खाण्डव वन को साफ़ किया गया। उसी दौरान वन के किनारे नाग जाति के तक्षक नाम के व्यक्ति के घर में एक मय जाति का शिल्पकार मिला जिसने युधिष्ठिर के लिए दस हज़ार हाथ परिधि की विमानाकार सभा बनाई। मय जाति के भवन निर्माण कला के अवशेष आज मध्य अमरीका में मिले रहें है
युधिष्ठिर के राज में हर किसान खुश था, ग्वालों का गोधन बढ़ने लगा, हर घर यज्ञ होते थे, चिकित्सा का सुप्रबंध था, अधिक कर की मनाई थी, अधिक ब्याज लेने की मनाही थी, चोर ठगों की नहीं च���ती थी, सभी राजा का कहा मानने के लिए उद्दत रहते थे। प्रजा के लिए महाराज युधिष्ठिर पितृ समान थे।
श्री कृष्ण के विवाह के भाँति ही अर्जुन का विवाह, कृष्ण व युधिष्ठिर की अनुमति से कृष्ण की बहन सुभद्रा से हुआ जिससे उनको एक वीर पुत्र अभिमन्यु हुआ। अभिमन्यु श्री कृष्ण की भाँति वेद ज्ञाता था तो अर्जुन की भाँति चोटी का वीर था। वीर अभिमन्यु श्री कृष्ण व अर्जुन का प्रतिबिम्ब था।
द्रुपद से सम्बन्ध होने के बाद पांडवों की शक्ति बढ़ गई। अब उन्हें छिपने की आवश्यकता नहीं रही। कौरवों से आधे राज्य में खाण्डवप्रस्थ पांडवों के हिस्से आया जिसकी राजधानी इंद्रपस्थ बनाई, जो उस समय की सभ्यता का केंद्र थी जिसके स्थापना ऋषि वेदव्यास द्वारा कराई गई। आज यही स्थान दिल्ली है
पांचालराज द्रुपद ने अपनी पुत्री यज्ञसे���ी के स्वयंवर का आयोजन करवाया जिसे जितने के लिए कर्ण आगे बढ़ा तो यज्ञसेनी ने उससे विवाह करने को मना कर दिया था बाद में अर्जुन ने स्वयंवर जीता। विजेता होने के नाते और यज्ञसेनी की सहमति से युधिष्ठिर से उसका विवाह हुआ।
महाभारत काल में क्षत्रिय कन्याओं के विवाह की तीसरी विधि
जब कन्या का पिता पहली दो विधियों को छोड़ अपनी इच्छा से कन्या का विवाह करे तो उसको बलात्कारी समझा जाता था ऐसे में कन्या जिस वीर को पसंद करती हो वो वीर कन्या को उसके घर से निकाल कर विधिपूर्व��� विवाह करे। जैसे श्रीकृष्ण ने किया
महाभारत काल में क्षत्रिय कन्याओं के विवाह की दूसरी विधि-
कन्या के वीर्य-शुक्ला उद्घोषित करने की अर्थात् कन्यागृह पर सभी वीर एकत्र हो आपस में युद्ध करते थे जो सभी को जीत जाए वह वीर कन्या की इच्छा से स्वयं उससे विवाह करे अथवा अन्य किसी से करावे जैसे भीष्म ने तीन बहनों को जीता था।
महाभारत काल में क्षत्रिय कन्याओं का विवाह तीन प्रकार से होता था।
प्रथम- सभी विवाहार्थी कन्या के घर एकत्र होते थे और जिसने विवाह की शर्त पूरी कर दी और कन्या की भी वह वीर ��ष्ट हुआ तो कन्या का विवाह उस वीर से हो जाता था।जैसे श्री रामचंद्र जी का हुआ था। यह स्वयंवर विधि सबसे उत्तम थी।