कोशिश जारी है राजस्व व्यवस्था में सुधार के लिए। उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा रहा है। प्रत्येक प्रकरण में दोषी के विरुद्ध कार्यवाही शुरू की जा रही है।
शायद इसीलिए सब विरोध करने पर जुटे हैं।
यदि संभव हो सके तो न्यायालय कार्यवाही की ऑनलाइन रिकॉर्डिंग सुनें और बताएं कि और क्या सुधार होने चाहिए? Youtube पर SDM Judicial Orai से मिल जाएंगे। Official वाला चैनल subscribe करें temporary वाला नहीं।
कृपया
@RahulAg22242553 कृपया पूरी जानकारी कर लें –https://t.co/iqE14A51qW
बाकी कैडर ट्रांसफर के लिए request की गई है, आचरण संहिता के लिए कटिबद्ध होने के कारण बहुत से अति संवेदनशील पत्रों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। जैसे – सुरक्षा बढ़ाने की मांग लगातार की जा रही मांग पर कोई कार्यवाही नहीं etc
भ्रष्टाचार को इतना अधिक खुलेआम संरक्षण? इतनी अधिक हिम्मत कहां से आती है?
मुजफ्फरनगर वाला प्रकरण तो इसका हजारवां हिस्सा न था।
इतनी हिम्मत वालों को देखकर जीवन के लिए भय तो लाजिमी ही है।
बहुत गहरी दलदल है, वह भी खूंखार जंतुओं से भरी, साफ दरिया होता तो तैर कर पार कर लेते।
हालात देखकर तो एकदम स्पष्ट है कि यदि देशभक्ति का जज्बा हो तो IAS बनना मतलब विश्व युद्ध के मैदान में फौजी बनना ही है। एक ऐसा फौजी, जिसे दूसरों के साथ ही अपने साथ वाले दुश्मन ही नहीं बल्कि मजबूत स्थिति में भी हों।
जैसा कि पहले ही बताया है सु्प्रशासन ( Basic Governance) के बाद ही असली ड्यूटी शुरू होती है, लेकिन सु्प्रशासन ( Basic Governance) के लिए युद्ध करना ही होगा। जबकि तैयारी, प्रशिक्षण और लक्ष्य भी सु्प्रशासन ( Basic Governance) आगे का है, लेकिन बिना सीखे, बिना तैयारी और बिना इच्छा के ही इस युद्ध के क्षेत्र में कैसे टिकें? जबकि यहां तो लगतार अनुरोध किए जाने पर भी सुरक्षा व्यवस्था ही सही नहीं की जा रही।
शायद कैडर बदलने की request करके सही किया है, हो सकता है कि किसी प्रदेश में तो ऐसी तहसील और जिला हो, जहां भले ही भ्रष्टाचार हो लेकिन भ्रष्टाचार को संरक्षण न हो, एकदम खुला तो कतई भी नहीं।
Back date में जारी किया एक पत्र, dispatch register में ऐसे पत्रों के लिए खाली रखी जाने वाली जगह में fit बिठा तो दिया, लेकिन ?
गंदगी के लगातार बन रहे रहे कीर्तमान से हो रहे आश्चर्यों के धमाके पर धमाके पर विश्वास करने की भी शायद कोई सीमा तो होगी।
लगता है विपश्यना या ऐसा ही कोर्स करना ही पड़ेगा।
हालात देखकर तो एकदम स्पष्ट है कि यदि देशभक्ति का जज्बा हो तो IAS बनना मतलब विश्व युद्ध के मैदान में फौजी बनना ही है। एक ऐसा फौजी, जिसे दूसरों के साथ ही अपने साथ वाले दुश्मन ही नहीं बल्कि मजबूत स्थिति में भी हों।-
एक साथी ने इस पर बताया है कि यह IAS के लिए नहीं है बल्कि प्रत्येक ऐसी स्थिति (सरकारी/गैर सरकारी), जिसमें कुछ बदलाव करने की शक्ति/क्षमता होती है, उन सब कर लागू होता है।
एकदम सहमत।
यही कारण है कि विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं/कार्यकत्रियों की भी हत्याएं तक हुई हैं।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश Governance Traps औपचारिक रूप से On Record ही नहीं होते। वे प्रायः किसी निरीक्षण रिपोर्ट, ऑडिट टिप्पणी या आधिकारिक अभिलेख में दर्ज नहीं मिलते, बल्कि धरातल पर कार्य करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और नागरिकों के अनुभवों में दिखाई देते हैं।
यही वह Opportunity Cost है, जहाँ प्रशासन का समय, ऊर्जा और नेतृत्व संस्थागत सुधार एवं Good Governance की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय बार-बार Basic Governance सुनिश्चित करने में ही व्यय होता रहता है।
इसी उद्देश्य से मैं Governance Traps की अवधारणा प्रस्तुत कर रहा हूँ—ताकि इन अदृश्य किन्तु वास्तविक संस्थागत बाधाओं को On Record लाया जा सके और भविष्य का नीति-निर्माण अधिक Evidence-based, Bottom-up तथा धरातलीय अनुभवों से समृद्ध हो सके।
अगली पोस्ट में: एक वास्तविक प्रशासनिक उदाहरण, जहाँ एक साधारण-सा नियम भी अनजाने में Governance Trap बन जाता है।
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सुप्रशासन से सुशासन की ओर
भाग–2 of 6 : क्या आज भी Basic Governance सबसे बड़ी चुनौती है?
यदि यही प्रश्न आज से 70–80 वर्ष पहले पूछा जाता, तो शायद उत्तर अलग होता।
तब प्रशासन के सामने सूचना का अभाव, सीमित तकनीक, धीमा संचार, अभिलेखों की अनुपलब्धता तथा प्रभावी निगरानी तंत्र का अभाव जैसी वास्तविक चुनौतियाँ थीं।
किन्तु आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं।
आज हमारे पास डिजिटल अभिलेख, GIS, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, Artificial Intelligence, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, डेटा एनालिटिक्स तथा एकीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध हैं।
अर्थात्, प्रौद्योगिकी अब पहले जैसी सबसे बड़ी बाधा नहीं रह गई है।
बाकी नीचे comment में..
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यदि उनका व्यवस्थित Bottom-up Documentation एवं विश्लेषण न हो, तो वे नीति-निर्माण अथवा नीति-सुधार की प्रक्रिया तक पहुँच ही नहीं पाते।
इसके अनेक संभावित कारण हो सकते हैं। नीति-निर्माण स्वयं एक जटिल प्रक्रिया है। विभिन्न प्रशासनिक, विधिक, वित्तीय, सामाजिक तथा राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना होता है।
कुछ परिस्थितियों में Institutional Interests, विभागीय प्राथमिकताएँ, परिवर्तन के प्रति स्वाभाविक प्रतिरोध अथवा प्रभावशाली एवं छिपे हुए हित (Hidden Interests) भी ऐसे मुद्दों को अपेक्षित महत्व मिलने से रोक सकते हैं।
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फिर भी अनेक स्थानों पर हम आज भी Basic Governance (सुप्रशासन) सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं।
ऐसा क्यों?
मेरे विचार से इसका उत्तर केवल तकनीक में नहीं, बल्कि Governance Traps में छिपा है।
कई बार समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि नियमों, प्रक्रियाओं, संस्थागत संरचना, विभागीय समन्वय, उत्तरदायित्व निर्धारण, कार्यसंस्कृति तथा समय के साथ व्यवस्था का हिस्सा बन चुके संस्थागत अवरोधों की होती है।
मेरे विचार से एक महत्वपूर्ण कारण यह भी हो सकता है कि हमारी नीति-निर्माण प्रक्रिया प्रायः Top-down Approach पर आधारित होती है, जबकि अनेक Governance Traps केवल धरातल पर कार्यान्वयन के दौरान दिखाई देते हैं।
न जाने कितना नीचे गिरने की ठान चुके है जालौन के अधिकारी,वह भी मात्र मुझे नीचा दिखाने के लिए।।
लेकिन वे शायद भूल जाते हैं कि मेरा जैसा आदमी अपनी कोई इज्जत समझता ही नहीं जो उनको सफल होने दे।
उनकी नीचता की सीमा देखकर बस इतना ही समझ आता है कि क्या इतना भी गिर सकता है कोई अधिकारी?
फिर सोचना पड़ता है कि यदि इससे भी ज्यादा गिरे तो क्या कर सकते हैं?
एकदम सोच से परे।
सुप्रशासन से सुशासन की ओर
भाग–1 (4/4)
जब पूरा प्रशासनिक तंत्र केवल Basic Governance स्थापित करने में ही अपनी अधिकांश ऊर्जा, समय और क्षमता लगा देता है, तब Good Governance की दिशा में आगे बढ़ना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है। यही सबसे बड़ी Opportunity Cost है।
मेरे विचार से एक IAS अधिकारी की वास्तविक परीक्षा Basic Governance सुनिश्चित होने के बाद प्रारम्भ होती है।
इस श्रृंखला का उद्देश्य किसी व्यक्ति, विभाग या सरकार की आलोचना नहीं है।
मेरा उद्देश्य केवल उन संस्थागत कारणों पर विचार करना है, जिनके कारण अनेक बार प्रशासन अपनी पूरी निष्ठा और परिश्रम के बावजूद अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता।
आने वाली पोस्टों में वास्तविक प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर इस अवधारणा को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करूँगा।
क्रमशः… (4/4)
सुप्रशासन से सुशासन की ओर
भाग–1 (3/4)
जब संस्थाएँ बाहर से कार्य करती हुई दिखाई दें, किन्तु उनकी वास्तविक क्षमता अपने वैधानिक एवं संवैधानिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में लगातार कमजोर होती जाए, तो मेरे विचार से यही Institutional Hollowness है।
अनेक परिस्थितियों में इसका परिणाम वही होता है, जिसे Fred W. Riggs ने Formalism कहा था—अर्थात् कागज़ पर नियम और धरातल पर परिणाम, दोनों के बीच बढ़ती हुई दूरी।
मेरे विचार से Basic Governance किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि उसकी न्यूनतम अपेक्षा है।
(3/4)
सुप्रशासन से सुशासन की ओर
भाग–1 (2/4)
मेरे विचार से Governance Trap वह स्थिति है, जहाँ व्यवस्था के भीतर मौजूद नियम, प्रक्रियाएँ, संस्थागत संरचनाएँ, प्रोत्साहन, संसाधनों का वितरण, समन्वय की कमी अथवा कार्यसंस्कृति स्वयं ऐसी बाधाएँ उत्पन्न करने लगती हैं कि Basic Governance (सुप्रशासन) और Good Governance (सुशासन) दोनों ही अपने उद्देश्य तक नहीं पहुँच पाते।
जब ऐसे Governance Traps लंबे समय तक बने रहते हैं, तो वे धीरे-धीरे Institutional Hollowness (संस्थागत खोखलेपन) का रूप लेने लगते हैं।
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सुप्रशासन से सुशासन की ओर
भाग–1 (1/4) : Governance Trap अवधारणा
प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता रहा है।
सरकारें बदलती हैं।
अधिकारी बदलते हैं।
तकनीक बदलती है।
नई योजनाएँ आती हैं।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बनते हैं।
कानूनों में संशोधन होते हैं।
फिर भी अनेक प्रशासनिक समस्याएँ वर्षों तक लगभग वैसी ही क्यों बनी रहती हैं?
क्या इसका कारण केवल संसाधनों की कमी है?
या केवल व्यक्तिगत अक्षमता?
या इसके पीछे कुछ गहरे संस्थागत कारण (Institutional Causes) भी हैं?
इन्हीं प्रश्नों पर विचार करते हुए मेरे मन में एक अवधारणा विकसित हुई, जिसे मैं "Governance Trap" कहता हूँ।
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कुछ शुभचिंतकों की सलाह पर आधा वेतन वाला पत्र X पर भी पोस्ट किया जा रहा है। Facebook पर पहले ही share किया गया था।
देखना है कि कब तक आधा वेतन पर गुजारा हो सकेगा?
हालांकि मुझे वर्तमान में एकदम अलग थलग कर दिया है, जनपद के साथ ही आश्चर्यजनक तरीके से मंडल ने भी।
षड्यंत्र एकदम जोरों पर हैं। हालांकि इन षड्यंत्रों से लगातार बचते रहने से भी सीखने को बहुत कुछ मिल रहा है। क्योंकि छोटी सी भी चूक को क्या न बना दिया जाय?
कोल्ड स्टोरेज वाली घटना से अपनी भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intellegence) पर कार्य करने का मार्ग मिला है। कोल्ड स्टोरेज में हमला न हो जाए, यही संभावित डर प्रस्तुतीकरण को अलग कर गया। हालांकि अब निर्णय लिया गया है कि पिटाई खा ली जाएगी लेकिन उस समय जवाब नहीं दिया जाएगा।
वैसे भी कुछ वर्ष पहले उन्हीं महाशय द्वारा बिजली चोरी करते हुए वीडियो साक्ष्य बनाने पर, महाशय ने एक बिजली विभाग के इंजीनियर की पिटाई कर दी थी, FIR हुई लेकिन दवाब बनाकर FIR के बाद समझौता करवा दिया गया, और भी बहुत कुछ।
मतलब मैं भावनात्मक बुद्धिमत्ता अत्यधिक न होने के कारण वहां से सकुशल बचकर ही निकल आया।
बस सच का रास्ता नहीं छोड़ना है, आज न सही फिर कभी सही; यहां नहीं तो वहां। लेकिन कभी तो अवसर मिलेगा अपनी योग्यता से आमजन को पूरा लाभ दिलाने का,
@dklawkadk इस सवाल पर 2009 में हुए attack से पहले खूब विचार किया था और उत्तर मिलने पर, जीवनभय होते हुए भी सही कार्य करना नहीं छोड़ा।
ऐसे सवालों के लिए अब तो बहुत देर हो चुकी है, क्योंकि जीवन में इतना कुछ मिला है कि अब तो बस उधारी ही चुकानी है।
जालौन तहसील में तो संभव नहीं हो सका यह, कहीं और देखते हैं। क्योंकि पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ कार्य किया जाये तो बहुत कुछ बदलने की क्षमता है इस पहल में।
वास्तविकता यह है कि जब जनपद जालौन में सीनियर अधिकारियों को बताया कि मथुरा में PINK MNREGS को सफलतापूर्वक संचालित किया था ट्रेनिंग की अल्प अवधि में ही, तो सभी ने मात्र हवाबाज़ी ही माना।
उस समय इस news cutting की काफी खोजबीन की लेकिन मिल नहीं पाई, और जनपद जालौन में सीनियर अधिकारियों को विश्वास ही नहीं दिलवा पाया कि मैं हवाबाजी नहीं कर रहा हूं, और इस कारण मिला नकारात्मक सहयोग।
शायद विश्वास न करने का बड़ा कारण बहुत कुछ छुपाना भी हो सकता है, जिसके पुष्ट साक्ष्य तहसील जालौन में लगातार मिल रहे थे, यदि कुछ समय और रहता तो जांच हो ही जाती।