कल बॉलीवुड वालों का दिन था। खूब अमित शाह की तारीफ में पोस्ट किए गए।
ऐसा माहौल बनाया जा रहा था जैसे की बीजेपी से अगले प्रधानमंत्री के दावेदार यही होंगे।
वैसे @grok ये बताओ अगर बीजेपी से कोई दूसरा PM का दावेदार है तो कौन होगा?
क्या चीनी सेना के साथ जारी झड़पों की जानकारी को इसलिए दबाया गया ताकि चीन के राष्ट्रपति शी का BRICS समिट के लिए भारत दौरा होना था? तो या कोई वजह है? क्योंकि वे आ कर तो चले गए लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ‘आँखें लाल’ कर बात नहीं कर पाए हैं!
तीन जजों की बेंच के लाल बाबू हुसैन के फैसले को दरकिनार करते हुऐ और RP Act की धारा 21 (3) की बेतुकी व्याख्या से जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने SIR को हरी झंडी देकर देश के लोकतंत्र का बड़ा अहित किया है.
रिटायर होने से पहले इस फैसले को वापिस लेकर उन्हें इस पाप से मुक्ति लेनी चाहिये.
एक और मज़ार पर हथोड़ा चलाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो हरियाणा का बताया जा रहा है। नफ़रत किसी क़दर बढ़ती जा रही है कि महज़ रील बनाने और नफ़रत परोसने के लिए इस तरह का काम किया जा रहा है। सबसे दुःखद ये है कि इन कामों कि मज़म्मत करने वाला कोई नहीं…
Mama,
I last saw you and Papa together more than 35 years ago. Since the day Papa left, I have watched you face everything life threw at you with never-ending courage and dignity. Only Priyanka and I really know what you have been through, and how difficult your life after Papa truly was.
I am happy, and so proud, that your story - “Belonging: A Journey of Love” - will finally be read by the millions of people who love you. I know how hard it was for someone as private as you to tell the world your beautiful story.
Today, on his birthday, I can see Papa smiling and looking down proudly at his beautiful Sonia.
Love,
Rahul
बीजेपी-RSS के पास प्रमुखत: दो मुद्दे थे -
धर्म और राष्ट्रवाद
धर्म के नाम पर भगवान का मंदिर लूटकर खा गए।
राष्ट्रवाद के मामले में चीन और अमेरिका दोनों के आगे दंडवत लेटे हैं।
चीन के साथ हर टकराव को छुपाते हैं, चीनी कब्जे से इनकार करते हैं। अमेरिका इन्हें ऐसे हाँक रहा है जैसे इनको खरीदकर यहां प्लांट किया है। वह भारत की विदेश नीति और व्यापार सब कंट्रोल कर रहा है। भारतीय शेयर बाजार में हर दिन हाहाकार की स्थिति है।
भारत की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पूरी तरह ट्रंप पर निर्भर हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत बोलकर "ट्रंप निर्भर भारत" बना दिया है।
चौधरी अभी डर देखा कहाँ है तुमने!
जब तुम्हारे भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्तियों और देश में घृणा और हिंसा फैलाने की तुम्हारी फाइलें खुलेंगी डर तुम्हें तब लगेगा।
रही बात श्रीनिवास की तो ये वो आदमी है जिसने तुम्हारे जैसे कई संघी कीड़ों की कोविड के दौरान जान बचाई! इस आदमी ने ना पंथ देखा ना जाति, ना विचार देखा ना लैंगिक पहचान सिर्फ़ मदद की, वो भी मौत की हद तक जाकर!
हाँ चौधरी हमें सब याद है और सब याद भी रखा जाएगा!
44 सीटें भी याद हैं और 100 करोड़ रुपये की रिश्वत माँगता हुआ तुम्हारा रावण जैसा चेहरा भी याद है, हमें ये भी याद है कि कैसे तुम्हारे जैसे बिके हुए लोगों को जनता पास देखते ही धिक्कार के भगा देती है। बाहर लोगों के पास जाने में आज भी तुम्हारी पतलून भी जाती है, हमें ये भी याद है!
चौधरी तुम्हें डरना चाहिए क्योंकि राहुल गांधी के सामने जब तुम्हारे आक़ा और ‘डिप्टी-आक़ा’ दोनों की घिग्घी बँधी हुई है, उनकी शक्ल तक दिखाने की हिम्मत नहीं हो रही है तो सरकार जाने के बाद तुम्हारा क्या होगा!
इसे धमकी तो बिलकुल मत समझना चौधरी! जब कांग्रेस के काल में क़ानून काम करना शुरू करेगा तो तुम्हें लोकतांत्रिक तरीके से हम सब भारत का संविधान अच्छे से पढ़ायेंगे!
जय हिन्द! जय संविधान!
अखिलेश यादव जी पूर्व सपा सांसद और 10 बार MLA रहे आजम खान साहब से मिलने रामपुर जेल पहुंच चुके हैं।
आजम खान साहब आज भी अपने दम पर 25-30 MLA तो जेल में रह कर ही जितवा सकते हैं।
मिस्टर नेतन्याहू आपका चुनाव फंसा हुआ है. टाइम कम अब 27 अक्टूबर में फिर भी आपके दोस्त के पास एक आदमी है जो कुछ घपलेबाजी करके निकलवा देगा.
उसका नाम ज्ञानेश कुमार वोटचोर है.
फोन कर लीजिये.
गांधी जी भी चाहिए और गोडसे भी…🤷
वाह रे विचारधारा, बापू की तस्वीर भी लगाओ और उनके हत्यारे का महिमामंडन भी…
इसे ही कहते हैं, सिद्धांत कुछ और, काम कुछ और…🤣
#WestBengal
साल 2020 से 2024 के बीच अमेरिका की संस्थाओं से आरएसएस से जुड़े संगठनों को 11.7 करोड़ डॉलर (लगभग 231-233 करोड़ रुपये) से अधिक का चंदा मिलने के दस्तावेज सामने आए हैं. यह खुलासा नीदरलैंड की खोजी पत्रकारिता वेबसाइट Bellingcat की अक्टूबर 2026 की एक रिपोर्ट में किया है । अमेरिका स्थित Sewa USA और एकल विद्यालया फाउंडेशन ऑफ यूएसए (Ekal USA) जैसी संस्थाओं के जरिए यह धन ट्रांसफर हुआ । इस फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 2.44 करोड़ डॉलर) अमेरिकी 'डोनर-एडवाइज्ड फंड' (DAF) के माध्यम से आया, जिससे मूल दानदाताओं (Donors) की पहचान छिपी रहती है। अब ये लोग देश में चल रहे आंदोलन को विदेशी फंडिंग संचालित कह रहे हैं , सरकार आपकी, एजेंसी आपकी, मुकदमा कायम करो और विदेशी षड्यन्त्र में शामिल को गिरफ्तार करो न ! हालांकि दिल्ली क्राइम ब्रांच बड़ी अजिश का मुकदमा कायम कर कुछ लोगों को जेल भेजने की जुगाड़ में है लेकिन विदेश से चंद लेने वाले अपंजीकृत आरएसएस पर सब मौन हैं ।
जो मीडिया पीछले 12 सालों से गांधी परिवार को गुनहगार बता रही है,वो कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों की दोस्त है।उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि,नेतृत्व को कौन गाली दे रहा है !
अमेरिका से भारत दबाकर LPG खरीद रहा है. खास बात है कि अमेरिका वाला LPG हमें महंगा पड़ रहा है, इसके बाद भी हम खरीद रहे हैं.
कल अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी बताया- भारत को सबसे ज्यादा LPG सप्लाई करने वाला देश अमेरिका बन गया है. एक साल में ये हिस्सेदारी 10% से बढ़कर 67% हो गई है.
हमें UAE से सस्ता LPG मिल सकता है, लेकिन हम अमेरिका वाला महंगा LPG खरीद रहे हैं.
ट्रंप तो "America First" की नीति पर काम कर रहा है. इसलिए हम पर दबाव बनाकर LPG और वेनेजुएला वाला कच्चा तेल बेच रहा है.
हमारे वाला भारत को क्यों नुकसान पहुंचा रहा है. वो क्यों नहीं "India First" बोलकर, तनकर खड़ा हो जाता है.
आखिर डर किस बात का है?
"पिछले वक्त में अरुणाचल में कई जगहों पर (चीन के साथ) फेस ऑफ हुआ था और अब भी चल रहा है…"
भारत में चीन के "हितैषी" कौन लोग हैं जो ये सब जनता को पता नहीं चलने देते? हमारे सुरक्षा तंत्र के टॉप पर बैठे राजनीतिक लोग हमसे ये क्यों छुपाते हैं कि हमारी सेनाएं किन हालात का सामना कर रही हैं?
वे भारत के लिए काम करते हैं या चीन के लिए?
कल्पना कीजिए, अगर किसी समाज में सभी लोग एक जैसा सोचते हों, एक जैसी राय रखते हों और हर मुद्दे पर सहमत हों, तो असहमति से पैदा होने वाले टकराव की संभावना कम हो सकती है। लेकिन वास्तविक समाज में ऐसा नहीं होता। लोगों के विचार, धर्म, राजनीतिक मान्यताएं और जीवन के अनुभव अलग-अलग होते हैं।
लोकतंत्र की खूबसूरती ही इस विविधता में है।
कानून इसलिए नहीं बना कि सभी लोग एक जैसा सोचें। कानून इसलिए जरूरी है कि अलग-अलग सोचने वाले लोग भी अपने अधिकारों के साथ जी सकें और उनके विवादों का समाधान ताकत के बजाय न्याय के जरिए हो।
अगर संविधान केवल संविधान में विश्वास रखने वालों की ही रक्षा करे, तो फिर उस व्यक्ति के अधिकारों का क्या होगा जो संविधान की आलोचना करता है? अगर किसी कैदी के विचार संविधान के प्रति अविश्वास जताते हैं, तो क्या सिर्फ इस कारण उसके अधिकार समाप्त हो जाएंगे?
शरजील जनवरी 2020 से जेल में हैं। सितंबर 2026 में उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज हुई थी। उनके मामले में लंबी कैद, मुकदमे की प्रगति और निष्पक्ष सुनवाई के सवाल उठाना किसी अपराध का समर्थन करना नहीं है। जमानत का फैसला अदालत मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर करती है, लेकिन न्याय में देरी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवालों पर बहस करना भी उतना ही जरूरी है।
किसी के अधिकारों की बात करने के लिए उसका समर्थक होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी इंसाफ की सबसे बड़ी परीक्षा ही यह होती है कि हम उस व्यक्ति के अधिकारों की बात करें, जिसके विचारों से हम पूरी तरह असहमत हैं।
शेखर गुप्ता हों या कोई अन्य पत्रकार, उन्हें शरजील के विचारों की आलोचना करने, उनके बयानों पर सवाल उठाने और उनके तर्कों को चुनौती देने का पूरा अधिकार है।
लेकिन पत्रकारिता का दायित्व सिर्फ सवाल उठाना नहीं, बल्कि तथ्यों को संदर्भ सहित सामने रखना भी है।
किसी बयान का एक हिस्सा उद्धृत करके पूरे व्यक्ति की विचारधारा पर निष्कर्ष निकालना हो, या किसी विवादित बयान के आधार पर पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा कर देना हो - दोनों ही स्थितियों में सावधानी जरूरी है।
और यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो शरजील के विचारों का समर्थन करते हैं। उन्हें भी उनके हर तर्क की जांच करनी चाहिए। केवल इसलिए किसी विचार को सही नहीं मान लेना चाहिए कि उसे कहने वाला व्यक्ति जेल में है या उसके साथ अन्याय होने की आशंका है।
न्याय की मांग और विचारधारा का समर्थन दो अलग-अलग चीजें हैं।
लेकिन एक सवाल उन लोगों से भी है जो खुद को लिबरल, लोकतंत्र का समर्थक और संविधान का रक्षक कहते हैं।
क्या आपकी संवैधानिक प्रतिबद्धता उन लोगों तक सीमित है, जिनकी राजनीति और विचारधारा आपसे मेल खाती है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल उठाते समय व्यक्ति की धार्मिक पहचान और राजनीतिक असहमति भी आपके फैसले को प्रभावित करती है?
अगर ऐसा है, तो फिर यह उदारवाद नहीं, सुविधा के अनुसार चुने गए सिद्धांत हैं।
The Print में प्रकाशित शरजील इमाम के इंटरव्यू पर आई प्रतिक्रिया को भी इसी कसौटी पर परखना चाहिए।
इंटरव्यू क्यों लिया गया? शरजील ने किन सवालों के जवाब दिए? उनके विचारों को कितना संदर्भ मिला? और इस बहस का इस्तेमाल क्या किसी व्यक्ति के विचारों की आलोचना के लिए हो रहा है या पूरे समुदाय को निशाना बनाने के लिए?
इसी तरह, शरजील ने जेल से इंटरव्यू देने का निर्णय क्यों लिया, यह पूछना भी उचित है।
उनकी अंतरिम जमानत के दौरान उन्हें मीडिया से बचते हुए देखा गया था फिर अचानक से उन्हें इस इंटरव्यू की जरूरत क्यों आ पड़ी?
आज जब देश में सरकार की नीतियों, लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक जवाबदेही पर बहस हो रही है, तब यह और जरूरी हो जाता है कि ऐसे समय में इस तरह के बयानात क्यों?
- पूजा माथुर #PoojaMathur
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