उत्तर प्रदेश में चुनाव का टिकट बेचना अब आम हो गया है कोई 5 करोड़ में बेच रहा है तो कोई 15 करोड़ में
दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार
निषाद पार्टी में टिकट का रेट 5 करोड़ चल रहा है
राजभर पार्टी में टिकट का रेट 6 करोड़ है
अनूप्रिया की पार्टी में 7 करोड़।
भाजपा में तो रेट दोगुना बताया गया 10-15 करोड़।
पक्ष हो या विपक्ष बिना पैसे के टिकट कहीं नहीं है।
छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा के पोड़ी राछा में जो हुआ, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि डीएड अभ्यर्थी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी नियुक्ति की मांग कर रहे हैं, तो उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या लोकतंत्र में अपनी मांग का पोस्टर दिखाना भी अपराध है? यदि राजनीतिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों को मुख्यमंत्री तक पहुंचने की छूट थी, तो बेरोजगार युवाओं के लिए अलग नियम क्यों?
जिन युवाओं ने वर्षों पढ़ाई की कानूनी लड़ाई लड़ी और न्यायालय से राहत हासिल की उन्हें नौकरी के बजाय थाने का रास्ता क्यों दिखाया गया? क्या प्रशासन का काम संवाद स्थापित करना है या असहमति को दबाना? और यदि अभ्यर्थियों ने कोई अपराध नहीं किया था तो उनसे शपथ पत्र लिखवाने की आवश्यकता क्या थी? सरकार और प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए, क्योंकि यह मामला केवल 2300 पदों का नहीं, बल्कि युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों और व्यवस्था पर उनके भरोसे का भी है।
एक तरफ़ भारतीयों की अर्थियाँ उठ रही हैं दूसरी तरफ साहब विदेश पहुँच गए हैं
स्टूडियों में सवाल की जगह प्रशंसा में शो किए जा रहे हैं, है ना कमाल की देशभक्ति?
: अभिनय मैथ्स, शिक्षक
अगर गंगा राम मिश्रा की जगह कोई SC, ST या OBC आरोपी होता, तो टीवी पर बहसों का तूफान आ जाता, पूरा समाज कठघरे में खड़ा होता, मेरिट-आरक्षण पर लेक्चर चलते और अपराध को समुदाय का चरित्र बता दिया जाता।
लेकिन आरोपी ब्राह्मण है, तो अपराध अचानक "व्यक्तिगत गलती" बन जाता है और कई लोगों की नैतिकता चुप हो जाती है।🔥🔥🔥
मान. मुख्यमंत्री @vishnudsai ज़ी आपके राज में दलित कानून के साये में भी सुरक्षित नहीं है। विचाराधीन कैदी का रायगढ़ में मौत का यह दूसरी घटना है। क्या यही आपका मोदी की गारंटी और सुशासन है।
जातीय आतंक का घिनौना चेहरा!
उत्तराखंड के चंपावत जिले में एक दलित टैक्सी ड्राइवर कम किराए पर सवारी ले गया, तो अन्य सवर्ण ड्राइवरों ने जूतों की माला पहनाकर उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया।
ये हरामखोर खुद तो सवारियों को मनमाना लूटते हैं, लेकिन अगर कोई दलित सही किराया ले तो उसे भी अपमानित करते हैं। इन कायर झुंड ने जिस तरह एक दलित को घेरकर उसे मां-बहन एवं जातिसूचक गालियां दीं, उसे जूतों की माला पहनाई, भरी सड़क पर खड़ा करके उसका वीडियो बनाया, और इतने से मन नहीं भरा तो पूरे दलित समाज को अपमानित करने के लिए उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया। इतना खूंखार एवं निर्दयी तो कोई आतंकी भी नहीं होता है। ये हरामखोर उससे भी ज्यादा निर्मम होते हैं।
पीड़ित की तहरीर व साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने द्विज हिंदू सोबरन सिंह, सोबरन सिंह, हरीश बोहरा और मोहन चंद्र के खिलाफ BNS एवं SC-ST Act की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। एक मासूम एवं ईमानदार ड्राइवर को घेरकर उसे जूतों की माला पहनाते समय ये गुर्गे दबंग बन रहे थे, अब FIR होते ही सारी हेकड़ी अंग विशेष में घुस गई है। भागे-भागे घूम रहे हैं। इतनी कठोर धाराएं लगी हैं कि अब ये अपनी गंदी परवरिश एवं जातिवादी मानसिकता पर पूरा जीवन पछताएंगे।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का “दुरुपयोग” हो रहा है, यह बात आए दिन कोई न कोई कहता दिखाई देता है। अभी @richaanirudh जी भी यही कह रही हैं।
दरअसल, यह शोषित-वंचित समाज को मिले कानूनी सुरक्षा कवच को बदनाम कर उसे कमजोर करने की साजिश है।
हमारा सवाल है रिचा अनिरुद्ध जी से कि ऐसा कौन सा कानून है, जिसके दुरुपयोग की शिकायतें नहीं हुई हैं?
सबसे बड़ा दुरुपयोग तो जाति, ऊँच-नीच और सामाजिक वर्चस्व का हुआ है, जिसने करोड़ों शोषित-वंचितों को हजारों साल अपमान, हिंसा और भेदभाव में जीने पर मजबूर किया। उस “दुरुपयोग” पर इतनी बेचैनी क्यों नहीं दिखाई देती?
दुरुपयोग तो राज्य की शक्ति का भी होता है, झूठे मुकदमे भी लगते हैं, निर्दोष लोग भी फँसते हैं। फिर क्या सारे कानून खत्म कर दिए जाएँ? क्या राज्य की व्यवस्था खत्म कर अराजकता को स्वीकार कर लिया जाए?
और वैसे भी, अगर किसी कानून का दुरुपयोग होता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा करने और न्याय पाने का अधिकार हर व्यक्ति को है।
सच यह है कि समस्या कानून नहीं, बल्कि वह मानसिकता है, जिसने दलितों, आदिवासियों और वंचितों का बराबरी से जीना आज भी स्वीकार नहीं किया। इसलिए बार-बार SC/ST Act को निशाना बनाया जाता है, ताकि समाज में नफरत और भ्रम फैलाकर इसे कमजोर किया जा सके।
जय भीम! SC/ST Act जिंदाबाद!
मरे हुए विपक्ष में से .@VinodJakharIN आपको अक्सर सड़क पर दिखेंगे।
कभी शिक्षा पर कब्जा करते RSS के ख़िलाफ़ तो कभी NEET से दुखी छात्रों के पक्ष में।
ऐसा क्यों? विनोद तो सेट है ना?
हाँ। सेट तो है लेकिन बिल्कुल गरीब परिवार से आने वाला विनोद ग़रीब और परेशान लोगों की चिंता बहुत अच्छे से समझता है। AC में पैदा हुआ होता तो AC में बैठकर राजनीति करता।
डरपोक आमिर खान।
एक समय था जब आमिर खान 'सत्यमेव जयते' शो के जरिए देश बदलने की खूब बड़ी-बड़ी बातें करते थे।
दो दिन पहले उन्होंने आमिर खान प्रोडक्शंस से पीपली लाइव मूवी का "महंगाई डायन खाए जात है" गाना अपलोड किया था। सत्ता से डर के मारे वीडियो ही डिलीट कर दिया।
Journalism is sometimes confrontational. We seek answers. If any interview subject, especially with power, do not answer what I asked, I will try to interrupt and get a more focused response. That is my job & duty. I want answers and not just talking points.
Primeminister of India, Narendra Modi, would not take my question, I was not expecting him to.
Norway has the number one spot on the World Press Freedom Index, India is at 157th, competing with Palestine, Emirates & Cuba.
It is our job to question the powers we cooperate with.