एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि अगर आपकी ट्रेन छूट गई हो तो उसका टिकट जेब में रखना व्यर्थ ही है उसी तरह बीते हुए मौकों और लोगों को पकड़कर रखना भी केवल समय और मन की शांति खोना है..
आज से 15-20 साल पहले लोग
सांई बाबा को पूजते थे.
फिर ट्रेंड आया महादेव का,
उसके बाद नंबर आया खाटू श्याम जी का,
और वर्तमान में ट्रेंड चल रहा है सेठ सांवरिया का
मेरा मकसद किसी की
धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है।
लेकिन जब समय बदलता है,
तो लोग अपना भगवान भी बदल देते हैं,
और तुम तो फिर भी इंसान हो।
आज गुरु पूर्णिमा है. अपने गुरुजनों की वंदना का दिन. किसी ने टाट-पट्टी वाले स्कूल में पढ़ाया. किसी ने सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में सिखाया. सब का आभार, सब को प्रणाम.🙏 #गुरु_पूर्णिमा
जब कोई बहुजन अच्छा दिखता है, आत्मविश्वास से बोलता है और आगे बढ़ने की बात करता है, तो अक्सर सबसे पहले यही कहा जाता है— "तुम तो सवर्ण की तरह सोचते हो।"
तरक्की, आत्मविश्वास और ज्ञान किसी एक जाति की पहचान नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है।✍️
आज मेरे एम.आई.टी.एस कॉलेज मित्र प्रो.शैलेस कौशल जी लखनऊ विश्वविद्यालय की माताजी श्रद्धेय: कमला कौशल जी के परित्राण पाठ में मैत्रीय बौद्ध विहार,गाजियाबाद यूपी पहुँच कर अपने परिवार एवं एमआईटीएस परिवार की ओर से माताजी के चरणों में पुष्प अर्पित कर..💐💐 शोकाकुल परिवार से मिलकर संवेदनाएं व्यक्त की..!!
@DrRajes59724506@DayalSi89950065
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से दलित इतना खुश क्यो है? जबकिं इस समय उनके लिए;
"आत्मचिन्तक करने का समय है कि उनकी सरकारों की नजर में कितनी हैसियत है व देश का यह 18% जनसँख्या वाला वर्ग कितना दवाबकारी है? क्योंकि रोहित वेमुला मामले में जो एससी नही करवा सके, सामान्य वर्गों ने करवा दिया"
धर्मेंद्र प्रधान मोदी सरकार पर पहले से ही शिक्षा मंत्री के तौर पर बोझ बन गए थे। उन्हें मंत्रालय बदला जाना तय था। कारण? एससी/एसटी की तरह ओबीसी समाज को विश्वविद्यालयो में समता नियमो के तहत प्रोटेक्शन देने वाली यूजीसी गाइडलाइंस को लागू करना व इसके बाद सामान्य वर्गों के गुस्से के केंद्र में धर्मेंद्र प्रधान का आ जाना क्योंकि इस गाइडलाइंस को तुंरन्त केंद्र सरकार द्वारा वापस नही लिया गया बल्कि सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से रोक लगाई गई। उस समय भी गाइडलाइंस पर धर्मेंद्र प्रधान को टारगेट किया जा रहा था। इस विवाद के कारण धर्मेंद्र प्रधान की छवि पहले ही नेगेटिव थी।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफे की सबसे बड़ी जीत सामान्य वर्ग द्वारा बनाये गए ईको सिस्टम की है क्योंकि उन्होंने जब UGC गाइडलाइंस पर सड़को पर पूरे देश मे उत्पात किया, तब भी केवल गाइडलाइंस वापस ली गयी लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रोटेक्शन धर्मेंद्र प्रधान को मिली क्योंकि उड़ीसा में भाजपा को स्थापित करना था। तब से लेकर आज तक सामान्य वर्गों के संगठनों के टारगेट पर धर्मेंद्र प्रधान व नरेंद्र मोदी आ गए। लेकिन सामान्य वर्ग जो कि देश मे केवल 10% से 15% है, उनके बस की बात नही थी कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाया जा सके।
कॉकरोच मूवमेंट इसलिए सफल रहा क्योंकि इसे सामान्य वर्गों के संगठनों व व्यक्तिओ का समर्थन मिला। उन्होंने डायरेक्ट नही तो रास्ते आसान किये। जैसा हर भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन में सामान्य वर्ग प्रोटेक्शन देते है, इस मामले में गायब रहे, बल्कि प्रोटेस्ट मे शामिल थे।
अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद;
"UGC गाइडलाइंस कभी लागू नही होगी"
प्रश्न : इससे नुकसान किसे हुआ?
उत्तर : ओबीसी वर्गों को
प्रश्न : लाभ किसे हुआ?
उत्तर : सामान्य वर्गों को।
अनुसुचित जाति/जनजाति के लिए
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रोहित वेमुला केस इस वर्तमान के केस से बड़ा केस हो गया था। उसमे दो मंत्रियो स्मृति ईरानी व बंगारू दत्ततेय का इस्तीफा 100% होना चाहिए था क्योंकि जँहा पेपर लीक में डायरेक्ट धर्मेंद्र प्रधान की गलती नही थी लेकिन एक कंट्रोलक के तौर पर जवाबदेही थी, वंही रोहित वेमुला केस में;
"बंगारू दत्तात्रेय ने स्मृति ईरानी को एससी छात्रो के खिलाफ पत्र लिखा, स्मृति ईरानी ने उपकुलपति को पत्र के साथ साथ Action taken report तक माँगी। जो इतनी ज्यादा दवाबकारी थी कि एससी छात्रो को सीधा प्रत्यक्ष शोषण हुआ.
इस मामले को बहनजी ने संसद में उठाकर चलने नही दी। दलित मुद्दों पर आजादी के बाद केवल बहन कुमारी मायावती में ही इतना दम था कि संसद चलने नही दी। एक नही बल्कि यह तीसरा मुद्द्या था जब बहनजी ने संसद चलने नही दी। न तो पहले और न बाद में किसी दलित की इतनी हैसियत नही हुई कि संसद में दलित मुद्दों पर तब तक चलने न दे, जबतक की उन्हें चर्चा का मौका न दे।।
लेकिन क्या?
स्मृति ईरानी का इस्तीफा हुआ?
बंगारू दत्तात्रेय का इस्तीफा हुआ?
उसे छोड़िए। हैदराबाद विश्वविद्यालय के उपकुलपति जो एट्रोसिटी में सीधा सीधा जेल जाना चाहिए था, उसे विशेष पुरष्कार आगे जाकर मिला।
यह चैलेंज किसे था? अनुसुचित जाति व जनजाति को।
नरेंद्र मोदी ही नही बल्कि किसी भी सरकार में एससी/एसटी की हैसियत शून्य है। होती तो स्मृति ईरानी व बंगारू का इस्तीफा होता व उपकुलपति जेल में होता। नरेंद्र मोदी सरकार ने ठेंगा दिखा दिया।
निष्कर्ष
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अनुसुचित जाति सभी के लिए Available है। उंसके लिए कोई उपलब्ध नही है।।वो पड़ोसी की जीत की खुशी में खुशियां बनाता है। उंसकी जीत ही नही होती क्योंकि पड़ोसी उसका साथ नही देता है।। उनमे बुद्धिजीवी व्यक्तिओ की कमी है। जो बुद्धिजीवी है, जैसे बहन कुमारी मायावती, उनकी अपने नौशिखियापन व अपरिपक्वता के कारण सुनते नही है। जिस समाज मे बुद्धिजीवी व्यक्तिओ की कमी होती है व जो थोड़े बहुत होते है, जब उसकी सुनते नही तो वो हमेशा मन्दिर के घण्टे जैसा रहेगा, जिसे कोई भी सुविधानुसार बजाकर जाएगा।
खैर;
"सामान्य वर्गों को पुनः उनकी जीत की बधाई"
विकास कुमार जाटव
ये एक बेहद गंभीर मामला है जिसका दर्दनाक और ख़ौफ़नाक असर उस बच्चे पर जीवनभर हो सकता है।
टीचर्स में इतनी समझ तो होनी चाहिए कि उन्हें बच्चों से हमदर्दी और इंसानियत से पेश आना चाहिए।
तत्काल यथोचित कार्रवाई हो!
कुर्सी का नशा जब सिर पर चढ़ जाता है
जनता का हर दर्द नजर से उतर जाता है
तानाशाही ज्यादा दिन टिक नहीं पाती है
सच का सूरज हर अंधेरा बिखेर जाता है
सुबह का नमस्कार —