वंदे मातरम् | हिंदू | राष्ट्र प्रथम 🇮🇳
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
अर्थात: सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।🙏
जरासंध की कहानी
जरासंध महाभारत का एक अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी राजा था। वह मगध का शासक था और उसकी राजधानी गिरिव्रज (राजगृह) मानी जाती है। वह भगवान कृष्ण का घोर शत्रु था।
जन्म की अनोखी कहानी
जरासंध के पिता राजा बृहद्रथ थे। बृहद्रथ की दो पत्नियाँ थीं, लेकिन लंबे समय तक उनकी कोई संतान नहीं हुई।
एक दिन उन्हें ऋषि चंडकौशिक मिले। ऋषि ने राजा को एक दिव्य फल दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को खिलाना। राजा ने फल को दो भागों में बाँटकर दोनों रानियों को खिला दिया।
समय आने पर दोनों रानियों ने एक-एक आधे शिशु को जन्म दिया। दोनों आधे शरीर अलग-अलग थे। राजा ने दुखी होकर उन्हें जंगल में फेंकवा दिया।
वहाँ जरा नाम की एक राक्षसी ने दोनों हिस्सों को देखा। उसने दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया और अचानक वह शिशु जीवित हो उठा।
क्योंकि उसे जरा ने संधि (जोड़) करके जीवित किया था, उसका नाम पड़ा - जरासंध।
जरासंध इतना शक्तिशाली कैसे बना?
बड़ा होकर जरासंध अत्यंत शक्तिशाली योद्धा बना। उसने अनेक राजाओं को पराजित करके अपने अधीन कर लिया।
उसकी दो बेटियाँ अस्ति और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब कृष्ण ने कंस का वध किया, तो जरासंध कृष्ण का कट्टर शत्रु बन गया।
उसने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किए। कृष्ण ने अंततः मथुरा छोड़कर द्वारका को अपनी राजधानी बनाया। इसी कारण कृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता है, हालाँकि यह नाम अपमान नहीं, बल्कि युद्धनीति के संदर्भ में भी समझा जाता है।
जरासंध और 86 राजाओं की कैद
जरासंध की एक बड़ी महत्वाकांक्षा थी। उसने अनेक पराजित राजाओं को बंदी बनाकर रखा था। महाभारत की परंपरा में कहा गया है कि वह 100 राजाओं को एकत्र करके उनका बलिदान करना चाहता था।
जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया, तब जरासंध सबसे बड़ी बाधाओं में से एक था।
कृष्ण जानते थे कि जब तक जरासंध जीवित है, युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ सफलतापूर्वक पूरा करना कठिन होगा।
भीम और जरासंध का युद्ध
कृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मणों का वेश धारण करके मगध पहुँचे।
उन्होंने जरासंध को मल्लयुद्ध के लिए चुनौती दी।
जरासंध ने भीम को चुना।
दोनों के बीच लगातार कई दिनों तक भयंकर कुश्ती हुई। दोनों लगभग समान रूप से शक्तिशाली थे। अंततः भीम ने जरासंध को उठाकर जमीन पर पटक दिया और उसके शरीर को दो हिस्सों में चीर दिया।
लेकिन तभी एक विचित्र बात हुई -
जरासंध के दोनों हिस्से फिर से जुड़ गए और वह दोबारा जीवित हो गया!
भीम ने कई बार उसे इसी तरह चीरकर मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसके शरीर के दोनों हिस्से जुड़ जाते।
कृष्ण ने उपाय बताया
तब कृष्ण ने एक तिनके को बीच से फाड़कर उसके दोनों हिस्सों को विपरीत दिशाओं में फेंकने का संकेत किया।
भीम समझ गए।
उन्होंने जरासंध को दो हिस्सों में चीरकर उसके दोनों हिस्सों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया, जिससे वे आपस में जुड़ नहीं सके।
इस तरह जरासंध का अंत हुआ।
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इसके बाद क्या हुआ?
जरासंध की मृत्यु के बाद बंदी बनाए गए राजा मुक्त कर दिए गए। उसके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बनाया गया।
इससे युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का रास्ता साफ हुआ और पांडवों की राजनीतिक शक्ति बहुत बढ़ गई।
जरासंध की कहानी का सबसे रोचक पक्ष यही है:
उसका जन्म दो अलग-अलग हिस्सों से हुआ था और उसी कारण उसे मारने का तरीका भी उसके जन्म की इस रहस्यमय घटना से जुड़ा हुआ था।
#जिन्दगी का अर्थ है, जो हो चुका उससे #वर्तमान को प्रभावित किये बिना #जीवन जीना .
जो हो चुका उसे हम बदल नहीं सकते,
जो होना है उसे ना जान सकते हैं, ना रोक सकते हैं.
विगत एवम् आगत के #चिंतन के बिना वर्तमान को #अप्रभावित रखने की #जिजीविषा वाले ही सही अर्थो में जीवन जीते हैं.
स्कूल की टाइमिंग को लेकर मेरे ट्वीट पोस्ट की बहुत सराहना हुई। थोड़ी सी आलोचना भी। लेकिन अधिकांश लोगों ने स्वीकार किया कि वर्तमान टाइमिंग निश्चित करने में कोचिंग सेंटर की अहम भूमिका है। कोचिंग का ज्वर कुसंग के ज्वर से भी भयानक है। दुर्भाग्य से यह बीमारी सबको लगी हुई है। महंगी से महंगी शिक्षा देने वाले निजी विद्यालयों के बच्चे बिना ट्यूशन और कोचिंग के नहीं रह रहे हैं।
बहुत से लोगों का कहना है कि सरकारी विद्यालय अक्षम हैं इसलिए कोचिंग फल फूल रहे हैं। यदि ऐसा है तो निजी विद्यालयों के बच्चे कोचिंग क्यों जा रहे हैं? कोचिंग सेंटर का नेक्सस इतना जब्बर हो गया है कि आप इनसे बच नहीं सकते। यह लोग हर जगह काबिज हैं और अशक्त तथा अक्षम लोगोंको विभिन्न ट्रिक और सेटिंग के बूते जिम्मेदार पदों पर बिठा दे रहे हैं। इनका गठजोड़ बहुत मजबूत हो गया है।
इसका उपाय यही है कि इन कोचिंग सेंटर पर प्रतिबंध लगाया जाए। कितनी विडंबना की बात है कि सरकारी विद्यालय के अध्यापकों को कोचिंग पढ़ाने से रोका जा रहा है लेकिन निजी सेंटर्स को खुली छूट दी गई है। उनको जांचने, समझने का कोई निगरानी तंत्र भी नहीं है। उच्चाधिकारी उनके प्रभाव में हैं।
मैं #SchoolEducation के सम्बन्ध में पुरजोर सिफारिश करूंगा कि कोचिंग संस्थान बंद किए जाएं। इन्हें चलाना अपराध माना जाए।
इसके बाद विद्यालय, शिक्षा आदि की व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी।
आप क्या कहते हैं? अपनी राय से अवगत कराएं। सहमत/असहमत भी लिख सकते हैं।
मसान की बात को अगर एक वाक्य में कहें तो:
“ज़िंदगी राख से भी निकलती है, बस हमें आगे बढ़ने की हिम्मत चाहिए।”
1. मृत्यु के बीच जीवन
फिल्म का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कहानी श्मशान और मृत्यु के शहर में है, लेकिन फिल्म असल में जीने की कहानी है।
मणिकर्णिका की राख लगातार याद दिलाती है कि अंत निश्चित है। लेकिन उसी के बीच पात्र प्रेम करते हैं, सपने देखते हैं और भविष्य की ओर बढ़ते हैं।
मृत्यु जीवन को खत्म नहीं करती; वह जीवन की कीमत समझाती है।
2. अतीत की गलती पूरी जिंदगी नहीं होती
देवी के साथ जो होता है, उसमें समाज उसे उसके एक अनुभव और एक घटना से परिभाषित कर देता है।
फिल्म पूछती है:
क्या इंसान की पूरी पहचान उसकी एक गलती, एक हादसे या एक सामाजिक कलंक से तय हो जानी चाहिए?
फिल्म का जवाब है - नहीं।
इंसान को अपने अतीत से बाहर निकलकर खुद को फिर से परिभाषित करने का अधिकार है।
3. जाति और सामाजिक व्यवस्था
दीपक की कहानी केवल प्रेम कहानी नहीं है। वह सामाजिक सीढ़ी पर नीचे खड़े एक युवक की कहानी है, जो पढ़-लिखकर उस दुनिया से बाहर निकलना चाहता है जिसमें उसका जन्म हुआ है।
यहाँ फिल्म एक महत्वपूर्ण बात कहती है:
जन्म आपकी शुरुआत तय कर सकता है, मंज़िल नहीं।
4. प्रेम हमेशा मिलन नहीं होता
शालू और दीपक का रिश्ता बहुत कम समय में गहरा हो जाता है। लेकिन फिल्म प्रेम को केवल “दो लोगों के मिल जाने” के रूप में नहीं देखती।
कभी प्रेम किसी इंसान को बदल देता है, भले वह इंसान हमारे साथ अंत तक न रहे।
इसलिए शालू की मृत्यु के बाद भी उसका प्रभाव दीपक की जिंदगी में मौजूद रहता है।
5. दुःख के बाद भी जीवन चलता है
फिल्म का सबसे खूबसूरत विचार शायद यही है।
दीपक शोक में टूटता है। देवी अपने अपराधबोध और सामाजिक अपमान से जूझती है। लेकिन दोनों के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब उन्हें तय करना पड़ता है:
क्या हम हमेशा अपने दुःख के भीतर रहेंगे, या उसके पार भी कोई जीवन है?
और फिल्म अंततः दूसरे विकल्प को चुनती है।
6. गंगा का प्रतीक
गंगा फिल्म में सिर्फ नदी नहीं है।
वह बहने का प्रतीक है।
राख बहती है। दुःख बहता है। समय बहता है। लोग चले जाते हैं। लेकिन जीवन भी बहता रहता है।
इसीलिए फिल्म का अंत इतना महत्वपूर्ण है—जीवन किसी साफ-सुथरे समाधान के साथ नहीं, बल्कि आगे बढ़ने के साथ समाप्त होता है।
मसान का असली संदेश -
मेरे हिसाब से फिल्म का सार “Let go” है।
जो चला गया, उसे जाने दो।
जो हो गया, उसे स्वीकार करो।
समाज ने तुम्हें जो नाम दिया है, उसे अंतिम सत्य मत मानो। और राख के बीच भी जीवन की तरफ चल पड़ो।
इसलिए मसान केवल मृत्यु, प्रेम या जाति की फिल्म नहीं है। यह उन लोगों की फिल्म है जो टूट चुके हैं और फिर भी जीना सीख गए हैं।
और शायद फिल्म का सबसे गहरा संदेश यही है:
“ज़िंदगी का अर्थ यह नहीं कि हमारे साथ क्या हुआ; “ज़िंदगी का अर्थ यह है कि उसके बाद हम क्या करते हैं।”
तुम्हारी जेब में क्या है आलोक, उससे GDP निर्धारित नहीं होती!!
मंहगाई से भी GDP का कोई संबंध नहीं होता!!
मूर्खताएं कम करो और गंभीरता से कह रहा हूं कि स्वंय को आर्थिक पत्रकार मानना बंद कर दो!!
इससे भी आसान तरीक़ा बताता हूँ।
१. अपनी जेब का हाल देखिए -पहले से भारी हुई है या हल्की
२. खाने की थाली में कितना माल आ रहा है और उसका दाम क्या है? कितना कम या कितना ज़्यादा?
३. महीने में बिजली, गैस, पेट्रोल, डीज़ल पर खर्च कितना घटा या कितना बढ़ा?
४. बचत हो पा रही है या क़र्ज़ माँगना पड़ रहा है?
५. जो कार ख़रीदना चाहते थे उसका दाम कितना बढ़ गया? और जो कार बेचनी थी उसका दाम कितना गिर गया?
६. हार्डवेयर, सीमेंट, पेंट और बिजली का तार, बल्ब या कोई भी उपकरण पिछले साल से कितना सस्ता या महंगा है?
७. कहीं भी जाने के लिए फ़्लाइट का टिकट चेक करिए। पहले से डेढ़ गुने में मिल रहा है या दोगुने में?
८. अपनी ईएमआई का खर्च भी देख लीजिए, कितना घट गया?
सारे बिल जोड़कर देखिए आपने पिछले साल या पिछले महीने के मुक़ाबले कितना ज़्यादा जीएसटी चुकाया? उसी सामान पर -बढ़े दाम की वजह से।
और फिर समझ भी लीजिए, आपकी जेब से निकलनेवाली रकम भी जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा है। तो ज़्यादा ख़रीदो, महंगा ख़रीदो, ज़्यादा टैक्स भरो और जीडीपी बढ़ने का जश्न मनाओ॥ #जीडीपी #GDP