@devhooda352307@ashokshera94@madandilawar 35 साल आपके पिता ने यहां सर्विस किया सब लोगों ने भगवान के भरोसे छोड़ दिया जो भगवान ने किया वह सब कुछ अच्छा किया अब आप भगवान से भी ऊपर हो चुके हो आपका घड़ा भर चुका है
@devhooda352307@ashokshera94@madandilawar कार्यालय आदेश तो हम दे चुके हैं कि 15 तारीख को सत्ता राम जी ने किसी को सूचना दी कि मैं नरेंद्र मीणा आ चुका है मैं बिनढाणी स्कूल जा रहा हूं यह सूचना PEEO को दी है क्या नहीं फिर आप कैसे झूठा साबित कर सकते हैं आप मौके पर थे आपके पिताजी टीचर होने से हम गलत साबित नहीं हो सकते
@Satya_Jaat77 @ashokshera94@madandilawar शिक्षक है वह भी घर पर बैठे रहते हैं इन्होंने तो घर पर डेरा डाल दिया है एक नया शिक्षक आया उसको भी अपने जैसा कर दिया कि इनकी इतनी पहुंच है कि झंडारोहण नहीं करवा सकते इसे कहते हैं पावर राजनीतिक छत्रछाया है कुछ नहीं बिगाड़ सकती सरकार नए आएंगे वह क्या सुधार करेंगे
@devhooda352307@ManzuDinesh हुडासर विद्यालय में दो अध्यापक पदस्थापित है,एक सताराम जो प्रतिनियुक्ति पर चल रहे थे,नरेंद्र मीणा के अवकाश पर जाने पर दिनांक 11.08.2025 से 14.08.25 तक मूल पदस्थापन पर ड्यूटी काआदेश था,14.08.25 को वापस रिलीव हुए तब किसी को तो चार्ज दिया होगा
@madandilawar@RajCMO@dabi_tina
ध्वज संहिता की धज्जियां उड़ाने वालों पर सत्ता का मौन — शिक्षा व्यवस्था के पतन का जीता-जागता सबूत
स्वतंत्रता दिवस के दिन जब देश के कोने-कोने में तिरंगा लहराकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, तब बाड़मेर जिले के चौहटन ब्लॉक के राजकीय प्राथमिक विद्यालय हुडासर, शोभाला जैतमाल में न तो तिरंगा फहरा और न ही शिक्षक समय पर विद्यालय पहुँचे।
सुबह 9 बजे तक ग्रामीण और मासूम बच्चे विद्यालय के द्वार पर खड़े रहे, लेकिन शिक्षक मानो “कर्तव्य” शब्द को ही भुला बैठे। यह केवल ध्वज संहिता का अपमान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और शिक्षा के मंदिर में जिम्मेदारी की हत्या है।
ग्रामीणों ने PEEO शोभाला के माध्यम से सीबीओ चौहटन और डीईईओ को रिपोर्ट सौंपी, परंतु शिक्षा विभाग ने अब तक कान पर जूं तक नहीं रेंगने दी। सवाल यह है कि जब दोषी शिक्षक सत्ता संरक्षण में हों, तो क्या नियम-कानून केवल आम जनता के लिए हैं?
यह घटना साफ दिखाती है कि सत्ता और प्रशासन की चुप्पी ही लापरवाह अधिकारियों की सबसे बड़ी ढाल है। अगर राष्ट्रध्वज के सम्मान और बच्चों की शिक्षा जैसे मुद्दों पर भी सरकार आंख मूंदे रहे, तो यह केवल शिक्षा विभाग की नाकामी नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की विफलता है।
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