⚠️ @DausaPolice@DmDausa बांदीकुई के ग्राम भांवता में स्व. पांची देवी का मृत्युभोज रुकवाने हेतु सख्त निगरानी की जरूरत है। आयोजक प्रशासन को गुमराह कर 21 से 25 सितंबर के बीच कभी भी गुपचुप आयोजन कर सकते हैं। मृत्युभोज निवारण एक्ट के तहत तुरंत एक्शन लें। @RajPoliceHelp@IgpJaipur
7 मार्च को सिलेंडर बुक किया था, लेकिन होम डिलीवरी नहीं दी गई। एजेंसी की गाड़ी के पास जाकर गैस सिलेंडर लाना पड़ा लेकिन ना ही कोई सिलेंडर का वजन किया गया ना ही लिकेज चेक किया गया।
सरेआम कालाबाजारी दिखाई दे रही है।
@MoPNG_eSeva@BPCLimited
मेरी गोद में बैठे ये दोनों मासूम बच्चे डूंगरी गांव के हैं, जहाँ सरकार डूंगरी बाँध बनाने जा रही है और सैकड़ों गांवों को उजाड़ने की तैयारी है। इन बच्चों के भविष्य के लिए मैं आख़िरी सांस तक लड़ूंगा। विकास के नाम पर विस्थापन हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं हैं।
दौसा (लवाण) के ग्राम पिपल्या चैनपुरा में मृत्यु भोज की तैयारी की सूचना।
यह Rajasthan Prevention of Mrityu Bhoj Act, 1960 का उल्लंघन है।
तत्काल रोक व कार्रवाई हो।
@RajCMO@RajPoliceHelp@DausaPolice@DmDausa#MrityuBhoj
राजस्थान मृत्युभोज अधिनियम 1960 कानून के तहत राज्य मे कोई भी व्यक्ति मृत्युभोज नही कर सकता और ना ही उसमे शामिल हो सकता! @DausaPolice जिला प्रशासन कृपया मृत्युभोज करने वाले एवं मृत्युभोज करने का दबाव बनाने वाले पटेलों पर भी सख्त कार्रवाई करे @RajPoliceHelp@RajCMO@IgpJaipur
JVVNL कर्मचारियों द्वारा गलत/काल्पनिक मीटर रीडिंग दर्ज कर मनमाना बिल जारी करने के संबंध में पहले भी कई बार शिकायत की जा चुकी है लेकिन कोई सुधार नहीं किया गया है।
रीडिंग में सुधार कर बिल अपडेट करें और उपभोक्ता को सूचित करें।
@JVVNLCCare@RajGovOfficial@RajCMO
Arms Act-1959 के तहत मामला तो बनता है यदि@PoliceRajasthanचाहें तो।क्योंकि जयपुर दक्षिण पुलिस थाना कोटखावदा क्षेत्र के गांव रामनगर हीरापुरा निवासी लक्ष्मण सिंह राजपूत का फेसबुक स्टोरी पर यह हथियारों सहित वीडियो देखा गया है। @jaipur_policeशिघ्र कानूनी कार्रवाई करें।
@RajPoliceHelp
सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ फोटो पोस्ट करना न केवल समाज में अशांति फैलाना है,बल्कि यह गैरकानूनी भी है। हथियारों का प्रदर्शन करना आर्म्स एक्ट 1959 व आईटी एक्ट 2000 के तहत दंडनीय अपराध है।
@RajPoliceHelp@jaipur_police@RajCMO
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हथियारों की वीडियो फेसबुक स्टोरी पर डालकर गैंगस्टार की फीलिंग लेने वाले लक्ष्मण सिंह चौहान निवासी- रामनगर हीरापुरा, जयपुर पुलिस दक्षिण, पुलिस थाना कोटखावदा के खिलाप आर्म्स एक्ट के त्वरित कार्रवाई करें।
@RajPoliceHelp@jaipur_police
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नाम - अनीश कुमार/मनोहरलाल मीणा
गांव - रामबास तहसील -बसवा,
स्कूल - ज्योतिबा फुले विद्यालय बांदीकुई
दिनांक - 24/11/25 को सांयकाल 4बजकर 30मिनट के लगभग स्कूल से अभी तक घर नहीं पहुंचा।
मो.- 9414303619
मनोहर लाल मीणा
@DausaPolice@HansrajMeena@MukeshAnchedi
#IStandWithBhanwarLalParmar
🏹 समाज के दलाल नेता विरोध में हैं
पूरा आदिवासी समाज शिक्षक भंवरलाल परमार के साथ है
समाज को अंधविश्वास से मुक्त कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए अनवरत जनजागरण करने से सरकार हिल गई हैं इसलिए निलंबित किया है
🎯 अब हम रोके रूकने वाले नहीं हैं 🎯
@IndianOilcl के सिलेंडर विक्रेता द्वारा गैंस सिलेंडर डिलेवरी करते समय जब गैंस सिलेंडर का वजन करवाया तो 6-7 सिलेंडरो में 200 से 500 ग्राम गैस कम पाई गई। यह सरासर ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी है उक्त एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है।
@MoPNG_eSeva
आदिवासियों को नक्सली इलाके में केवल पुलिस और फौज में रखना एक गंभीर षड्यंत्र की तरह प्रतीत होता है, जो उनकी सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और पहचान को खतरे में डालता है। यह निर्णय न सिर्फ आदिवासी समाज के खिलाफ भेदभावपूर्ण है, बल्कि इसने उनके हक़ और सुरक्षा को भी कमतर कर दिया है। इस लेख में इस मुद्दे का विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा कि क्यों सिर्फ आदिवासियों को इस संवेदनशील क्षेत्र में भर्ती करना, उन्हें आदिवासियों से लड़वाना, और उन्हें एकमुश्त नक्सली मानकर देखना एक राजनीतिक षड्यंत्र है, जिसका लाभ बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां उठा रही हैं।आदिवासियों पर नक्सली इलाकों में भर्ती का प्रभावपहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है – यह एक सामाजिक अपमान है जो आदिवासियों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह को दर्शाता है। आदिवासी समाज बहुधा गरीब और उपेक्षित है, और उन्हें ऐसे क्षेत्रों में भेजकर जहां उनकी जान को खतरा है, सरकार न केवल उनकी सुरक्षा का उल्लंघन कर रही है, बल्कि उन्हें युद्ध का साधन बनाकर राजनीतिक लाभ उठा रही है। यह उन पर एक नकारात्मक छवि भी थोपता है कि वे स्वाभाविक रूप से नक्सली या असामाजिक हैं, जबकि वास्तविकता इसकी बिल्कुल विपरीत है।राजनीतिक और सामाजिक षड्यंत्र का खतराबीजेपी और कांग्रेस जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए अक्सर ऐसे नीतिगत निर्णय करती हैं जो मतदाताओं को विभाजित करें। आदिवासियों को नक्सली इलाकों में सीमित करने का उद्देश्य उन्हें समाज के अन्य वर्गों से अलग-थलग करना और उनके राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करना हो सकता है। इसके साथ ही ऐसी नीति से आदिवासियों में असंतोष फैलता है और वे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने लगते हैं, जिससे उनकी единता समाप्त होती है।आदिवासियों को नक्सली मानने का खतरनाक मिथकहर आदिवासी को नक्सली समझना पूरी तरह गलत और अन्यायपूर्ण है। आदिवासी समुदाय में अनेक ज्ञानी, शिक्षित और देशभक्त लोग हैं जो शांति और विकास की कामना करते हैं। नक्सलवाद का मुद्दा एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक समस्या है जो गरीबी, भुखमरी और उत्पीड़न से उपजा है, इसे पूरे आदिवासी समाज पर थोप देना उनकी छवि को धूमिल करता है और विकास के रास्ते में बाधा डालता है।उदाहरणछत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में नक्सली समस्या सर्वविदित है। इन राज्यों में ज्यादातर आदिवासी क्षेत्र हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारे आदिवासी नक्सली हैं। कई आदिवासी नेतागण और सामाजिक कार्यकर्ता नक्सलवाद के खिलाफ हैं और पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखते हुए विकास की राह पर चल रहे हैं। परन्तु सरकार की गलत नीतियां और भेदभावपूर्ण नियम इन समाजों को और अधिक अस्थिर बनाते हैं।जागरूकता और समाधानसरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के मुद्दे को समझदारी से देखें और आदिवासियों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करें। उनकी सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दें, उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर दें ताकि वे नक्सलता की ओर न बढ़ें। साथ ही समाज में भी इस मिथक को मिटाने के लिए जागरूकता अभियानों की जरूरत है कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होता।यह एक राजनीतिक षड्यंत्र है जिसका उद्देश्य आदिवासियों को तनावग्रस्त करना और उन्हें सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से कमजोर करना है। इस भ्रम को दूर करना और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करना भारत के लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।इस लेख के माध्यम से यह स्पष्ट होना चाहिए कि आदिवासियों को केवल नक्सली इलाकों में भर्ती करना,उन्हें लड़वाना और एक नकारात्मक छवि देना, एक बड़ा सामाजिक अपराध है और इस पर कड़ा राजनीतिक हमला और जागरूकता जरूरी है।
"हर मरने वाला नक्सली आदिवासी होता है" यह धारणा गहरी सामरिक साजिश की पैरवी करती है ताकि आदिवासी समाज में दरार डाली जाए और वे एक-दूसरे से लड़ते रहें। इस झूठे विचार के जरिए आदिवासियों को न केवल नक्सली कहकर एक नकारात्मक छवि दी जाती है, बल्कि उनके बीच असहमति और संघर्ष भी भड़का दिए जाते हैं, जो सामाजिक एकता को कमजोर करता है। यह नीति और सोच केवल राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है,जो आदिवासियों को विकास से दूर रखने,उनकी आवाज़ दबाने,और उन पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से लागू की गई है।असली सच्चाई यह है कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होता,बल्कि नक्सली बने लोग अलग-अलग कारणों से प्रभावित होते हैं, जैसे गरीबी, सामाजिक अन्याय, और विकास के अभाव। यह साजिश उन्हें आपस में लड़वाने और शोषण के चक्र को बनाए रखने की है।इसलिए यह जरूरी है कि आदिवासी समाज में जागरूकता फैलाई जाए,ताकि वे इस राजनीतिक षड्यंत्र कोसमझें,एकजुट होंऔर अपना सशक्त अधिकार मांगे। साथ ही, सरकार से मांग की जाए कि वह इस भेदभावपूर्ण नीति को तुरंत समाप्त करे और आदिवासियों को समान अवसर, सुरक्षा, और सम्मान प्रदान करे।
बुजुर्ग महिला के साथ गाली गलौज और लाठी लेकर जान से मारने की कोशिश करने वाले असामाजिक तत्व के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की शीघ्र आवश्यकता है,ये बुजुर्गों को भी परेशान करने से नहीं चूकते।
@RajPoliceHelp@DausaPolice@DmDausa@PoliceRajasthan@RajCMO
राज.मृत्युभोज अधिनियम 1960 कानून के तहत राज्य मे कोई भी व्यक्ति मृत्युभोज नही कर सकता और ना ही उसमे शामिल हो सकता है @UdaipurPolice जिला प्रशासन कृपया मृत्युभोज करने वाले एवं मृत्युभोज करने का दबाव बनाने वाले पटेलो पर भी सख्त कार्रवाई करे@RajPoliceHelp@Ramkesh08071607@MsMarmat