आचार्य प्रशांत हमें अपने केन्द्रीय डर से परिचित कराते हैं। वही एक डर है जो होना आवश्यक है, जिसके बाद जीवन में तुच्छ तरह के डर बचते ही नहीं है।
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तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है;
जो सरल है वो स्वतंत्र है।
तुम्हारी चतुराई और तुम्हारी होशियारी,
यही तुम्हारा नरक है।
- आचार्य प्रशांत🌷
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