@nitin_gadkari महोदय जी करौली जिले से कैलादेवी को जाने वाली मुख्य सड़क 25 किलोमीटर की है जो कही वर्षों से टूटी फूटी पड़ी है। कैला मैया के दरबार में प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु आते है तो उनको असुविधा का सामना करना पड़ता है
इस रोड के निर्माण के लिए आपकी केवल एक घोषणा मात्र की जरूरत है
@nitin_gadkari महोदय जी करौली जिले से कैलादेवी को जाने वाली मुख्य सड़क 25 किलोमीटर की है जो कही वर्षों से टूटी फूटी पड़ी है। कैला मैया के दरबार में प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु आते है तो उनको असुविधा का सामना करना पड़ता है
इस रोड के निर्माण के लिए आपकी केवल एक घोषणा मात्र की जरूरत है
@nitin_gadkari महोदय जी करौली जिले से कैलादेवी को जाने वाली मुख्य सड़क 25 किलोमीटर की है जो कही वर्षों से टूटी फूटी पड़ी है। कैला मैया के दरबार में प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु आते है तो उनको असुविधा का सामना करना पड़ता है
इस रोड के निर्माण के लिए आपकी केवल एक घोषणा मात्र की जरूरत है
Out ! But 44(21) absolutely entertaining innings, punctuated with some well timed cover drives.
We have seen his power, but today was anything but brute force.
He is some player this kid.🤩🤩 #vaibhavsuryavanshi#INDAvAFGA
हम राजस्थान की सभी बोलियों का सम्मान करते हैं, लेकिन पूरे ब्रजक्षेत्र की पहचान सिर्फ ब्रजभाषा से है। प्रशासनिक स्तर पर इसे गौण करने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह हमारी ऐतिहासिक अस्मिता और आत्मसम्मान की लड़ाई है। #SaveBrajBhasha@RajCMO@KumariDiya
माननीय केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री, श्री @nitin_gadkari जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
आज आपके जन्म दिवस के अवसर पर समस्त करौलीवासी आप से विनम्र निवेदन करते है कि करौली जिले से (मुख्य मार्ग) कैलादेवी लगभग 20 किलोमीटर सड़क निर्माण की घोषणा
बाड़मेर में विधायक रविंद्र सिंह जी भाटी मजदूरों के हक के लिए पिछले २ हफ़्ते से धरने पर बैठे है,लेकिन भाजपा की पर्ची सरकार ने विधायक से न कोई वार्ता की न कोई संज्ञान लिया ।
विधायक रविंद्र जी व मजदूरों का इतना अपमान किया भाजपा सरकार ने की कलेक्ट्रेट कूच करने एवं अपने ऊपर पेट्रोल डालने पर मजबूर हो गए ।
भाजपा सरकार को अविलंब विधायक व मजदूरों से बात करनी चाहिए, विधायक पद की गरिमा सरकार को ध्यान रखनी चाहिए ।
अगर विधायक या मजदूरों के साथ कुछ भी ग़लत हुआ तो भाजपा सरकार गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहे ।।
@RavindraBhati__
बाड़मेर के शिव क्षेत्र स्थित गिरल लिग्नाइट माइंस में मजदूरों के हक की लड़ाई पिछले 38 दिनों से जारी है, लेकिन राजस्थान सरकार पूरी तरह मौन है। मजदूरों के समर्थन में 15 दिनों से धरने पर बैठे शिव विधायक रविंद्र सिंह जी भाटी की आवाज को भी प्रशासन ने लगातार अनसुना किया। इसी प्रशासनिक तानाशाही और अनदेखी के चलते अंततः एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को आत्मदाह के प्रयास जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा।
यह घटना प्रदेश सरकार की घोर विफलता है। यदि सरकार अब भी नहीं जागी और मजदूरों की मांगों का तुरंत समाधान नहीं किया, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या माना जाएगा। लोकतंत्र में जनता और उनके प्रतिनिधियों की आवाज को इस तरह तानाशाही से दबाया नहीं जा सकता। सरकार तुरंत होश में आए और मजदूरों को उनका हक दे।
@RavindraBhati__@BJP4Rajasthan@BhajanlalBjp@BJP4India
बाड़मेर के गिरल में लिग्नाइट माइंस के मजदूरों द्वारा पिछले क़रीब 40 दिनों से अपनी मांगों को लेकर धरना दिया जा रहा है। परंतु दुर्भाग्य कि राज्य सरकार की तरफ से श्रमिकों की मांगों पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया, कार्रवाई नहीं की गई।
मजदूरों की मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हुए आज शिव विधायक श्री रविंद्र सिंह भाटी को अपने ऊपर पेट्रोल उड़ेलने जैसा घातक कदम तक उठाना पड़ा।
इस घटना से राजस्थान में पसरी अराजकता और अव्यवस्था की स्थिति साफ़ दिखाई देती है कि एक जनप्रतिनिधि को जनता की मांगों को सरकार के सामने लाने के लिए आत्मदाह का प्रयास करना पड़ा। आमजन की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
राज्य सरकार से मेरी अपील है कि आकंठ संवेदनहीनता के चक्र से बाहर निकलें; जिस जनता ने राज दिया है, उनके प्रति संवेदनशील बने, उनकी मांगों को सुनें, सकारात्मक कार्यवाही करें।
मैं शिव विधायक श्री @RavindraBhati__ जी से भी कहना चाहूंगा कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि होने का परिचय देते हुए अपना और क्षेत्रवासियों का ध्यान रखें।
बाड़मेर में गिरल लिग्नाइट माइंस के मजदूरों का 38 दिन से धरना प्रदर्शन जारी है। शिव विधायक श्री @RavindraBhati__ भी 15 दिन से इन मजदूरों के साथ बैठे हैं परन्तु न तो सरकार ने कोई वार्ता की और न ही प्रशासन ने ध्यान दिया। इस उदासीनता के कारण वे मजदूरों के साथ कलेक्ट्रेट कूच करने एवं अपने ऊपर पेट्रोल उड़ेलने तक को मजबूर हुए।
भाजपा के शासन में एक विधायक को अपनी मांगों पर ध्यानाकर्षण के लिए ऐसा कदम उठाना पड़ रहा है तो आम आदमी की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। राज्य सरकार को अविलंब इनकी मांगों पर ध्यान देकर सकारात्मक हल निकालना चाहिए।
रवींद्रसिंह भाटी, अपने आप पर पेट्रोल नहीं, शासन और प्रशासन की संवेदना की सूखी जड़ों पर थोड़ा पानी डालिए!
हिंसा ख़ुद पर हो या समाज पर या किसी दूसरे पर उससे बुरा कुछ नहीं है। वह त्याज्य है।
लेकिन रवींद्र सिंह भाटी ने पेट्रोल छिड़ककर ठीक किया या ग़लत; न तो यह बहस का विषय है और न यह अच्छा है कि हम उस विडियो को शेयर करें, जिसमें भाटी अपने आप पर पेट़्रोल डाल रहे हैं। यह दोनों ही बातें एक ही जैसी निर्रथक हैं।
किसी भी संघर्ष में किसी का भी शरीर नहीं जलना चाहिए, बस शासन और प्रशासन के ही नहीं, जो लोग मज़दूरों को न्याय नही दे रहे, उन सब ताक़तवर शक्तियों के अहंकार जलने चाहिए। सत्ता में संवेदना रहनी चाहिए। लेकिन सत्ता शक्ति का ऐसा स्वीमिंग पूल है, जहाँ संवेदना के वस्त्र उतार कर ही प्रवेश किया जा सकता है। वे चाहे कम्युनिस्टों ही की सत्ता क्यों न हो। इसलिए वह सत्ता जब कुछ दूसरे विचार वालों के हाथ होती है तो वहाँ संवेदना का शायद अधोवस्त्र भी एक थोंग में बदल जाता है।
इसलिए पेट्रोल को दूर ही रखा जाए। लड़ाई सड़क, विधानसभा, अदालत, मीडिया, श्रम विभाग और प्रशासन की मेज पर लड़ी जाए। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक विधायक, मजदूर और स्थानीय नागरिक ऐसी चरम बेचैनी तक पहुँचते क्यों हैं?
बाड़मेर की गिरल लिग्नाइट माइंस को लेकर श्रमिकों और ग्रामीणों का आंदोलन कई दिनों से चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार आरोप स्थानीय रोजगार, भूमि-अधिग्रहण और मजदूरों के साथ अन्याय से जुड़े हैं; इसी आंदोलन के बीच भाटी ने बाड़मेर कलेक्ट्रेट के बाहर खुद पर पेट्रोल छिड़का, जिसके बाद कहा जा रहा है कि पुलिस-प्रशासन ने स्थिति संभाली। लेकिन यह स्थिति पैदा किसने की? शायद रवींद्रसिंह भाटी ने नहीं ही पैदा की।
असल मुद्दा पेट्रोल की बोतल नहीं, वह व्यवस्था है जिसमें गरीब की आवाज़ पहले फाइल में दबती है, फिर धरने में बैठती है, फिर सड़क पर उतरती है और अंत में किसी खतरनाक प्रतीक की ओर धकेल दी जाती है।
हम पत्रकार बहुत जल्दी कहते हैं, “यह ग़लत कर दिया, यह नाटकीयता कर दी।” लेकिन जो इससे कहीं अधिक ग़लत है; मजदूर की मजदूरी दबना, स्थानीय नौजवानों से रोजगार का वादा टूटना, प्रशासन का कंपनी के आगे झुक जाना, श्रम विभाग का मौन रहना आदि पर हमारा "ग़लत" शब्द खो सा जाता है।
राजस्थान में निवेश सम्मेलन होते हैं। बड़े-बड़े मंच सजते हैं। औद्योगिक घरानों के लिए लाल कालीन बिछता है। इन घरानों में किसी को छींक भी आती है तो मुख्यमंत्री स्तर के लोग विमान से यात्रा करके उनके हाल पूछने जाते हैं, लेकिन मजदूरों के कुनबे के कुनबे ग़र्क़ हो जाएं तो भी कोई कहाँ पूछने जाता है? माइनिंग वाले इलाकों में पूरे के पूरे गांवों में सिर्फ़ युवा विधवाएँ वास करती हैं, अकेली कराहती हैं, लेकिन मजाल कि किसी ने कभी वहाँ जाकर हालात देखे हों। इसलिए ये कुदरती "नरसंहार" चलते रहते हैं और कोई देखता नहीं और एक उद्योगपति की एक छींक की अहमियत इतनी बड़ी हो जाती है। मैं नहीं कहता कि उद्योगपति के यहाँ न जाएँ, लेकिन अगर मजदूर बड़ी तादाद में आंदोलन कर रहे हों तो उनकी सुन तो लो। माना कि आप बांग्लादेशियों को निकाल रहे हैं, लेकिन इन भारतवासियों से तो प्रेम कर लो और इनके घरों में तो थोड़ी खुशियाँ भर दो ताकि इनके चूल्हे जल जाएँ।
कांग्रेस हो या भाजपा, सत्ता में आते ही दोनों विकास की भाषा में ग़रीब की ज़मीन, गोचर, ओरण, पहाड़ और श्रम को “संसाधन” कहने लगती हैं।
जिन धरतियों पर गायें चरती थीं, जहाँ लोकदेवताओं की स्मृति थी, जहाँ कृष्ण की गोचारण-कल्पना तक हमारे धर्म-संस्कारों में बसी है, वहाँ खनन, मुनाफा और ठेकेदारी की मशीनें उतर आती हैं। दिन भर गाय, धर्म, राम और ईमान की बात करने वाले लोग अगर मजदूर के बच्चे की भूख नहीं देख सकते तो यह धर्म नहीं—सिर्फ नारा है।मजदूर आतंकवादी नहीं है। वह इस धरती का सबसे असुरक्षित नागरिक है। वह कंपनी का उत्पादन खड़ा करता है, मशीन के नीचे पसीना छोड़ता है, धूल फेफड़ों में भरता है और अंत में उसी से कहा जाता है—तुम्हारा नाम सूची में नहीं है, तुम्हारा ठेका खत्म है, तुम्हारी बात बाद में देखेंगे।
भले लोगो, आखिर जाएगा कहाँ अंतिम निर्धन राजस्थानी? दिल्ली? सूरत? अहमदाबाद? खाड़ी देशों की मजदूरी? या अपने ही गाँव में बेगाना होकर खदान के बाहर धरना?
पुलिस और प्रशासन को भी यह समझना होगा कि वे किसी कंपनी के निजी सुरक्षा-कर्मी नहीं हैं। वे भी ऐसे ही राजस्थानियों और हिन्दुस्तानियों के बेटे बेटियां हैं। लेकिन इतने क्या असहाय कि पूरी की पूरी रीढ़ ही इस्पात से सूतली हो जाए। पुलिस के लोगों को अगर स्वतंत्रता और नैतिक विवेक से काम करने दिया जाए तो एक ईमानदार हैड कांस्टेबल भी कभी-कभी वह न्याय करा सकता है जो बड़ी ट्रेड यूनियनें नहीं करा पातीं। पर जब पुलिस को आदेशों की जंजीर में बाँध दिया जाता है तो हर जगह वही दृश्य दोहरता है—गरीब सामने, बैरिकेड बीच में, सत्ता पीछे और न्याय कहीं गायब।
रवींद्र भाटी के जज्बे का सम्मान इसलिए है कि वे मजदूरों के बीच खड़े दिखे। लेकिन संघर्ष की गंभीरता यही कहती है कि पेट्रोल, आग और आत्मघाती प्रतीकों से दूर रहना होगा। आप पेट्रोल क्या, बंदूक से भी नहीं लड़ सकते। जिस किसी ने कभी हिंसा और बंदूक से प्रशासन और सरकार के मुक़ाबिले का विचार दिया था, वह बहुत अपरिपक्व और आत्मघाती विचार था। इस तरह के रास्तों से आप जीत ही नहीं सकते। इससे आप कुछ अधिक समय तक सरकार, प्रशासन और अफसरशाही को विलंबित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें परास्त नहीं कर सकते।
रवींद्रसिंह भाटी ने पेट्रोल की बॉटल हाथ में ली और उसे उंड़ेला तो यह विडियो देखकर मेरा दिमाग़ घूम गया। राजस्थान ने ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता देखे हैं, जो लड़ते-लड़ते चले गए; लक्ष्मण खीची जैसे नाम स्मृति में तड़प बनकर रह जाते हैं। बाद में उनके नाम पर नगर बस जाता है, स्मारक बन जाता है, पर जिस मनुष्य ने अपने जीवन से सवाल पूछा था, उस सवाल का उत्तर सत्ता कभी नहीं देती। इसलिए असली मांग साफ होनी चाहिए: गिरल माइंस के मजदूरों और स्थानीय ग्रामीणों की मांगों पर खुली वार्ता हो। भूमि-अधिग्रहण के वादों की समीक्षा हो। स्थानीय रोजगार पर लिखित नीति बने। बकाया मजदूरी, सुरक्षा, ठेका-शोषण और निकाले गए युवाओं पर समयबद्ध निर्णय हो।
प्रशासनिक अधिकारी धरनास्थल पर सिर्फ़ कानून-व्यवस्था देखने न जाएँ; वे मज़दूरों के घर भी जाएँ, उनके बच्चों से मिलें, उनकी बेटियों के हाल देखें कि वे पढ़ पा रही हैं या नहीं? उनके नन्हे मुन्नों को देखें कि उनके पास खिलौने और संगीत के उपकरण या किताबें हैं कि नहीं? उनकी बूढ़ी माँओं से मिलें। बुजुर्ग लोगों से बात करें। उनकी रसोई देखें। तब शायद फाइल में दर्ज “मामला” मनुष्य में बदल जाएगा। उनके घरों के पशुओं को देखें कि उनके लिए चारा है कि नहीं?
कंपनियाँ इतनी विशाल, लेकिन इतनी हृदयहीन हो चुकी हैं कि कई बार उनके सामने लोकतंत्र भी लचकता दिखाई देता है। लेकिन राज्य की रीढ़ यदि सचमुच बची है तो उसे सबसे पहले मज़दूर के पक्ष में सीधा खड़ा होना चाहिए। निवेश ज़रूरी है, उद्योग जरूरी हैं, विकास भी ज़रूरी है; लेकिन अगर इस विकास की नींव में मज़दूर की हड्डी, किसान की ज़मीन, गोचर की धूल और ओरण की हत्या दबा दी जाए, तो यह विकास नहीं, राजकीय क्रूरता है।
कृपा करके थोड़ा दया-धर्म रखिए। गाय की बात करते हैं तो गोचर बचाइए। धर्म की बात करते हैं तो न्याय कीजिए। राम की बात करते हैं तो शोषित के पक्ष में खड़े होइए। और ईमान की बात करते हैं तो मज़दूर की मज़दूरी दिलाइए। कृष्ण से प्रेम है तो उनकी यशकथा लिखने वाले रसखान के कुल का संरक्षण कीजिए और उस पूरे गोवर्धन पर्वत को खनन से बचाइए, जहां कभी उस बांसुरीवादक ने गाएँ चराई थीं। उस ओरण को बचाइए, जिसके लिए लड़ते-लड़ते शूरवीर लोग बिना धड़ के ही सैकड़ों किलोमीटर तक दुश्मन को भगा आए थे। यही असली परीक्षा है सरकार की भी, प्रशासन की भी, राजनीति की भी और पत्रकारिता की भी। रवींद्रसिंह भाटी के जज्बे को सलाम। हमारी सभी विधायक उन जैसे हों!
@RavindraBhati__
बाड़मेर के शिव क्षेत्र में मजदूरों के हक और अधिकारों की लड़ाई को लेकर गिरल लिग्नाइट माइंस में पिछले 38 दिनों से धरना जारी है,लेकिन राजस्थान सरकार अब तक पूरी तरह मौन बनी हुई है।पिछले 15 दिनों से शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी स्वयं मजदूरों के समर्थन में धरने पर बैठे रहे।
यह प्रदेश सरकार की घोर विफलता है कि मजदूरों और जनप्रतिनिधियों की आवाज़ को लगातार अनदेखा किया गया,जिसके चलते एक निर्वाचित विधायक को पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास करना पड़ा।यदि सरकार अब भी नहीं जागी,तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर आघात माना जाएगा।
@RavindraBhati__