चक्रव्यूहमें फंसकर मारा गया,यह इस सवालका सही जवाब नही
सही जवाब है
कौरवोंकी वो रणनीती जिसके
तहतअर्जुनको युद्धक्षेत्रसे जानबूझ
कर दूर लेजाया गया,वो चाहते हुए
भीअपने बेटेको बचाने हेतु
समयपर नहीं पहुंच सके,,अर्जुन
'अभिमन्यु'से दूर नहीं होते तो शायद कोई भी'अभिमन्युको'मार नहीपाता
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ठीक 15 साल पहले…
सुबह का सूरज भी नहीं निकला था, लेकिन कानपुर और लखनऊ में एक इंजीनियरिंग परीक्षा का प्रश्नपत्र खुलेआम बिक रहा था — कीमत थी ₹6 लाख।
उस समय देश के शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल थे और सीबीएसई के चेयरमैन विनीत जोशी। AIEEE परीक्षा सीबीएसई ही कराती थी।
उधर देशभर में लाखों छात्र परीक्षा केंद्रों पर बैठ चुके थे। इधर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पेपर लीक का खुलासा किया और इसकी जानकारी दिल्ली तक पहुंची। सवाल उठे, लेकिन किसी बड़े स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हुई। नया प्रश्नपत्र भेजकर दोबारा परीक्षा करा दी गई और मामला ठंडा पड़ गया, जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं।
ऐसी घटनाओं ने समय के साथ पेपर लीक की समस्या को और गंभीर बना दिया।
आज तस्वीर अलग है। पेपर लीक के मामलों में गिरफ्तारियां होती हैं, सख्त कानूनों के तहत कार्रवाई होती है, जांच तेज होती है, अधिकारियों पर जवाबदेही तय होती है और सरकार पर लगातार दबाव बना रहता है। सोशल मीडिया ने भी हर मामले को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।
बस यही सबसे बड़ा फर्क है।
2011 में बहुत कम लोगों ने पूछा था कि जिम्मेदारी कौन लेगा, जांच कहां तक पहुंची और किस पर कार्रवाई हुई। आज जनता सवाल भी पूछती है और जवाब भी मांगती है।
लोकतंत्र में यही जागरूकता व्यवस्था को बेहतर बनाने की सबसे बड़ी ताकत है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार लगातार इस व्यवस्था को और सुदृढ़ करने के लिए प्रयासरत है।