किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षामंत्री गए।
प्राइवेट यूनिवर्सिटी थी। वहां तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्सेज, टीचर्स से इंटरेक्शन हुआ। इस क्रम में लाइब्रेरी भी दिखाई गयी। बेहतरीन कलेक्शन, शानदार किताबे, सिस्टम, माहौल, डिजिटल इंतजाम। बच्चे, लाइब्रेरी में भरे पड़े हुए थे।
मंत्रीजी व्यवस्था देख बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन एक चीज की कमी खटकी। उन्होंने साथ चल रहे अकादमिक प्रभारी को सलाह दी - इतनी बढ़िया लाइब्रेरी है। आप इसमे एक रेस्टोरेंट क्यो नही खोल देते।
बहुत चलेगा।
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उस अकादमिक बन्दे ने, एक दिन हंसते हंसते यह बात बताई। कहा- हमारी उम्मीद थी कि वे यूनिवर्सिटी, या लाइब्रेरी से खुश होकर कुछ ग्रांट देंगे। कोई वादा करेंगे, कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्स या सिस्टम मिल जाएगा।
लेकिन मंत्रीजी की सोच, रेस्टोरेन्ट तक सीमित थी। पर जरा सोचिये। प्रशासन के किस पहलू में यह व्यापारिक मानसिकता नही घुसी हुई??
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कभी दौर था कि मिलावटखोरी अपराध होता था। मेरे शहर का एक पंप, ओकेजनली सील कर दिया जाता, क्योकि उसका मालिक अक्सर पेट्रोल में सॉल्वेंट मिलाकर बेचता।
लोग उस पम्प से बचते थे। अब तो सरकार खुद मिलावटी माल बेच रही है। हर पम्प पर बेच रही है। बच लो!! तब दिए गए माल की मात्रा की जांच होती। एक लीटर की जगह, आपने 950ML दिया तो कार्यवाही।
अब एक महीने के रिचार्ज का मतलब 28 दिन की वैलिडिटी, सीना ठोक कर मिल रही है। बिगाड़ लो।
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यह कहना गलत होगा कि मिलावट खोरी को सरकारी संरक्षण है। असल मे मिलावटखोरों की, मिलावट खोरो के द्वारा, मिलावट खोरो के लिए बनवाई सरकार है।
व्यापारिक मानसिकता की सरकार है। बेजा लाभ के अवसर तलाशने वालो की सरकार है। इसमे इसे कुछ गलत नही लगता।
मगर भुगत पब्लिक रही है। अपनी मूर्खता,
और शोर पर अंधे भरोसे की वजह से..
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एक और उदाहरण देता हूँ।
कभी सरकार, कोयला खदान, बेहद सस्ते में देती थी। मान लीजिए, प्रति टन, 250 रुपये प्रीमियम। पॉवर प्लांट, सस्ता कोयला खरीदते। और आपको बिजली 3 रुपये यूनिट मिलती।
इसे कोयला घोटाला कहा गया।
अब सारी खदानें, वापस ली गई।
फिर से ऑक्शन हुए। कोयला 3000 रु टन के प्रीमियम पर बेचा गया। पॉवर प्लांट ने महंगा कोयला खरीदा। अब वही आपको बिजली 12 रुपये यूनिट मिल रही है।
यह स्वच्छ, और ईमानदार बिजली है।
3 रुपये वाली भ्रस्ट बिजली थी।
मेरा सवाल 12 रुपये रेट पर नही, वह तो मुल्ले टाइट करने के लिए आप 20 रुपये यूनिट भी लेंगे। मेरा सवाल यह है कि प्रीमियम में 250 की जगह सरकार 3000 कमाने लगी। उसे 2750 रुपये हर टन पर अतिरिक्त मिले।
यह पैसे कहाँ गए??
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आह, विकास में। शायद उस रोड में, जिसकी असल कीमत 60 करोड़ प्रति किमी है, पर टेंडर 300 रु करोड़ प्रति किमी का है।
अरे भाई, अच्छी सुविधा,
फोर लेन के लिए पैसे देंगे पड़ेंगे न।
लेकिन अगर ये पैसा, कोयले की अतिरिक्त कमाई से आया,
तो हम टोल क्यो दे रहे है?? तो ध्यान से देखिए। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य-
हर चीज बिकवाली पर है।
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अंतिम उदारहण और झेल लीजिये।
देश मे कोई 106000 मेडिकल सीट हैं। नीट के एग्जाम में क्वालीफाईंग मार्क्स मुश्किल से 20% है। याने आप 20% सवाल हल करके "क्वालीफाई" कर जाते है। तो एक लाख सीट के लिए, 13 लाख लोग क्वालीफाई होते हैं।
इसका क्या अर्थ है??
अर्थ यह है,की कोई 50 हजार सीट सरकारी है। यहां 25 हजार जनरल, बाकी आरक्षण मान लीजिए। लेकिन बाकी की 60 हजार सीट, प्राइवेट कॉलेजों में हैं।
13 लाख लोग इन 60 हजार सीटों की बोली लगाएं, तो एवरेज प्राइज ऊंचा रहेगा। पर आप क्वालिफाइंग मार्क्स 60% कर दें, तो शायद 3 लाख लोग ही बोली लगा पाएंगे। एवरेज सीट प्राइज नीचे आएगा।
दैट्स ए लॉस..
याद रखिये, देश भर के सारे कॉलेज के लिए NTA के माध्यम से "वन नेशन-वन एग्जाम" कराना, आपके लिए सुविधा नही। बराबरी नही। न्याय नही।
व्यापार का हिस्सा है।
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और तब नोट कीजिये कि नजदीकी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज किसका है? उसका मालिक, व्यापारियो की इसी रिंग का मेम्बर निकलेगा। नेताजी स्वयं, अथवा उनका विश्वस्त..
व्यापार बुरा नही।
पर सरकार में रहकर व्यापार बुरा है।
धर्मेंद्र प्रधान, कोई अनोखा काम नही कर रहे थे। सारे मंत्री, केंद्र राज्य की सरकार यही कर रहे हैं। वहां पर अगला जिसे भी लाएंगे, यही करेगा। तब चाणक्य के नाम से आया हुआ व्हाट्सप आपको याद करना चाहिए।
जहां का राजा व्यापारी होता है
वहां की जनता भिखारी होती है।
अब ये आहत भावनाओं को देश बन चुका है इसलिए तर्क और विज्ञान की बात करना ख़तरे से खाली नहीं है।
अब देखिए जिस भगवान के ये लोग ब्रम्हांड का सृष्टा बताते हैं, जो जीवन देने और लेने का काम करता है, जो स्वास्थ्य और संपत्ति देता है, उसी का स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है।
और ये नौटंकी हर साल होती है। ठीक उसी तरह जैसे कामाख्या में देवी रजस्वला होती है और इस अवसर पर बड़ा भारी मेला आयोजित किया जाता है।
भगवान बीमार हैं, आराम कर रहे हैं, भोग लगवाएंगे वगैरा वगैरा लोक आस्था के नाम पर किया जाता है मगर है तो ये मूढ़ता और अज्ञानता ही।
क्या ये सब ब्राम्हणवादियों द्वारा फैलाया गया एक जाल नहीं है जिसमें आम जनता फँसी हुई है।
बेहद प्रभावशाली कविता और उतना ही कमाल का पाठ राजेंद्र जी का। गिरने का महत्व बहुत सुंदर से बताया गया है। इसे सुनने के बाद गिरते रहने की असीम प्रेरणा मिलेगी। जो भी गिर रहे हैं, ज़्यादा गिरने के लिए यह कविता सुनें।
राजेंद्र जी के यू ट्यूब चैनल का लिंक-
https://t.co/F08YBm1faP
Absolutely horrifying 🤯
This is how filthy the water has become in the United States for people living near Meta’s data centre.
Water levels have dropped drastically, with very little pressure in the pipelines.
Even people in rural areas are now forced to buy water not just for drinking but for bathing as well.
Data centres require huge amounts of water for cooling. This is potentially what could happen to water resources in surrounding areas.
India needs to be mindful of this before we build more data centres.
निरंतर पतन को उन्मुख भारतीय लोकतंत्र के हवनकुंड में देश के मुख्य न्यायाधीश ने एक और आहुति डाली है. अपने ही नागरिकों को काक्रोच और परजीवी कहने के लिए बहुत मोटी चमड़ी चाहिए मीलार्ड. देश किसी एक से नहीं उन सबसे बनता है जो आपको काक्रोच और परजीवी लगते है. सीजेआई को माफ़ी माँगनी चाहिए
THIS IS A WAKE-UP CALL FOR JUDICIARY 🔥
KAPIL SIBAL: A judge shouldn’t decide recusal from his own view, but from the litigant’s fear of bias. That’s the law.
VIVEK TANKHA: That should be the end of it. A judge should never insist on hearing that case.
KAPIL SIBAL: ED once said they didn’t trust a judge, and the judge recused.
VIVEK TANKHA: ED can get recusal. No one else can. We all know why.
High time the third pillar introspects.