Sometimes life creates stories in the most unexpected ways… ✍️
You meet someone randomly, without planning it… and slowly that person becomes a part of your everyday life.
Our story also started like that on X 😇
एक बेईमान नेता हटेगा दूसरा बेईमान उसकी जगह आएगा, एक बेईमान पार्टी हटेगी दूसरी बेईमान पार्टी उसकी जगह आएगी, एक का हटना दूसरे का आना कोई हल है ही नहीं,
●जहां भाजपा सरकार है वहाँ विपक्षी पार्टियां लोकतंत्र की दुहाई देते हुए छाती पीटती हैं,
●जहां विपक्षी पार्टियों की सरकार है वहाँ भाजपा लोकतंत्र की दुहाई देते हुए छाती पीटती हैं,
ऐसा एक राज्य बताइये जहां बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसी समस्याएं नहीं हैं? ऐसा राज्य बताइये जहां स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्थायें दुरुस्त हैं? राज्यों को आपस में कमपेयर करने पर आपको कुछ बेहतर उदाहरण मिल सकते हैं लेकिन जैसे ही आप उनको चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों से तुलना करेंगे आप शत प्रतिशत निराश होंगे,
जो पार्टी सत्ता में आती है दमनकारी नीतियां अपनाती है, किस पार्टी में अनपढ़, गुंडे, माफिया, अपराधी नहीं भरे हुए हैं? किस पार्टी में भाई भतीजा वाद नहीं है? किस पार्टी ने भ्रष्टाचार की नई परिभाषाएं नहीं लिखी हैं?
इन सभी का हल सिस्टम को ट्रांसपैरेंट और अकाउंटेबल बना कर होगा, जब तक सिस्टम के मूलभूत ढांचों में सिस्टेमिक बदलाव नहीं होंगे तब तक भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से हमें निजात मिलना असंभव है,
•सिस्टम में समस्याओं के टेक बेस्ड हल,
•पॉवरफुल ट्रांसपैरेरेंसी टूल्स का निर्माण और एग्जिस्टिंग टूल्स को मजबूत करना
•नीचे से ऊपर तक की जवाबदेही फिक्स करने के रिफॉर्म
•स्ट्रॉन्ग, ट्रांसपेरेंट , इफेक्टिव , एक्सेसिबल और अफोर्डेबल ग्रीवैंस रीड्रेसल मैकेनिज्म
•कम्यूनिटी पार्टीसीपेशन ,
•जूडिशल रिफॉर्म
•पुलिस रिफॉर्म
•स्टॉप क्रिमिनलाईजेशन ऑफ पालिटिक्स
•स्ट्रॉन्ग विशिलब्लोअर कानून
•नौकरशाही और प्रशासनिक सेटअप में बदलाव
देश में आंदोलन होते रहे हैं और होते रहेंगे, लेकिन हर एक आंदोलन का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन होता है, हमारे सामने हमारे देश के ही कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय उदाहरण हैं, उसके बाद क्या बदलाव आए?
आंदोलन तब प्रभावशाली और ऑर्गेनिक होता है जब उसका नेतृत्व समझदार , लक्ष्य पर केंद्रित, अन्य पोलिटिकल पार्टीज से स्टेज साझा न करना, बेवकूफ़ी भरे नारों से दूरी बनाना और आगे की रणनीति समझदारी से बनाने पर होता है,
देश में आंदोलन आगे भी होते रहेंगे, लेकिन जब तक हम मूलभूत ढांचों के बदलावों पर चर्चा नहीं करेंगे तब तक देश में कोई भी बदलाव सम्भव नहीं है