सेना और अर्धसैनिक बलों में भर्ती न आने के कारण पाँवों में छाले लिए 3 सालों से दौड़ रहे युवा हताश हैं।
बढ़ती उम्र के कारण अयोग्य हो रहे इन युवाओं को आर्थिक तंगी अवसादग्रस्त बना रही है।
‘राष्ट्रसेवा’ का संकल्प लेने वाले इन युवाओं की आवाज ‘राष्ट्रवादी सरकार’ तक पहुंचनी चाहिए।
नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी, आर्थिक नीतियों ने व्यापारी तबाह कर दिए, लॉकडाउन ने मज़दूर भाइयों का जीवन नर्क बनाया और अब निजीकरण युवाओं से उनका हक़ और रोज़गार छीन रहा है।
आम आदमी के पास सिर्फ ‘आत्मसम्मान’ बचा है, अब भाजपा उस��� भी ‘नमक का क़र्ज़’ बताकर क्षीण करना चाहती है।
खेत और किसान को जोड़ कर उसकी समृद्धि की नींव रखती है, हमारी साइकल,
सामाजिक बंधनों को तोड़ बिटिया को स्कूल छोड़ती है, हमारी साइकल
महंगाई का उसपर असर नहीं, वो सरपट दौड़ती है, हमारी साइकल,
साइकल आम जनों का विमान है, ग्रामीण भारत का अभिमान है, साइकल का अपमान पूरे देश का अपमान है।