काश
उस बदकिस्मत दुपहरी से पहले तक वह जीत बहादुर था। दिल्ली के एक फ्लाईओवर पर किसी कार वाले ने अचानक उसे टक्कर मारी थी। वह अपने पिछले तैंतीस बरसों की स्मृति से धुल गया। एम्स के ट्रामा सेंटर में उसकी जान तो बच गयी लेकिन बोली चली गई। पूर्व का सारा जीवन, पूरी की पूरी स्मृति-सत्ता शून्य हो गई। जीत बहादुर तैंतीस साल का जवान होकर भी एक ऐसा मनुष्य हो गया जो अपनी अवस्था, चेतना से छिटक कर चलता फिरता पिंड हो ।
वर्ष 2009 की इस घटना के कुछ महीने बाद जीत बहादुर को दिल्ली के शांति निकेतन आश्रम ले जाया गया। वहाँ उसकी देखभाल.. सेवा होती रही। चेतना और बोलने-सुनने से दूर हो चुका जीत बहादुर वहाँ अपने दिन काट रहा था। उस हादसे का मामला जब भी अदालत में खुलता, जीत बहादुर कटघरे में कैद होकर अपनी देह में छिपी व्यंजना शक्ति से संघर्ष करता। उसकी आत्मा पिंजर में कैद पखेरू की तरह फड़फड़ा उठती। वह बोलने की हर कोशिश में नाकाम रहता। नैराश्य और अवसाद के अंधकार में डूबकर वह फूट-फूट कर रोता था। लेकिन शब्द तो न जाने क���स गिरिगेह में खो गए थे। कई बार ऐसा लगता था, जैसे वह बोल पड़ेगा लेकिन फिर वही मौन की अंतहीन मरुभूमि पसरी दिखाई देती। कैसा विचित्र जीवन !!
आश्रम के संचालक ने उसे वर्णमाला की सीख दी तो वह कभी कभार लिखने लगा; मलमा धौलागिरि। यह मलमा धौलागिरि तो एक पहेली बनकर ही रह गई। नौ साल तक इस विचित्र निर्वाक में रहने के बाद उसकी मृत्यु हो गई। बस कागज़ पर दो शब्द छूट गए मलमा धौलागिरि !! ये शब्द भी उसकी ही तरह अपनी न���रर्थकता में नष्ट हो जाते लेकिन दिल्ली पुलिस इस शब्द का मूल खोजती रही। एक माह की कोशिशों के बाद पता चला कि मलमा धौलागिरि मध्य नेपाल में एक गाँव है।
अंततः जीत बहादुर के घर का पता चला। पता चला कि उसके पिता, पत्नी, बच्चे सब थे। जीत बहादुर का बदन उन्हें सौंपा गया जो पिछले नौ वर्षों में उसे खोज-खोज कर हार चुके थे। नौ वर्षों ��ी इस कुहेलिका में जीत बहादुर का कंठ रुद्ध हो गया था, जैसे कोई राक्षस वहाँ रास्ता रोककर खड़ा हो गया हो। कैसी विचित्र बेचैनी रही होगी उसकी !
दूसरी ओर उसके घर वाले यह मान चुके थे कि अब वह ज़िंदा नहीं है। वह ज़िंदा रहा नौ वर्ष। हर दिन थोड़ा-थोड़ा मरता रहा! और मृत्यु के तीस दिन बाद उसके लिखे दो शब्द अनंत में किसी विद्युन्माला की तरह चमक कर बुझ गए। बुझ जाना ही उसका भाग्य था।
इस धरती पर करोड़ों लोग दुख��� हैं। अथाह दुख है। किस-किस का दुख लिखे आदमी ! लेकिन यह एक विचित्र कथा है। जिसे पढ़कर मैं विचलित हो उठा था.. पता नहीं क्यों..! शायद इसलिए कि एक काश..यहाँ टंगा हुआ है। काश कई जगहों पर रहता है।यहाँ उस काश में जो विकलता या बेचैनी है वह सभी जगहों या प्रसंगों में नहीं होती। उन प्रेम कथाओं में भी नहीं होती जिनमें एक दूसरे को चाहने वाले बिछड़ जाते ��ैं। यह काश कई बार कुछ पल के बाद मुरझा जाता है और कई बार पिंजरबद्ध पखेरू सा बरसों तक फड़फड़ाता रहता है। जब उसकी मुक्ति होती भी है तो वह उड़ना भूल चुका होता है।
- दिव्यांशु झा जी 31/03/2023
@bhupeshbaghel शर्��� की बात है कि आपके जैसा चाटुकार हमारा मुख्यमंत्री बना
इस से भी शर्म की बात होगी अगर कोई विदेशी प्रधानमंत्री बन जाये।
मनरेगा और खा ग्रेस दोनों के दिन लद गये।
#GRAMJi
@abhisar_sharma जिसे धान और गेहूं का अंतर नहीं पता उसे भला क्या ही पता होगा कि उपनाम बदलना कितनी बड़ी जिल्लत है, खेद है कि ऐसे पत्तलकार भी 140 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री की भाषा पर टिप्पणी कर रहे हैं ताकि किसी मंदबुद्धि के Goodbook में बने रहें।
@neha_laldas@HarshThaku66360 तमिलनाडु के मंदिरों के सोने चुराकर सलीब बनाया जा रहा है जिस पर हिन्दू ही टांगे जायेंगे।
तामील नाडू में हिंदू मंदिरों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है इसलिए दान देना बंद करिए और केवल पुजारी को दक्षिणा दीजिए।सक्षम लोग अपने व्यय पर जीर्णोद्धार कराएं