बृजभूषण शरण सिंह के साथ @tejshreethought ने जो भी किया है, उसे कम से कम पत्रकारिता तो नहीं कहते हैं। जब अदालत ने बरी कर दिया, फिर उन्हें अपराध-बोध में डालने का प्रयास क्यों?
तेजश्री पुरंदरे को समझना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के मुँह में माइक ठूँसकर उसपर आरोप लगाकर जवाब माँगना पत्रकारिता नहीं है। उनका सवाल था कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे पहलवानों से वो मिलने क्यों नहीं गए। ऐसे में तो कोई कहीं से उठकर किसी पर आरोप लगा देगा और बाद में पूछने लगेगा कि फलाँ आया क्यों नहीं मेरे पास।
बृजभूषण शरण सिंह फ़िलहाल किसी सार्वजनिक पद पर नहीं हैं। यानी, वो बाध्य नहीं हैं जवाब देने के लिए। अगर सांसद या WFI अध्यक्ष होते अब भी, फिर भी आज की मीडिया के प्रति वो जवाबदेह नहीं रहते। लगातार सनसनी ढूँढने में व्यस्त दोगले पत्रकारों के प्रति तो बिलकुल भी नहीं। फिर भी उनका बड़प्पन था कि उन्होंने एक महिला पत्रकार को पास में बिठाया और उससे सवाल लिया। सवाल तो प्रदर्शनकारियों से होना चाहिए कि जब सबूत नहीं थे तो क्योंकि चलाया इतना लंबा ड्रामा। सवाल तो उनसे होने चाहिए जो हर विरोध प्रदर्शन में सिर्फ़ इसीलिए पहुँच जाते हैं क्योंकि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहा है, मुद्दे से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
अगर मैं अभी आरोप लगा दूँ कि तेजश्री पुरंदरे ने मेरा यौन शोषण किया है, तो क्या वो NDTV से इस्तीफा देंगी? नहीं देंगी, बृजभूषण शरण सिंह WFI की दैनिक गतिविधियों से स्वयं को अलग कर लिया। हिम्मत दिखाई, छाती ठोककर कहा कि आरोप सही साबित हो गए तो स्वयं फाँसी पर लटक जाएँगे। उनका टिकट कट गया, फिर भी जनता ने उनके बेटे को सांसद बनाया। निर्दोष हैं, स्वाभिमानी हैं, जनता के प्रति स्वयं को जवाबदेह मानते हैं - तभी पूरे देश में सीना चौड़ा करके चलते हैं और कहाँ जाते हैं वहाँ उनका भव्य स्वागत होता है।
जिस हरियाणा की लॉबी ने उनपर आरोप लगाए, उसी हरियाणा की बेटी रचना परमार ने जब मेडल जीता तो उनके हाथों ही सम्मानित होना पसंद किया। उसी हरियाणा में घुसकर उस बेटी को सम्मानित करके लौटे। जिगरा इसे कहते हैं। किसी के मुँह में माइक ठूँसकर जबरन शब्द डालने को नहीं।
अगर कोई तुमसे बात नहीं करना चाह रहा है तो उसकी प्राइवेसी का सम्मान करो, अगर ये सामान्य सी बात की भी समझ नहीं तो छोड़ दो पत्रकारिता। इंस्टाग्राम पर वायरल सेंसेशन बनना है तो कर लो कुछ और।
श्री राजपूत करणी सेना के नेतृत्व में अपनी जायज मांगों को लेकर जयपुर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर प्रशासन द्वारा लाठीचार्ज किया जाना अत्यंत निंदनीय है। असहमति की आवाज़ का समाधान बल प्रयोग से नहीं, बल्कि संवाद और संवेदनशीलता से होना चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।
@PMOIndia@RajCMO
भारतीय जनता पार्टी (BJP) जब से सत्ता में आई है, तब से उसने जनता को आपस में लड़ाने के अलावा कोई ठोस काम नहीं किया है। पहले धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर अपनी सत्ता बनाए रखने की कोशिश की गई। जब देश का युवा जागरूक हुआ, तो सरकार ने अपनी कुर्सी खतरे में देखकर UGC बिल लाकर युवाओं को जाति के नाम पर बाँटने का प्रयास किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में इस UGC बिल पर अंतरिम रोक लगा दी।
अब भाजपा सरकार इसे दोबारा लागू करना चाहती है। इसी के विरोध में हमारे युवा साथी महिपाल जी और हजारों युवाओं ने लगभग 500 किलोमीटर की पदयात्रा की है। आज जयपुर में इसके विरोध में शांतिपूर्ण मार्च का आयोजन किया गया है।
मैं राजस्थान की भाजपा सरकार से कहना चाहता हूँ कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को पुलिस बल के माध्यम से रोकने का प्रयास किया गया, तो इससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो सकती है, जिसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।
देश में टकराव का माहौल किसी के हित में नहीं है। लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को शांतिपूर्ण ढंग से उठाने का अधिकार सभी को है।
मुझे आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप सभी UGC बिल का खुलकर विरोध करेंगे।
#UGC_Roll_Back
@mahipalmakrana_
राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव करवाने तथा राजस्थानी भाषा के नियमित विभाग की स्थापना की मांग को लेकर शुभम रेवाड की पिछले 7 दिनों से भूख हड़ताल जारी है। यह सरकार एवं विश्वविद्यालय प्रशासन की असंवेदनशीलता है कि उनकी मांगों को लेकर अभी तक कोई वार्ता तक नहीं की गई है।
चूंकि ये दोनों महत्वपूर्ण मांगें राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, अतः राजस्थान सरकार इस संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप कर युवा छात्र की मांगों का जल्द से जल्द सकारात्मक समाधान निकाले। @RajCMO
राजवीर सर…
अभी राजस्थानियों के पास टाइम नहीं है…
अभी हम जाति जाति खेलने में व्यस्त हैं…
थोड़ा टाईम मिलता है तो नेता नेता भी खेल लेते हैं…
इन सब से मन भर जाएगा… फिर सोचेंगे राजस्थान और राजस्थानी के बारे में…!!!
Since the hon'ble PM Shri @narendramodi is personally handling the burning issue of paper leaks, I urge him to personally intervene on the ethanol blending policy as well.
Just because everyday working-class citizens aren't protesting on the streets doesn't mean this isn't a crisis. Most people can't afford to take leave from work to protest, but that doesn't lessen the severity of the issue.
The public is the biggest stakeholder in fuel policy. People save their hard-earned money for years to buy vehicles and pay taxes, only for officials to unilaterally introduce fuel blends that existing vehicle engines were never designed to handle.
Bringing E20 when most of the existing vehicle fleet was incompatible was already a misstep. Now, as people buy E20-compliant cars, there are talks of pushing to E27 by 2030. Where is the long-term clarity? Policies of such massive scale cannot be left to the whims and siloed decisions of one or two ministers and their teams.
The public deserves a logical, transparent, long-term roadmap with clear timelines so buyers can make informed decisions. Respectfully requesting intervention.
लेकिन राजस्थान वालों को इस सनकी और संकीर्ण वायसराय से कब निजात मिलेगी ?
लार्ड साब, भले विरोध करने वाले युवाओं को राजभवन बुलाकर 6 घंटे बिठा लो, डरा, धमका लो या कुछ अलग डिक्टेटरी कर लो। आपने जो राजस्थान के साथ घटिया मजाक की है वो हमारे बरदाश्त से बाहर है।
@BagadeHaribhau
आज म्हारै भूख हड़ताल रो 4थो दिन है अर जद ताईं म्हारै मायड़ भाषा रो हक नी मिल जावैगा, तद ताईं भूख हड़ताल जारी रैवैगी!
राम-राम सा! 🚩
आज राजस्थान विश्वविद्यालय में म्हारै अनिश्चितकालीन अनशन अर अन्न त्याग रो 4थो दिन है।
आपणी मायड़ भाषा राजस्थानी ने बिनो पूरो हक अर मान-सम्मान दिलावण खातर म्हो यो अन्न त्याग रो संकल्प लगातार जारी है। म्हे आ साफ कर देवां कि आपणी भाषा रो अधिकार म्हे लेयने ही रेहस्यां, अर इण खातर राजस्थान विश्वविद्यालय में 'राजस्थानी भाषा विभाग' (Department of Rajasthani Language) बणनो ही चाहीजै।
जद ताईं सरकार अर विश्वविद्यालय प्रशासन म्हारै राजस्थानी भाषा विभाग खोलबा रो निर्णय नी लेवैगा अर म्हारै माँगां ने नी मान लेवैगा, तद ताईं म्हारो यो अनिश्चितकालीन अनशन इणियां ही जारी रैवैगो।
आपणी भाषा, आपणी पहचान अर प्रदेश रा छात्रां रा हक खातर म्हारो यो संघर्ष पूरै धीरज अर शांतिपूर्ण तरीके सूं चालतो रैवैगो। आप सब युवा साथियां रो समर्थन ही म्हारो सबसूं बडो बळ है।
इंकलाब जिंदाबाद!
छात्र शक्ति जिंदाबाद!
— शुभम रेवाड़
@RajveerChalkoi@Rajsthanikaka
छात्र नेता शुभम रेवाड़ दो दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
शुभम की तीन मांगे हैं -
• शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा।
• राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा का विभाग खोला जाए।
• छात्रसंघ चुनावों की बहाली हो।
शुभम की तीनों मांगे जायज है। इसलिए आज यूनिवर्सिटी पहुंचकर शुभम का हौंसला अफजाई किया। जिम्मेदार नागरिक जरूर शुभम को मोटिवेट करें।
@ShubhamRewar4U
इस आंदोलन को केवल वामपंथियों का और भाजपा विरोधियों का आंदोलन मान लेना मूर्खता की पराकाष्ठा है। ये सही है, आंदोलन शुरू करने वाले वही भाजपा-मोदी विरोधी, वही जेनएयू छाप वामपंथी आदि ही थे। बाद में भी खालिस्तान सपोर्टर, मुसलमान आदि ही ज्यादा जुड़ते गए थे लेकिन केवल वही सब लोग इस प्रोटेस्ट में शामिल हैं ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।
आज आंदोलन जिस स्थिति में है उसमे आम छात्र और अन्य आम लोग भी शामिल हैं क्यूंकि जिस तरह इस सरकार में हर विषय पर मनमानी की जा रही है, कहीं कोई सुनवाई नहीं, विरोध करने पर FIR होती है। ED CBI के माध्यम से खुला भ्रष्टाचार चल रहा है उससे मोदी सरकार की लोकप्रियता में ज़बरदस्त गिरावट आयी है।
आज मोदी की वो लोकप्रियता नहीं जो 2024 से पहले थी। लोकप्रियता में गिरावट का मापदंड तो लोकसभा में बहुमत ना मिलना ही था और उसके बाद से मोदी की लोकप्रियता में लगातार गिरावट है।
लगातार होते पेपर लीक, राम मंदिर दान चोरी, एथनॉल, पेट्रोल के दाम, बेतादाद बेफिज़ूल विदेश यात्राएं, मोदी मोदी के प्रायोजित इवेंट आदि बहुत से कारण हैं जिनसे इस सरकार की लोकप्रियता लगातार गिरी है।
मीडिया पर इस सरकार ने पूरा नियंत्रण कर लिया है इसलिए upa की तरह 2 g, कामनवेल्थ, कोयला घोटाले सामने नहीं आ रहे वरना इस सरकार में जो नियमो को ताक पर रखकर अपने करीबी कारोबारियों को फायदा पहुंचाया गया वैसा 80 साल में कभी हुआ ही नहीं।
भक्तों की संख्या में भी ज़बरदस्त गिरावट आयी है। अब अंध भक्त केवल 50 या उससे अधिक उम्र वाले हैं जिनका ज़िन्दगी में अब कुछ नहीं हो सकता। ना वो समझ सकते हैं, ना उन्हें समझाने का कोई फायदा।
लेकिन 18 से 40 की उम्र में के लोग बड़ी संख्या में अब समझ चुके हैं कि इस सरकार के पास येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहने के अलावा देश के लिए कोई विजन या अजेंडा है ही नहीं। हिन्दू मुस्लिम करते करते इन्होने आज जातियों में ही आपसी फूट डालना शुरू कर दिया है। बस इसीलिए इसे मात्र वामपंथी विरोध नहीं कहा जा सकता है।
यह पढ़ कर हंसी आती है
और गुस्सा भी आता है
राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ कह रहे हैं कि भाजपा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दिलवाने के लिए प्रयासरत है और कांग्रेस मान्यता के मुद्दे पर राजनीति कर रही है। मैं कहता हूं ये दोनों ही पार्टियां राजनीति कर रही हैं। आठ करोड़ राजस्थानियों की भावना के साथ खिलवाड़ कर रही हैं।
दोनों ही पार्टियों ने राजस्थानी भाषा प्रेमियों को बारी-बारी से ठगा है। ऊपर से मूर्ख बनाने के प्रयास अलग से किए जा रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है। राजस्थानी भाषा की मान्यता का आंदोलन बरसों से चल रहा है। 1992 में दिल्ली में दिया गया धरना तो ऐतिहासिक था। पीढ़ियां खप गई मान्यता के इंतजार में कन्हैयालाल जी सेठिया जैसे कवि मान्यता की साध लिए दुनिया से ही चले गए। प्रेम भंडारी जी जैसे लोग बरसों से मान्यता मिलने पर ही अपना जन्मदिन मनाने की ठाने हुए हैं। जीवन तो एक बार ही मिलता है।
अब आपको भाजपा और कांग्रेस दोनों के दोगलेपन से रूबरू करवाना बेहद जरूरी है। 2003 में राजस्थान की विधानसभा ने राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया था। उस ऐतिहासिक घटना को आज 23 साल पूरे हो गए। इस दौरान पूरे 10 साल केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही। इस दौरान पूरे 13 साल केंद्र में भाजपा की सरकार रही। इस दौरान 2008 से 2013 तक राजस्थान और केंद्र दोनों में कांग्रेस की सरकार रही। इस दौरान 2014 से 2018 तक और 2023 के अंत से आज तक राजस्थान और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है।
किसी भी पार्टी के पास कोई भी बहाना नहीं है और कोई भी सफाई नहीं है। इन्हें सिर्फ आरोप लगाने आते हैं। बचाव करना आता है। सफाई देना आता है और सबसे बढ़िया काम आता है गोली देने का। शर्म दोनों ही पार्टियों को नहीं आती। दोनों ही पार्टियों को आज फैक्ट्स के साथ शर्मिंदा करने की जरूरत है। राजस्थानी भाषा के साथ बहुत खिलवाड़ हो चुका है। अब आपको सबूत देना होगा कि आपने सच में किया क्या है?
अगर आप कह रहे हैं कि राजस्थानी को भाषा बनाने के लिए भाषाविदों को जुटाना होगा तो फिर बताइए राजस्थान के लोगों को कि सहमति बनाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए? नहीं है आपके पास कोई भी जवाब। नहीं ही होगा क्योंकि आपने अब तक इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं किया है।
संवैधानिक मान्यता देना राज्य के हाथ में नहीं है, समझ में आता है। लेकिन राजभाषा बनाने का अधिकार राज्य सरकार के हाथ में है। दोनों ही पार्टियां बताएं, पिछले 30 साल में दोनों पार्टियां तीन-तीन बार सत्ता में आ चुकी है। राजभाषा बनाने की दिशा में क्या कदम उठाए गए? नहीं होगा आपके पास कोई भी जवाब। क्योंकि आपने कुछ भी नहीं किया।
बयान जारी करने में और काम करने में बड़ा फर्क होता है। कुछ करके दिखाइए, वरना चुपचाप बैठे रहिए। होना-जाना कुछ है ही नहीं तो इन बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों का अर्थ क्या है? जनता कुछ समझती नहीं है क्या?
#राजस्थानी
साथियों, राज्यपाल महोदय स्वयं महाराष्ट्र से आते हैं, हमें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है। अपनी मातृभाषा से प्रेम करना अच्छी बात है, लेकिन महामहिम को यह समझना होगा कि वे महाराष्ट्र के नहीं, बल्कि राजस्थान के राज्यपाल हैं! ऐसा लगता है कि महामहिम को राजस्थान की भाषा और यहाँ की संस्कृति समझ नहीं आ रही, इसीलिए उन्होंने सोचा कि चलो राजस्थान पर मेरी खुद की भाषा ही लागू कर देता हूँ! राजस्थानी भाषा को दरकिनार करके, उसे नीचे रखकर, मराठी भाषा को प्राथमिकता देना राजस्थान के करोड़ों युवाओं और छात्र शक्ति के स्वाभिमान पर सीधा प्रहार है!हम इस मंच से साफ कर देना चाहते हैं कि हम किसी भी भाषा का अपमान या अनादर नहीं करते। भारत की सभी भाषाएं हमारे लिए पूजनीय हैं, और राजस्थान का दिल इतना बड़ा है कि यहाँ हर भाषा के लिए हमेशा द्वार खुले हैं। लेकिन हमारा विरोध इस पक्षपातपूर्ण रवैये से है!एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि स्कूलों में राजस्थानी भाषा अनिवार्य करो, प्रदेश का युवा सालों से मांग कर रहा है कि हर यूनिवर्सिटी में राजस्थानी विभाग खोलो—तब तो सरकार और राजभवन की फाइलें आगे नहीं बढ़तीं! और जैसे ही महाराष्ट्र सरकार से प्रस्ताव आता है, राज्यपाल जी तुरंत सक्रिय हो जाते हैं और उसे सब जगह लागू करने का आदेश दे देते हैं! क्या राजस्थान की यूनिवर्सिटीज राजस्थान के युवाओं के लिए हैं या अपनी पसंद की भाषाएं थोपने के लिए?आज इस पुतला दहन के माध्यम से हम राजभवन तक यह साफ संदेश पहुँचाना चाहते हैं: 'पहले मायड़ भाषा का सम्मान करो, फिर किसी और भाषा की बात करो!' हमारी मांग सीधी है—अगर मराठी के केंद्र खुलेंगे, तो उससे पहले राजस्थान की हर एक यूनिवर्सिटी में राजस्थानी भाषा का पूर्ण विभाग अनिवार्य रूप से खुलना चाहिए! अगर हमारी भाषा को उसका हक नहीं मिला, तो यह छात्र आंदोलन थमेगा नहीं, बल्कि और उग्र होगा!राजस्थानी भाषा को उसका हक दो!छात्र शक्ति ज़िंदाबाद! इंकलाब ज़िंदाबाद!"
#RajasthanUniversity
#ShubhamRewarRU