भय मौत से नहीं
उसके साथ आने वाली पीड़ा से लगता है
सच में? यदि ऐसा है तो डुबकी लगाती रही
पीड़ाओं की पीली नील नदी में
क्यों उसके बतियाती रही
क्या सच में मुझे मौत भयभीत नहीं करती
मौत एक अन्तराल होती है,
Rati Saxena
Kritya Poetry East & West invites you to an evening of poetry bringing together We are delighted to present Dimitris P. Kraniotis from Greece, Juana Ramos from the USA/El Salvador, Ravichandra P. Chittampalli from Mysore/Malaysia, and Basant Tripathi from Allahabad.
अकेले रहना कोई दर्द नहीं है
सुलेमा ने सिखाया था
अकेले रहते हुए दुनिया के हो सकते हैं
उसी ने बताया था
अकेले मरना संभवतया मुश्किल होगा
लेकिन वह बता नहीं पाई
क्यों कि बिना बताए मर गई
रति सक्सेना
ग्रेंड रैपिड में चार बिल्लियों के साथ
अकेले रहने वाली सुलेमा
दो चर्चों से दोस्ती रखने वाली,
जिसने बड़े गर्व से अपने दो गे दोस्तों से मिलवाया
अक्सर हा करती थी
हमारी जिन्दगी का सुख बस इतना हैं
कि घर में कोई इंतजार नहीं करता
केले रहना कोई दर्द नहीं है
सुलेमा ने सिखाया था
रतिसक्सेना
मेरे हाथ में प्याला है,
जिसमें सिर्फ दो घूंट चाय बची है
कई बार टूटा यह प्याला,
कई बार मैंने दरारें भरीं
कुछ भी न हो पास में
सिवाय एक खूबसूरत प्याली के
जिसमें भरी गुलाबी खुशबूदार चाय
जिन्दगी अमीर लगने लगती है
कायदे से जीना, तो जिन्दगी से विदा भी
कायदे से होनी चाहिए
रति सक्सेना
चिंता इस बात की होनी चाहिए कि लोग अपने बच्चों के लिए स्कूल ही नहीं चाह रहे हैं, बात हो रहीं है एक गलत मुहावरे के कारण खास बना दी गई कुछ पंक्तियों पर...
र शब्द का इतिहास होता है, और उस इतिहास में उस शब्द के अनेक अर्थ भी होते हैं। कभी-कभी एक ही शब्द के दो विरोधी अर्थ होते हैं—एक वस्तुस्थिति और दूसरा थोपा हुआ। ध्यातव्य यह है कि शब्दों के अर्थ में सामाजिक-राजनैतिक मनोवृत्ति होती है। अब समझ लीजिए कि दीमागी नक्सल की यात्रा कैसी रही?
Let it be unfinished
Dear poet
Poetry is not complete
As life is uncomplet without death
And death is not the end
Remember TAO
Fill you broken cup
With golden lines
And take the sip till
The bitterness of life
Becomes sweet
I am also following
Your path
We will play flute
मेरी अधिकतर किताबें रिसर्च से संबंधित हैं, और उन्हें लिखने में मुझे छह-सात साल से ज्यादा का भी समय लग जाता है। कहानी लिखती नहीं, कविता तो बीच-बीच में दबे पाँव आती है, और जब झुंड बना लेती हूँ तो किताब की शक्ल ले लेती है। मेरे अनुवाद भी सालों की कमाई हैं,
आज मैं दिवस घोषित हुआ