कसार देवी मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, हिमालय, ध्यान और विज्ञान का भी अद्भुत संगम है। सदियों से यह स्थान साधकों, योगियों, ऋषियों और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। पूरी पोस्ट पढ़े 👉🏻 https://t.co/6Jv4y5RLQA
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आसाराम बापू को हाई कोर्ट से सजा मिली है !
ये तो हमने सुना है, लेकिन सजा कैसे और किस बेसिस पर मिली है ? ये जानकर हर कोई हैरान हो जाता है।
#AsaramBapuCase#LegalOpinion
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No. 259
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आसाराम बापूजी की इतनी गंभीर हालत होने के बाद भी BJP सरकार उनके उपचार के लिए जमानत या पेरोल दिए जाने का विरोध करती है।
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जिनके आंखें जलती हो, एक लीटर पानी उबालें, आधा लीटर हो जाए। कुछ दिन वही पानी स्वाभाविक, जब पीने लायक हो, ठंडा हो जाए, वो पिए, तो आंखें जलने की तकलीफ ठीक हो जाएगी।
कटोरी में पानी ले लें, मुंह में थोड़ा पानी रखें और आंख पानी में डुबाएं। आंखों की जलन ठीक होगी।
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साधन के चार उद्देश्य होने चाहिए जीवन के..। एक तो हमको जीवन में क्या पाना है? वास्तविक में और जिसको पाने के बाद कुछ पाना नहीं रहता उसको जिसने पाया है उसको कैसे रिझाएं और उसको कैसे समझें? ये दो जिसको पाने के बाद खोने का भय न रहे और जिससे बढ़कर कुछ न हो और जो सदा अपने पास, अपने साथ रहे और मौत के बाप की भी दाल न गले, हमें ऐसा पाना है। सारे जन्मों की गधा मजूरी का अंत हो जाए और परम सुख की प्राप्ति हो जाए।
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औधव ने पूछा कि सबसे बढ़िया में बढ़िया काम क्या है? सबसे बढ़िया में बढ़िया पुरुषार्थ क्या है? सब में बढ़िया में बढ़िया विजय क्या है?
तब श्री कृष्ण ने कहा — “स्वभाव विजय इति शौर्य।” अपना जीव का स्वभाव, कामी, क्रोधी का स्वभाव पर विजय पाकर आत्मा-परमात्मा का स्वभाव में जगना, ये बड़े में बड़ा विजय है।
दुनिया के सारे पहलवानों को हरा लिया, लेकिन मन तुमको कामी, क्रोधी, लोभी, मोही बनाता है, तो आप तुच्छ पहलवान हैं। लेकिन किसी को, एक कीड़ी को भी आप नहीं हरा सकते। फिर भी आपने अपने स्वभाव में भगवत्स्वभाव का रस भर दिया। आप धनभागी हो गए।
शबरी, भीलन धनभागी हो गए। रावण ऐसे के ऐसे रह गए। रैदास धनभागी हो गए। हिटलर, सिकंदर ऐसे के ऐसे रह गए? तो ये सार बात है सिद्धांत।
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सुख भोग की इच्छा है वो पराधीन बना देती है।
साधन निर्माण में पराधीनता नहीं है,
जप में पराधीनता नहीं है, ध्यान में पराधीनता नहीं है, संकल्प छोड़ने में पराधीनता नहीं है।
संकल्प पूर्ति में पराधीनता है, असाधन में पराधीनता है।
साधन में स्वतंत्रता है और साधन साध्य से मिलाता है। ईश्वर साध्य है।
साधन साध्य से मिलाता है और असाधन असाध्य की तरफ घसीट के ले जाता है।
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No.253
आसाराम बापू पर बलात्कार के आरोप नहीं हैं,पर मीडिया और सत्ता का ऐसा दुरुपयोग किया गया कि उन्हें बलात्कारी साबित किया गया।
इसके बावजूद,जिसपर असली बलात्कार के आरोप हैं, उस वकील को आसाराम बापू केस में हीरो बनाकर पेश किया जाता है।
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अगर लिवर की तकलीफ है, जौंडिस (पीलिया) है, हृदय कमजोर है, मस्तिष्क कमजोर है। रोग दूर नहीं होते जल्दी। यकृत खराब है, पाचन तंत्र खराब है। इन सब को मजबूत करता है वो मंत्र। शनिचर का ग्रह है, उसको भी, शनिचर को भी प्रेम से रवाना करने वाला मंत्र है। चाहे सात वर्षीय, साढ़े सात वर्षीय हो, चाहे पंच वर्षीय शनि हो, चाहे ढाई वर्षीय शनि हो। नाराज होकर नहीं जाता, ऐसे ही शनिचर का ग्रह विदाई हो जाता है।
अगर पीलिया हो गया, तो भी वही मंत्र। शनिचर का ग्रह है, तो भी वही मंत्र। पाचन तंत्र, हृदय की, मस्तिष्क की गड़बड़ है, तो वही मंत्र। एक छोटा सा बीज मंत्र बताता हूं — “खं ,खं,खं,खं,खं,खं,खं"
तो “खं,खं” जप अगर 50 माला करते हैं, तो jaundice मिट जाएगा। गुरु गीता का पाठ, ओमकार का जप, शिव जी का, राम जी का, गुरु जी का चिंतन इस मंत्र की सिद्धि में सहायक होता है।
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मन ही हमारे दुख सुख का और ऊंचाई-नीचाई का, पतन और उत्थान का कारण है। न ग्रहशास्त्र कारण है, न प्रारब्ध वेग कारण है, न ज्योतिष कारण है। हमारा मन ही हमारे पतन और उत्थान का कारण है। ये श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में लिखा है और गीता कहती है, "आत्मैव आत्मनो बंधु।" मनुष्य अपने आप का बंधु है और अपने आप का शत्रु है। तो पुरुषार्थ ये करना है कि मन में जो आए, वो खा लिया, जो आए, वो बोल दिया, जैसा आए, वो कर लिया, तो अपने आप का सत्यानाश करने वाला है। अगर मन के आगे धर्मशास्त्र, ईश्वर आज्ञा, समाज व्यवस्था रखकर नियंत्रित करके मन को चलाया जाए, तो मन आपको ईश्वरमय कर सकता है। यहां है पुरुषार्थ।
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आप भी अपने इष्ट का चिंतन करो और इष्ट के नाम का जप करो, केवल स्थूल शरीर पर ही फ़ायदा करता है यह विदेशियों की खोज अभी तो अन्नमय कोश तक आई है, लेकिन आपके ऋषियों की खोज तो प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोशों की यात्रा करते करते सृष्टि कर्ता के उस आनंदकुंभ तक पहुंचाने की व्यवस्था है, मंत्र-ध्यान में।
मन्त्र जाप मम दृढ़ विस्वासा ।
पंचम भगति ये वेद प्रकाशा।।
ये भक्ति का पांचवां सोपान माना गया है।
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जब एक ही उद्देश्य लेकर बहुत लोग बैठते हैं ना, तो उसका आभा मंडल में बड़ा प्रभाव पड़ता है। एक ही उद्देश्य, एक ही मंत्र लेकर बहुत लोग करते हैं, तो वातावरण में बहुत उसका प्रभाव पड़ता है। एक ही मंत्र, एक ही उद्देश्य लेकर बैठे, तो उसका बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है।#AsharamjiBapu
इसमें आपको एक दिव्य सच्चाई मिलेगी भागवत में । मंगलाचरण में क्या बोल रहे हैं.. सच्चिदानंद । ऐसा नहीं कि अर्जुन के रथ पर बैठे हुए कृष्ण...नहीं ।देखलो ये सनातन धर्म के ग्रंथों की विशेषता देख लो । हमारी बुद्धि में कितना कुछ भगवद रस, भगवद ज्ञान स्पष्टता से भर देते हैं।
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जो शरीर में बल है, कफ है, जो मेद है, वो थोड़ा गलेगा और वो कफ गल के जठरा में आता है, तो भूख थोड़ी कम लगती है, तो गर्मी में पाचन तंत्र सर्दी जैसा पाचन नहीं होता। सर्दी में आदमी पाक खाता है, मेथी-पाक खाता है, अड़द-पाक खाता है, क्या-क्या खाता…. सूंठी-पाक खाता है, लेकिन गर्मी में सूंठी-पाक मुंठी-पाक खाएगा, बीमार हो जाएगा, मत खाना अब सूंठी-पाक। खबरदार! खजूर, वजूर,काजू, बादाम अब खाएगा, तो किडनी पर बोझा पड़ेगा, फिर बायपास सर्जरी या तो किडनी बदलना या किडनी का गड़बड़ी, ये सब होता है, तो ज्यो ज्यो गर्मी बढ़ती है, तो भूख कम लगती।#AsharamjiBapu