बात है 2005 की..जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका की यात्रा पर थे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, एक विदेशी पत्रकार ने बड़े व्यंग्य भरे अंदाज में डॉ. सिंह से पूछा "प्रधानमंत्री जी, आप इतने शांत क्यों रहते हैं? क्या आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है?"
वो दौर भारत के लिए बहुत अहम था। एक तरफ भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर काम चल रहा था, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरें भारत पर जमी थीं।
जब विदेशी पत्रकार ने बड़े व्यंग्य भरे अंदाज में डॉ. सिंह से पूछा उस समय पूरे हॉल में सन्नाटा था। सब यह देख रहे थे कि प्रधानमंत्री क्या जवाब देंगे। डॉ. सिंह ने कोई गुस्सा नहीं किया, कोई आक्रामक भाषण नहीं दिया। उन्होंने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ बहुत सादी भाषा में कहा:
"देखिए, मैं एक अर्थशास्त्री हूँ। और अर्थशास्त्री यह अच्छी तरह समझते हैं कि शोर मचाने से बाजार या नीतियां नहीं सुधरतीं। काम तो ठोस नीतियों से होता है। शोर मचाने के लिए तो वैसे भी बहुत लोग हैं।"
उनके इस जवाब ने वहां बैठे दिग्गजों को चुप करा दिया। अगले दिन अखबारों की हेडलाइन बनी— "The Quiet Diplomat" (शांत कूटनीतिज्ञ)।
डॉ. सिंह का वह कार्यकाल जिसमें उन्होंने करोड़ों रुपये खर्च करके अपनी छवि नहीं चमकाई, झूठे वादे नहीं किये, हर समस्या के लिए विपक्षी पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहराया, आज भी आर्थिक सुधारों के लिए याद किया जाता है।
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