हमारी इस जीवनशाला में जब से यह आरंभ होती हैं तब से हमारे ख़ास जो हमारे इतने करीब हो जाते है जिनको हम खोना नहीं चाहते पर वक्त की गर्दिश में वो न जाने ऐसे हमसे छुटते हैं कि मानो कोई थे ही नहीं उनके निशा तक नहीं रहते,
ज़िंदगी बहुत अजीब है साहब, हम किसी भी चीज़ के बगैर आते हैं, फिर हम हर चीज़ के लिए लड़ते हैं, फिर हम हर चीज़ छोड़ कर बगैर किसी चीज़ के रुखसत हो जाते हैं