Neha Bora, who was "unable to walk," started dancing right after Dharmendra Pradhan resigned.
This totally proves her 23-day hunger strike was 420% genuine. 🤡
मीडिया के ख़िलाफ़ फैलाई नफ़रत में ख़ुद ही फँसते हुए देख कर दुख हुआ।
वो तो शुक्र है मास्क वाले ‘सिपाहियों’ का कि कुछ अनहोनी नहीं हुई।
वो कौन सा दोहा है?
करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय॥
कहाँ गया वो नफ़रती कीड़ा जिसकी देन है ये नफ़रत? उसने अजीत जी का कुशल मंगल जाना के नहीं?
US की लेखिका रेनी लिन का क्या कहना है अपने आप सुनिए
उनका कहना है जब से धर्मेंद्र प्रधान ने मुगलों का इतिहास भारतीय सिलेबस से हटाया है , तब से वो एक बहुत मजबूत इंटरनेशन लॉबी के निशाने पर थे ,
वो लॉबी भारतीय हिंदू शासकों का इतिहास नहीं चाहती है भारतीय पाठ्यक्रम में
उनका हटना गलत है
लेकिन हमारे यहां की पब्लिक को ये सब कहां समझ आता है
GenZ अल्ट्रा मॉडर्न बनने के लिए गाली दे रही है आंदोलन में
और विपक्षी पार्टियां उनका सपोर्ट करके दंगा करवा रही है ।।
@Voice_For_India
अपनी पार्टी से मोह भंग होने के बाद
डेमोक्रेसी के हेल्दी साइन के माध्यम से विपक्ष को घेरतीं माननीया सायोनी जी,
यही तो खूबसूरती है हमारे देश के नेताओं की!
@OfficialDMRC is getting f*king stupid day by day... These crooks are employed to loot the public.
It's halting and stopping randomly whenever and wherever they want without any reason.
You can check from Dwarka sec 21 towards Rajiv Chowk train at 8:06 PM at Dwarka station
“कॉकरोच जनता पार्टी” अब कुकुरमुत्ता जनता पार्टी बन चुकी है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, X और यूट्यूब पर अलग अलग कॉकरोच पार्टी बनाकर फॉलोअर बनाते जा रहे हैं। सब खुद को असली कॉकरोच बता रहे हैं जबकि ये खून चूसने वाली जोंक हैं, जो लोगों की भावनाओं का बखूबी इस्तेमाल करना जानते हैं।इनसे बचकर रहें, बाकी सबको शेयर करें ताकि लोगों को असलियत पता चले।
~NEET पेपर लीक - कोई आवाज नहीं
~पेट्रोल डीजल मंहगा - कोई आवाज नहीं
~रुपया की गिरावट - कोई आवाज नहीं
~भयानक मंदी की आहट - कोई आवाज नहीं
~नौकरी पर खतरा - कोई आवाज नहीं
लेकिन "मेलोडी टॉफी" पर सुबह से हंगामा काटे हुए हैं।
पता नहीं क्या मजबूरी है इनकी, जो इनको शर्म भी नहीं आती है?
नाम नहीं लूंगा, आप लोग गूगल कर लेना।
ज्यादा पुरानी बात नहीं है-एक युवा राज्यसभा सांसद आम लोगों के मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते थे। एयरपोर्ट पर समोसे की कीमत तक को लेकर फिक्रमंद रहते थे।
Gen Z जनता उनसे इंस्टाग्राम पर खूब जुड़ी हुई है।
लेकिन अभी NEET पेपर लीक, जो Gen Z का इतना बड़ा मुद्दा है, उस पर न जाने क्यों चुप हैं। पता नहीं क्या वजह है। उन्हें पता तो होगा ही कि पेपर लीक हो गया है।
देश में एक वर्ष के लिए सभी छोटी -बड़ी राजनीतिक रैलियां , बड़े धार्मिक समारोह -समागम और बड़े -बड़े सरकारी उद्घाटन कार्यक्रम रोक दिए जाने चाहिए ---- तेल की खपत इन सब में सबसे ज्यादा होती है -----
हमारी खुरपेंची टीम का नया जनता जागरूकता अभियान शुरू हो चुका है।
जैसे पिछली बार MPLADS पोर्टल खंगाला गया था,
इस बार "स्मार्ट सिटीज योजना" की कुंडली खंगाली जा रही है।
उस स्मार्ट "सिटी" नाम कमेंट में बताइए, जहां आपको लगता है, तगड़ी छानबीन होनी चाहिए।
"राहत इंदौरी" ने जिस दुर्भावना से ये लिखा था कि
"सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है."
राहत ने जिस दुर्भावना के साथ ये लिखा था, उसका माकूल और खूबसूरत जवाब
"बेचैन मधुपुरी" जी ने दिया है।
"बेचैन मधुपुरी" जी ने बहुत ही बेहतरीन जवाब दिया है।
आप भी उनके कायल हो जाएँगे।
“ख़फ़ा होते हैं तो हो जाने दो,
घर के मेहमान थोड़ी हैं;
सारे जहाँ भर से लताड़े जा चुके हैं, इनका मान थोड़ी है ।
ये कान्हा , राम की धरती है,
सजदा करना ही होगा;
मेरा वतन ये मेरी माँ है;
लूट का सामान थोड़ी है।
मैं जानता हूँ ; घर में बन चुके हैं सैकड़ों भेदी; जो सिक्कों में बिक गए; वो मेरा ईमान थोड़ी है।
हमारे पुरखों ने सींचा है;
इस वतन को अपने लहू के कतरों से;
बहुत बांटा मगर अब बस;
ख़ैराते आम थोड़ी है।
जो रहजन थे; उन्हें हाकिम बना कर उम्रभर पूजा ;
मगर अब हम भी इस सच्चाई से अनजान थोड़ी हैं ?
बहुत लूटा फिरंगी ने; कभी बाबर के पूतों ने ;
ये मेरा घर है ; मुफ्त की सराय
मेरी जान, थोड़ी है।
कुछ तो अपने भी शामिल हैं,
वतन तोड़ने में;
अब ये कन्हैया औ रविश मुसलमान थोड़ी हैं ???
यकीनन किरायेदार ही मालूम पड़ते हैं ये इस मुल्क में;
यूं बेमुरव्वत, कोई जलाता है,
अपना ही मकान थोड़ी है ???
सभी का खून शामिल था यहाँ की मिट्टी में; हम अनजान थोड़े हैं।
मगर जिनके अब्बा ले चुके पाकिस्तान; अब उनका हिंदुस्तान थोड़ी है ???
👆
😡
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शताब्दी लखनऊ से चलते वक्त जोश से भरी हुई होती है। मुसाफ़िर एक्टिव होते हैं। फ़ोन की घंटियां बजती रहतीं हैं और लोग बताते रहते हैं "हां, बस अभी चली है, हां-हां बैइठे हैं आराम से बैइठे हैं। क्या?.... नहीं उनका तो नहीं आया लेकिन फूफा जी की कॉल आयी थी, बता रहे थे मिठाई पहुंची नहीं"
कुछ देर तक सीट अदला बदली वाले एक्टिव रहते हैं जिन्होंने टिकट साथ कराए थे लेकिन सीटें अलग अलग मिल गयीं। "ऐसा कीजिए, आप इधर आ जाइये, तो ये वाली पर इनको बुला लीजिए, इक्तीस बत्तीस उनकी है तो ये बहन जी इस पर आ जाएं, ये भाई साहब तो सिंगल हैं ये वही बैठे रहें इनका क्या है"
थोड़ी देर में चाय आ जाती है, चाय भी ऐसी आती है कि पहले गरम पानी दे जाते हैं, फिर एक ट्रे में चीनी का पैकेट, दूध पाऊडर और ताबीज़ वाली चायपत्ती। चाय बनाने में दो स्टेशन निकल जाते हैं।
इसके बाद धीरे-धीरे लोग थकना शुरु होते हैं। डिब्बे की कलेक्टिव एनर्जी "कितने स्टेशन बचे हैं" हो जाती है। बोरियत में लोग किसी रैंडम आदमी के आए कॉल को भी "और बताओ, और बताओ" करके खींचने लगते हैं। धीरे-धीरे थकान और बढ़ती है। आंखें भारी होने लगती हैं। कुछ लोग बैठे-बैठे सोने लगते हैं। इटावा के आगे तक सब लोग सीट पर बैठे-बैठे पैर स्ट्रैच करने लगते हैं और नमकीन के खाली पैकटों के पीछे लिखी कंपनियों के नाम देखकर "ठेका मिला होगा कंपनी को, किसी नेता की होगी" वाली बातें भी कर चुके होते हैं। आंखें और भारी होती हैं, डिब्बे में उबासियां दिखाई देने लगती हैं। एनर्जी लेवल ज़ीरो तक छू जाता है। लेकिन तभी... इंकलाब आता है....
सामने वाला स्लाइड डोर एक तरफ खिसकता है। नीली वर्दी में कैप लगाए एक सांवला आदमी एक हाथ पर लाल-हरी ट्रे एक के ऊपर एक रखे अंदर दाखिल होता है। "चलो भैय्या खाना आ गया" हल्की सी आवाज़ गूंजती है और ये वही पल होता है जिसके बाद सब बदल जाता है। अंगड़ाइयां गूंजती हैं, पीछे झुकी कुर्सियां सीधी हो जाती हैं और फिर पूरे डिब्बे में ये आवाज़े गूंजने लगती है "लाओ भैय्या आराम से, मेरा तो वेज था। नॉनवेज में सिर्फ अंडा होगा? रोटी मशीन से बनती होगी? आप इसमें से दही ले लीजिए हम खाते नहीं है, अचार मिला लो दाल में ये लोग फीकी बनाते हैं, मेरा पैकेट सूखी सब्ज़ी कम है, अभी आइसक्रीम भी मिलेगी" सबको एक साथ खाते पीते देखकर ऐसा रंगारंग माहौल हो जाता है कि लगता है छोटे मामा के तिलक में बैठे हैं और कोट पहने टीटी आकर बस कहने ही वाले हैं "अरे आप लोग तो कुछ ले ही नहीं रहे हैं"