#किसको_मिले_कबीरभगवान
संत गरीबदास जी (गाँव - छुड़ानी, जिला- झज्जर, हरियाणा) को कबीर परमेश्वर सन् 1727 में खेतों में 'जिंदा महात्मा' के रूप में मिले और उन्हें सतलोक का साक्षात्कार कराया।
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कबीर परमात्मा, हजरत अली को मिले, उन्हें कलमा प्रदान किया था। इस बारे में सूक्ष्मवेद में कहा गया है:
गरीब, अली अलह का शेर है, सीना स्वाफ शरीर।
कृष्ण अली एकै कली, न्यारी कला कबीर।।
गरीब, अली अलीलौं हो गये, मुहम्मद पदम पचास।
कबीर एक का एक है, करो तास की आश।।
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संत मलूक दास जी को भी कबीर परमात्मा के दर्शन हुए थे।
उन्होंने अपने पद में कबीर साहेब की महिमा का गान किया है:
जपो रे मन सतगुरु नाम कबीर।। जपो रे मन परमेश्वर नाम कबीर। चार दाग से सतगुरु न्यारा, अजरो अमर शरीर। दास मलूक सलूक कहत हैं, खोजो खसम कबीर।।
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यहूदी धर्म के प्रवर्तक माने जाने वाले हज़रत मूसा जी को उनके अल्लाह ने, उनसे अधिक ज्ञानी 'अल-खिज़्र' के पास जाकर इल्म (ज्ञान) प्राप्त करने का निर्देश दिया था।
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त्रेतायुग में हनुमानजी को मीले कबीर परमेश्वर,
रावण के वध के बाद अयोध्या में माता सीता द्वारा हनुमानजी जी का अपमान करने पर हनुमान जी वापिस जंगल में चले गए थे तब ऋषि मुनिंदर के रूप में मिले थे।
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रामानंद जी कबीर साहेब के गुरु माने जाते हैं लेकिन असल सच्चाई यह है कि कबीर साहब ने रामानंद जी को ज्ञान दिया और गुरु पद दिया और उन्होंने सत्यलोक का ज्ञान कराया तब रामानंद जी को ज्ञान हुआ
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कबीर परमात्मा मंसूर अली और उनकी बहन शिमली को भी शम्स तबरेज जी के रूप में मिले थे। आदरणीय संत गरीब दास जी कहते हैं:
गरीब, बहुर शमशतबरेज समझाये मंसूर। शिमली पर साका हुआ पहुंचे तख्त हजूर।।
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सूफी संत रूमी को कबीर परमात्मा शम्स तबरेज के रूप में १५ नवंबर १२४४ को कोन्या में मिले।जिसके बाद रूमी ने अपने मुर्शिद (गुरु) शम्स तबरेज की बड़ाई में लिखी दो रचनाओं मसनवी और दीवानए कबीर में भी कबीर परमात्मा अर्थात अल-खिज का जिक्र किया है।
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संत रामपाल जी महाराज (गाँव- धनाना, जिला- सोनीपत, हरियाणा)
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से परमेश्वर कबीर साहेब जी की भेंट संवत् 2054, फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष की एकम (9 मार्च 1997) को सुबह 10:00 बजे हुई थी।
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यहूदी धर्म के प्रवर्तक माने जाने वाले हज़रत मूसा जी को उनके अल्लाह ने, उनसे अधिक ज्ञानी 'अल-खिज़्र' के पास जाकर इल्म (ज्ञान) प्राप्त करने का निर्देश दिया था। इसका उल्लेख पवित्र कुरआन शरीफ़ के सूरा काफ 18 आयत 60 से 82 में है और वह अल-खिज़्र जो हजरत
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परमेश्वर कबीर जी ने धर्मदास जी को बताया कि मैंने विष्णु जी के वाहन पक्षीराज गरूड़ जी को उपदेश दिया, उनको सृष्टि रचना सुनाई।
परमेश्वर कबीर जी ने गरुड़ जी को भी सत्य ज्ञान का उपदेश देकर शरण में लिया था।
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सामान्यतः स्वामी रामानंद जी को कबीर जी का गुरु माना जाता है, परंतु मर्यादा बनाए रखने के लिए कबीर जी ने गुरु-शिष्य की लीला की थी।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, स्वामी रामानंद जी ने स्वयं कबीर साहेब की समर्थता को स्वीकार किया था।
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कबीर परमात्मा, संत दादू दयाल जी से सन् 1551 में आमेर (राजस्थान) में मिले थे। इस पर दादू जी ने कहा है:
जिन मोकुं निज नाम दिया, सोइ सतगुरु हमार।
दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजन हार।। - कबीरपंथी शब्दावली, पृष्ठ 233
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धर्मदास जी को कबीर परमात्मा पहली बार मथुरा में 'जिंदा महात्मा' के रूप में मिले थे। इसके बाद वे अनेक बार विभिन्न रूपों में मिले, उन्हें सतलोक का साक्षात्कार कराया और पुनः संसार में भेजा।
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गुरु नानक देव जी को कबीर परमात्मा बेई नदी के किनारे 'जिंदा महात्मा' के रूप में मिले थे और उन्हें सचखंड (सतलोक) का साक्षात्कार कराया था।
गुरु नानक जी ने कबीर प्रभु के विषय में कहा:
यक अर्ज गुफतम पेश तो दर गोश कुन करतार।
हक्का कबीर करीम तू बेएब परवरदिगार।। 🤲🏻
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कबीर परमेश्वर, सतगुरु के रूप में विश्नोई पंथ के संस्थापक संत जम्भेश्वर जी को समराथल (राजस्थान) में मिले थे। जम्भसागर (शब्द 90) में उल्लेख है:
जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण।
सूर (सूर्य) आसण गुरू आसण संमरा थले।
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तैमूर लंग को कबीर परमात्मा ने 'जिंदा महात्मा' के रूप में तब दर्शन दिए थे, जब वह भेड़-बकरियाँ चरा रहा था। संत गरीबदास जी ने कहा है: गरीब, तैमूरलंग को तालिब मिले, एक रोटी की चाहय। जिंदा रूप कबीर धरहीं, सुनी तैमूरलंग की माय।।
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श्री रामचंद्र द्वारा रावण वध के बाद माता सीता की अयोध्या वापसी पर जब एक घटनाक्रम के दौरान माता सीता जी ने हनुमान जी का अपमान किया तो हनुमान जी वापिस जंगल में चले गए। तब दुखी हनुमान जी को मुनिंदर रूप में आए परमात्मा कबीर जी ने मोक्ष की राह दिखाई।