वो जो ख्वाब था मेरे जहन में,
न मैं कह सका न मैं लिख सका,
की ज़बान मिली तो कटी हुई ,
की क़लम मिला तो बीका हुआ॥
आपके बिना पहली ईद है अल्लाह पाक कभी दोबारा ऐसा मौक़ा ना लाए ॥
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाए कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आए कैसे ,
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तो तय हो कि घर बचाए कैसे ,
फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाए कैसे ॥