@Indic_Muslim असम में जो 19 में से 18 सीट कांग्रेस जीती मुस्लिमों के वोट से जीती , सही है लेकिन कांग्रेस को हिंदू वोटों का नुक़सान भी मुस्लिम परस्ती की वजह से होता है! मुस्लिम वोट देना बंद करेंगे तो कोई और दे देगा।कांग्रेस पर एहसान बंद कर दो।
यह स्वतंत्र भारद्वाज है
शान से बता रहा है कि स्टूडेंट प्रोटेस्ट में प्रदर्शनकारी के पिता पर हमला किया - उन्हें 60 टांके लगे और वह मौत के कगार पर थे
307 के अंतर्गत हाफ मर्डर का मामला बनता था. लेकिन वह जेल नहीं गया - रात भर बेख़ौफ़ घूमता रहा
कपिल मिश्रा के एक फोन के बाद उसे राहत मिल गई
आगे बताता है कि कपिल मिश्रा, चिराग पासवान ही नहीं मोदी जी भी ���सके “बड़े भाई” हैं, सबका समर्थन प्राप्त है
न्यायपालिका सही रास्ते पे है ब्यूरोक्रेसी में सरकार के प्रति ग़ुस्सा है राष्ट्रवाद का चूरन कोई भी चाटने को तैयार नहीं है सरकार के प्रति लोगो में विश्वास बचा ही नहीं है । राहुल गांधी एकमात्र नेता है जो पूरे भारत में लोकप्रिय है |
आ रहे है राहुल ❤️✊🔥
So what exactly is the BJP new It cell even doing!?? Congress ka ek volunteer team @official_aicvc ne pani pila rakha hey sanghiyon ko, woh bhi Yamuna wala . 🔥🔥🔥
प्रिय @RahulGandhi जी ,
आज हम जिस कुरुक्षेत्र में खड़े हैं उस कुरुक्षेत्र के आप अर्जुन हैं, जिसके रथ की बागडोर श्रीकृष्ण के हाथ में होनी चाहिए, लेकिन आज आपके रथ के चारों ओर अनेक शल्य दिखाई देते हैं, ऐसे शल्य, जो सारथी होने का ��्रम पैदा करते हैं, पर जिनकी दिशा आपके रथ को विजय की ओर नहीं, संशय और आत्ममुग्धता की ओर ले जाती है।
महाभारत में शल्य कौरवों की ओर से कर्ण का सारथी बना था। वह स्वयं महारथी था, किंतु सारथी बनकर उसने कर्ण का मनोबल तोड़ने को ही अपना सबसे बड़ा अस्त्र बना लिया। युद्धभूमि में वह बार-बार अर्जुन की प्रशंसा करता और कर्ण को उसकी सीमाओं का बोध कराता रहा। कर्ण के हाथों में धनुष था, लेकिन उसके मन में संशय बोया जा रहा था। अंततः जिस क्षण उसका रथ धरती में धँसा, युद्ध का निर्णायक क्षण सामने था।
लेकिन, याद रखिये राहुल, आप कर्ण नहीं हैं। आप अर्जुन हैं।
और अर्जुन होने का अर्थ केवल गांडीव उठाना भर नहीं है। अर्जुन होने का अर्थ है, युद्धभूमि के बीच खड़े होकर यह पहचानना कि शत्रु आपका सबसे बड़ा संकट नहीं है , सबसे बड़ा अवरोध विरोधी नहीं, वह आवाज है जो आपके योद्धा को लगातार कमजोर कर रही है।
आज आप जिस कुरुक्षेत्र में खड़े हैं आपके सामने प्रश्न मुँह बाए खड़ा है कि
क्या आप अपने रथ की दिशा स्वयं पहचानेंगे?
क्या आप अपने बाण को स्वयं लक्ष्य तक ले जा पायेंगे?
क्या आपको रथियों की जरूरत नहीं पड़ेगी जो लक्ष्यों को साध सकें ?
इसलिए राहुल आजके कुरुक्षेत्र में , नई राजनीति है, नई महाभारत है और नए शल्य हैं। कुछ बाहर से आए हुए ह��ं, कुछ आपके अपने शिविर में बैठे हैं। इस कुरुक्षेत्र में आपका प्रतिपक्ष सिर्फ विरोधी दल नहीं है। आपका सामना आपके अपने शाल्यों से भी है, जो आत्ममुग्धता से इतने लबरेज हैं कि उन्हें नैतिकता से बढती दूरी का अंदाजा नहीं लग पा रहा है और जिसका परिणाम यह है कि जनता से उनका संवाद लगातार टूट रहा है । जो यह जान नहीं पा रहे हैं कि वो बारात के घोड़े बनते जा रहे हैं और गौरतलब रहे कि बारात के घोड़ों से युद्ध नह���ं लड़े जाते। इनका लक्ष्य एक ही है आपको आपके वास्तविक लक्ष्य से भटका देना, आपके बाण को लक्ष्य तक न पहुँचने देना ।
यही वह क्षण है जब आपको कृष्ण और शल्य में अंतर करना होगा।
जैसा कि कृष्ण कहते हैं “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
इस कुरुक्षेत्र में विजय पाने के लिए सबसे जरूरी है कि बाण को लक्ष्य तक पहुँचाने की क्षमता बलवान हो ।
इसलिए अपने रथ की क्षमता पहचानिए।
इसलिए अब आपको केवल रथ का सारथी ही नहीं, रथ की संरचना भी बदलनी होगी।
आपको अपने संगठन को उठाना है।
अपने नेताओं से कहिए कि वे अपने कुर्तों पर सलवटें लेकर लौटें।
जिस नेता के कुर्ते पर गाँव की धूल नहीं है, जिसकी चप्पल ने खेत की मेड़ नहीं देखी, जिसने मजदूर के घर की चौखट पर बैठकर चाय नहीं पी, जिसने किसान की फसल का हाल नहीं पूछा, जिसने दलित बस्ती में रात नहीं बिताई, जिसने बेरोजगार युवक की आँखों में झाँककर उसका भविष्य नहीं पूछा वह अपने क्षेत्र की रा��नीति की रपट कैसे लिख सकता है? वह शल्य है कृष्ण नहीं ।
इसलिए दिल्ली से रिपोर्ट मत माँगिए।
गाँव से रिपोर्ट माँगिए।
हर सांसद से कहिए अपने क्षेत्र में जाए।
हर विधायक से कहिए अपने क्षेत्र में जाए।
हर प्रदेश पदाधिकारी से कहिए अपने संगठन के सबसे आखिरी कार्यकर्ता तक जाइए।
और लौटकर बताये
कितने किसान कर्ज में हैं?
कितने नौजवान काम खोज रहे हैं?
कितने स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं?
कितने अस्पत���लों में डॉक्टर नहीं हैं?
किस बस्ती में पानी नहीं पहुँच रहा?
कहाँ जाति के कारण किसी का रास्ता रुका हुआ है?
कहाँ महिला स्वयं सहायता समूह टूट रहे हैं?
कहाँ मजदूर शहर से लौटकर फिर गाँव में बेरोजगार बैठा है?
किस बूथ पर आपका कार्यकर्ता अकेला है?
किस बूथ पर विपक्ष का संगठन आपसे मजबूत है?
और सबसे कठिन प्रश्न
आपके अपने संगठन का नेता अपने क्षेत्र में जनता से कितना जुड़ा हुआ है?
मैं तो चाहता हूँ क�� संगठन की अगली बैठक दिल्ली में मत रखिये । किसी गाँव में रखिये ।
पहले नेताओं को उनके क्षेत्रों में भेजिए।
उन्हें कहिए चार दिन अपने क्षेत्र में रहकर आ��ए। फिर बैठक होगी।
और लौटते समय उनके पास कोई चमकदार PowerPoint न हो।
उनके पास लोगों की आवाज हो।
किसान की शिकायत हो।
महिला की कहानी हो।
युवक का सवाल हो।
मजदूर की पीड़ा हो।
कार्यकर्ता की नाराज़गी हो।
और यदि संभव हो तो कुर्ते पर कुछ सलवटें भी हों।
क्योंकि जिस संगठन के नेता अपने कपड़ों की सिलवटों से भी डरने लगें, वे जनता की जिंदगी की सिलवटों को कैसे समझेंगे?
गांधी की राजनीति की असली शक्ति यही थ��� कि वह राजनीति को जनता के जीवन में ले जाते थे।
उनका सत्याग्रह किसी वातानुकूलित सम्मेलन कक्ष में पैदा नहीं हुआ था।
चंपारण की मिट्टी में पैदा हुआ था।
खेड़ा के खेतों में पैदा हुआ था।
अहमदाबाद के मिल-मजदूरों के बीच पैदा हुआ था।
और दांडी की सड़क पर नमक के साथ इतिहास में उतर गया था।
प्रदेश अध्यक्ष से केवल यह मत पूछिए कि कितनी बैठकें हुईं।
पूछिए कितने गाँव गए?
हर सांसद से यह मत पूछिए कि कितन��� प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं।
पूछिए कितने किसानों के घर ग��?
हर युवा नेता से यह मत पूछिए कि सोशल मीडिया पर कितने लाख views आए।
पूछिए कितने युवाओं के बीच बैठकर उनकी बेरोजगारी सुनी?
हर महिला नेता से यह मत पूछिए कि कितने भाषण हुए।
पूछिए कितनी महिलाओं के साथ बैठकर उनके वास्तविक प्रश्न लिखे?
और हर संगठन पदाधिकारी से सबसे कठिन प्रश्न पूछिए
आपके क्षेत्र का सबसे गरीब व्यक्ति आपको जानता है या नहीं?
यही आपकी नई राजनीतिक कसौटी होनी चाहिए।
आज आपके आसपास जो ���ारथी बने घूम रहे हैं
वे आपका मनोबल नहीं तोड़ेंगे।
वे आपको अतिरिक्त आत्मविश्वास देंगे।
वे आपको बताएँगे कि जनता आपके साथ है।
वे बताएँगे कि आपका भाषण ऐतिहासिक था।
वे बताएँगे कि आपका ट्वीट वायरल हो गया।
वे बताएँगे कि आपकी लोकप्रियता बढ़ रही है।
लेकिन कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ गाँव में आपका बूथ कमेटी अध्यक्ष छह महीने से पार्टी के संपर्क में नहीं है।
कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ विधानसभा में आपका कार्यकर्ता संगठन छोड़ चुका है।
कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ जिले में पार्टी का नेता जनता से कट चुका है।
यही वह शल्य है जिससे आपको सबसे सावधान रहना है।
आज यह जरूरी है कि आप कांग्रेस को फिर से जनता के बीच ले जाएँ इसलिए राहुल ��ी ,
यदि कांग्रेस को पुनर्जीवित करना है तो केवल चेहरों को बदलना पर्याप्त नहीं होगा।
राजनीतिक संस्कृति बदलनी होगी।
संगठन में पद से अधिक परिश्रम का मूल्य होना चाहिए।
दिल्ली से निकटता से अधिक गाँव से निकटता का मूल्य होना चाहिए।
टीवी पर दिखाई देने से अधिक जनता के बीच दिखाई देने का मूल्य होना चाहिए।
और संगठन में ऊपर जाने की सीढ़ी यह नहीं होनी चाहिए कि कौन किसके कितना निकट है।
सीढ़ी यह होन��� चाहिए
किसने कितने लोगों के बीच काम किया?
किसने कितने संघर्ष खड़े किए?
किसने कितने कार्यकर्ताओं को तैयार किया?
किसने अपने क्षेत्र की कितनी वास्तविक समस्याएँ पार्टी के सामने रखीं?
यही गाँधी के स्वराज का जंतर-मंतर है ।
कांग्रेस को जीत का आश्वासन देने वाले शल्यों की आवश्यकता नहीं है।
उसे काम करने वाले अर्जुनों की आवश्यकता है।
ऐसे अर्जुन जो अपने-अपने क्षेत्र में उतरें।
ऐसे अर्जुन जिनके कुर्तों पर सलवटें हों।
ऐसे अर्जुन जिनके जूतों पर गाँव की मिट्टी हो।
ऐसे अर्जुन जिनकी डायरी में जनता के नाम और समस्याएँ लिखी हों।
और ऐसे अर्जुन जो दिल्ली लौटकर यह कह सकें
यह मेरे क्षेत्र की वास्तविक स्थिति है। अब बताइए, हम क्या करेंगे?
राहुल जी ,
आपसे केवल अपने रथ की बागडोर सँभालने की अपेक्षा नहीं है।
आपको अपने रथ में बैठे लोगों को बदलना है।
जो सारथी दिशा नहीं जानते, उन्हें हटाइए।
जो केवल स्तुति करते हैं, उनसे सावधान रहिए।
जो सत्य बताते हैं, उन्हें अपने पास रखिए।
और संगठन को उन लोगों के हाथ में दीजिए जो जनता के बीच से आते हैं और जनता के बीच वापस जाने को तैयार हैं।
क्योंकि भारत दिल्ली की सड़कों पर नहीं, भारत उन पगडंडियों पर मिलता है जहाँ नेता का कुर्ता सलवटदार ह���ता है और जनता की आवाज साफ।
इसलिए, हे राहुल
अपने नेताओं से कहिए अपने क्षेत्रों में जाइए। कुर्तों पर सलवटें लाइए। गाँवों की धूल लेकर लौटिए। जनता की रपट लेकर लौटिए। और फिर कांग्रेस की अगली दिशा तय कीजिए।
तभी आपका संगठन सचमुच बदलेगा।
तभी आपका रथ सही दिशा में चलेगा।
अब युद्ध केवल सत्ता से नहीं है। युद्ध संगठन की जड़ता से भी है।
और इस युद्ध में पहला सुधार आपको अपने ही रथ से शुरू करना होगा।
गुड़गांव - गुरुग्राम भईया वास्ते गुना हुइयाँ!
कांग्रेस के समय जो गुड़गांव 'Home to Global Fortune 500 Companies' के रूप में जाना जाता था, आज वो 'Work from Home City' बनकर रह गया है।
आज दिल्ली में प्रेसवार्ता...
@SanjaySDutt@BhupinderShooda@raonarenderinc@INCHaryana