बहुत ख़ूबसूरत हो
बहरे-रमल: (2122 / 2122 / 2122 / 212)
चाँद की मानिंद तुम भी इस ज़मीं की ओट में
इक सुहानी सी हक़ीक़त हो, बहुत ख़ूबसूरत हो
शायरी में अब तुम्हारा ही असर रहने लगा
तुम 'ऋषि' के दिल की राहत हो, बहुत ख़ूबसूरत हो
ऋषित भण्डारी
#Rishi#ऋषि#सरस#बज़्म#कविता_संगम
@ahmakladki दिलों में प्रेम का अंकुर सींच कर चली जाऊँगी..
बन कर यादें तुम्हारी आँखों में ठहर जाऊँगी...
शेर पूरा करने की हिमाकत के लिए माफ़ी चाहता हूँ 🙏🏼
@raghavwadhwa What you were missing is now discovered by you. And you are absolutely right about the missing story. Cpl of years back I used to tell about laurus lab for genetic treatment when stock was rock bottom,
आज विश्व पोहा दिवस है। हमारे कवि अगर पोहा की महिमा का बखान करते हुए कविता लिखते तो क्या लिखते?
विश्व पोहा दिवस पर
पोहा और जलेबी लाने,
निकला है खानेवाला,
कौन से ठेले पर जा पहुंचे,
सोच रहा भोला-भाला,
हर ठेले पर सजा है पोहा,
और जलेबी रसवाली,
जो भी खाये साथ में दोनों,
भूलेगा वो मधुशाला
-बच्चन जी
कवि सम्मेलन मंच था, शहर रहा भोपाल,
तीन दिनो से जगे थे, आँख हो रही लाल,
आँख हो रही लाल साथ में पेट था ख़ाली,
भक्षण को कुछ मिलेगा, काका भए सवाली
आयोजक ने तुरत-फुरत पोहा मँगवाया,
खाकर यह महसूस हुआ नवजीवन पाया।
-काका हाथरसी
हृदय किया पोहा खाने को,
उदर के भीतर ज्वार उठा रे,
कर स्मरण पोहा इंदौरी,
यह कवि हृदय पुकार उठा रे,
पाँव ले चले रसोईघर तक,
इस कवि की अभिलाषा छोटी,
उषाकाल या सूर्य अस्त हो,
खायें पोहा भूलें रोटी।
-दिनकर जी
कोई ककड़ी चबाता है, कोई घर 'आम' लाता है,
मगर जो क्रांतिकारी है, वही बस पोहा खाता है,
जलेबी क्या कहे इसबात में क्या आनी-जानी है,
आज भी पोहा के पीछे सकल दिल्ली दीवानी है।
-कविवर कुमार विश्वास
सखि वे पोहा खाकर जाते,
पोहे ऊपर सेव छिड़कते
मूँग फली मिलवाते,
सखि वे पोहा खाकर जाते
पोहा सज़ा प्लेट में धरती,
धनिया काट गार्निशिंग करती
अलग प्लेट में सजी जलेबी,
देख-देख सुख पाते
सखि वे पोहा खाकर जाते।
-मैथिली शरण गुप्त
पोहा को अब मिले प्रसिद्धि, मध्य प्रदेश ने ठानी थी,
पोहा अमृत, इस नियम को अपनी मंज़िल पानी थी,
और किसी को अच्छा कहना, निश्चित ही नादानी थी,
संग जलेबी की मिठास भी, सबने ही पहचानी थी,
महाराष्ट्र की सारी जनता भी इसकी दीवानी थी,
इंदौरी हरबोलों में यह कविता जानी मानी थी,
पोहा सत्य जगत मिथ्या है, ऐसी गढ़ी कहानी थी!
-सुभद्रा कुमारी चौहान
‘तेजस्वी’ पोहा खाते हैं, नाम गोत्र बतला कर,
नाम पिता का लेते हैं वे, दलितों के घर खाकर,
तेज प्रताप भले कुछ सोचें, समझें जो हो ठीक,
पर तेजस्वी ध्यान न देते, काटें हर दिन लीक!
-रामधारी सिंह ‘बिल्डर’
कौन खाता है पोहा
वही जो लगाता है गुलाब
ग़ुलाबी है जिसकी सुबह
ग़रीब के चावल से
पोहा माय फ़ुट
-जयराम 'विद्रोही'