मनुष्य सोचता है कि बस सुख ही सुख मिल जाए,
कोई काम न हो, कोई कष्ट न हो,
जो चाहें वही मिल जाए – यही तो स्वर्ग है।
परंतु सत्य कुछ और ही है...
जिस सुख में चलना नहीं,
जिस सुख में अपने नहीं,
जिस सुख में प्रेम नहीं,
और जिस सुख में प्रभु का स्मरण नही ं –
वह सुख भी धीरे-धीरे नरक ब
मनुष्य सोचता है कि बस सुख ही सुख मिल जाए,
कोई काम न हो, कोई कष्ट न हो,
जो चाहें वही मिल जाए – यही तो स्वर्ग है।
परंतु सत्य कुछ और ही है...
जिस सुख में चलना नहीं,
जिस सुख में अपने नहीं,
जिस सुख में प्रेम नहीं,
और जिस सुख में प्रभु का स्मरण नही ं –
वह सुख भी धीरे-धीरे नरक ब