Ye mere gav (mavaiya) bighapur unnao ka ghar ke pass se nali road pr last 5 sal se road pr hi bh rhi hai maine kai bar jan sunwai app pr online complaint ki pr har bar yhi sunte hai ki budget nahi hai yha aas pas logo ke ghar hai aur unko majboor ho kr isi ke upr se aana jana hai
“क्या चुनाव आयोग हमें या आपको उस घर में ले चलेगा जिसका पता 00000 लिखा है?
मजाक बना दिया है पूरे देश का!”
-पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस. वाई. कुरैशी
#VoteChori#BiharElections2025
खेसारी लाल की बड़ी बेटी को मोदी समर्थक खुलेआम रे*प की धमकी दे रहे है लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई
मोदी को यादवों के गाने से दिक्कत है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं हो रही है @BiharPoliceCGRC https://t.co/vYlkScZXME
बिहार में एनडीए की ‘ईमानदार’ जीत भी कम ख़तरनाक नहीं!
(पंकज श्रीवास्तव)
मान लिया जाये कि बिहार में चुनाव पूरी ईमानदारी से हुए हैं और एनडीए की धमाकेदार जीत 'जनता की इच्छा' का ही परिणाम है तो यह तस्वीर ‘वोट-चोरी’ से ज़्यादा ख़तरनाक है। यह लोकतंत्र के मध्ययुगीन राजतंत्र और नागरिक के ‘प्रजा’ में बदलने का संकेत है जहाँ सरकार और जनता का रिश्ता ‘दाता’ और ‘पाता’ में ढल चुका है। जनता मालिक होने के बजाय एक ऐसे दास में तब्दील हो चुकी है जिसमें स्वतंत्र होने की कोई इच्छा भी नहीं बची है। वह दो वक़्त की रोटी देने वालों के लिए इतनी आभारी है कि उसके लिए जान दे सकती हैं वोट क्या चीज़ है।
नोएडा में हमारी गृह-सहायिका बिहार से हैं। छठ पर भी बिहार गयी थीं लेकिन लौट आयीं। कोई इरादा नहीं था कि वोट देने के लिए बिहार जाना है। लेकिन अचानक उन्होंने ऐलान कर दिया कि वोट देने जाना होगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि उन्हें सपरिवार बिहार ले जाने और वापस लाने की ‘व्यवस्था’ किसी और ने की थी। और वह ‘और’ कोई और नहीं बीजेपी का तंत्र था यह उनकी बात से स्पष्ट हो गया। उन्होंने बताया कि बिहार जाकर वोट नहीं दिया तो सरकारी फ़ायदे वाले लिस्ट से नाम कट जाएगा। पाँच किलो राशन हो या कुछ और। यहाँ ये बात भी समझनी होगी कि नोएडा में रहने के बावजूद उनके गाँव में उनके नाम का राशन घर के दूसरे लोग ले लेते हैं। उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया कि वोट बीजेपी को ही देना है नहीं तो बाक़ी एक लाख नब्बे हज़ार डूब जाएँगे। उन्हें बताया गया था कि दस हज़ार रुपये पहली किस्त है। मिलना दो लाख है। पर इसके लिए एनडीए की सरकार बनना ज़रूरी है!
गृह-सहायिका किसी जाति की हैं, कभी पूछा नहीं। वैसे भी खेत-मेड़ के लिए लाठियाँ जाति भाइयों में भी कम नहीं चलतीं। दो लाख की लटकती गाजर अगर मुँह में आ रही हो तो लटकाने वाले की जाति क्या देखना। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि महिलाओं को मिलने वाला यह पैसा सिर्फ़ महिलाओं का नहीं है। यह परिवार के लिए आशा है जिसमें पुरुष भी शामिल हैं। अगर अमुक सरकार बनने से सीधे दो लाख रुपये घर आने की उम्मीद हो तो फिर पुरुष भी प्रभावित होगा। यह करोड़ों वोटरों को अपने पाले में बाँधने का पुख़्ता इंतज़ाम था। रिश्वत और ब्लैकमेल का यह खुला खेल चुनाव आयोग की उन आँखों में चुभता भी कैसे, जिन पर मोदी नाम का चश्मा चढ़ा हुआ है।
नीतीश कुमार की निश्चित ही यह उपलब्धि है कि वे बीस साल से मुख्यमंत्री हैं और कोई बड़ी अड़चन नहीं हुई तो चौथाई सदी भी इस पद पर रहते हुए पूरा कर सकते हैं। जो लोग फिर से ‘नीतेशै कुमार' आने की अपनी भविष्यवाणी सही होने पर ख़ुश हैं, उन्हें यह भी तो बताना चाहिए कि नीतीश कुमार ने बिहार को इन बीस सालों में कहाँ से कहाँ पहुँचाया? आज भी बिहार सबसे ग़रीब प्रदेश क्यों हैं? शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल क्यों है? औद्योगीकरण चार कदम भी आगे क्यों नहीं बढ़ा जबकि ग्यारह साल से डबल इंजन की सरकार है? हाल ही में क़रीब बीस पुल टूटे और बीजेपी नेता आर.के.सिंह ही बिजली विभाग में 62 हज़ार करोड़ के घोटाले का आरोप लगा रहे हैं जो बताता है कि भ्रष्टाचार किस स्तर पर है।
बिहार की यह तस्वीर बताती है कि नीतीश कुमार केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दिन काटते हैं। पिछले दिनों केरल से ख़बर आयी थी कि वहाँ ‘चरम ग़रीबी’ का उन्मूलन कर दिया गया है। पूरी तरह साक्षर प्रदेश है और स्वास्थ्य व्यवस्था में भी अव्वल है। लगातार इस प्रदेश ने मानव विकास सूचकांक में प्रगति की है। शिशु मृत्यु दर के मामले में तो केरल, अमेरिका से भी बेहतर है। जबकि केरल में आमतौर पर पाँच साल में सरकार बदल जाती है। हालांकि पिछली बार ऐसा नहीं हुआ था। ऐसे में नीतीश कुमार के इतने लंबे कार्यकाल के हासिल पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए।
बिहार का जो हाल है, उसमें विपक्ष को मौक़ा मिलना स्वाभाविक होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तेजस्वी या महा-गठबंधन के प्रयासों और कार्यशैली से शिकायत रखने वालों को नहीं भूलना चाहिए कि ‘जन सुराज’ तीन साल से पलायन और रोज़गार जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर गाँव-गाँव जा रहा था लेकिन प्रशांत किशोर की सारी मेहनत का नतीजा भी शून्य रहा। इसका मतलब है कि मसला कहीं ज़्यादा गहरा है जिस पर विचार किया जाना चाहिए।
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बिहार में भाजपा के दोनों उपमुख्यमंत्री को एक-जितना वोट कैसे मिल गया…?
लगता है कहीं मशीन में एक ही डाटा कॉपी-पेस्ट तो नहीं करवा दिया गया, साहब!
सिर्फ 72 वोट का फर्क…
अरे कम से कम थोड़ा बहुत तो मिलावट कर देते,
इतनी भी जल्दबाज़ी क्यों भाई?
ऐसे करेंगे तो जनता को शक नहीं—
पक्का यकीन हो जाएगा!
जनता सब देख रही है —
इसका जवाब यूपी में पीडीए अपनी सरकार बनाकर देगा !!
#वोट_चोर 🔥
फोटो में दिखने वाले व्यक्ति का नाम गगन प्रताप है।
पेशे से तो एक अध्यापक है लेकिन उनके अंदर मोदीजी के लिए इतना प्यार करने की बिहार चुनाव हारने के बाद ये
खेसारी लाल का मजा ले रहे हैं।
यही गगन प्रताप जब बच्चों के साथ धरना दे रहे तो जब बीजेपी सरकार ने डंडे बरसाए तो कह रहे थे कि विपक्ष हमारा साथ नहीं दे रहा है।
इन्हीं हरकतों के वजह से विपक्ष नहीं साथ देता है।
चुनाव में हमेशा हार जीत लगी रहती है लेकिन एक अध्यापक होके ऐसे बात करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
अबे गगन, खेसारी लाल ने ये कभी नहीं कहा की वो ब्रह्म के लिखे लेख को मिटा सकते है बल्कि उन्होंने निरहुआ की बात को बताते हुए कहा था की वो ब्रह्म के लिखे लेख को मिटाने की बात करते है
तू खाली सफल हुए बच्चों को अपना छात्र बताकर उन्हें बेवकूफ बनाता है बाक़ी तुझे कुछ नहीं आता
राजनीति में जीत हार चलती रहती है, मगर घर में आवाज उठाने वाली बेटी के उपर चप्पल उठाया जाए, इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता.
बिहार को समझ आ गया था कि महिला और बेटियों की इज़्ज़त कौन सी पार्टी करती है, इसीलिये एकतरफ़ा वोट NDA को चला गया. जब घर की बेटी के साथ ऐसा करेंगे तो बाहर की बेटियों का क्या हाल करेंगे मौक़ा मिलने पर.
#बेहद_शर्मनाक #घटिया_हरकत
@RohiniAcharya2
मैथिली ठाकुर ने नाम बदलकर सीता नगर नाम करने को कहा था, वो 9450 मतों से आगे चल रही है।
खेसारी लाल यादव ने नौकरी,शिक्षा, स्वास्थ्य, की बात की थी, वो 2592 मतों से पीछे चल रहे हैं
तेजस्वी यादव ने रोज़गार और पलायन रोकने की बात कही थी, वो 3230 मतों से पीछे चल रहे हैं।
इसलिए कहा जाता हैं कि बिहार की राजनीति बहुत जटिल हैं।