कल ही कुछ मित्र आए हुए थे जो बता रहे थे कि सरकार किसी एक दवा पर जब MRP तय करती है, तो कंपनियाँ उसी दवाई में एक अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में कोई दूसरा सॉल्ट जोड़ कर नए नाम से लाती है। उनके पिता को कैंसर था जिसकी एक टैबलेट 6000 की थी, बाहर उन्होंने ₹200 में खरीदी। वही असर।
सरकार को चुनावी फंड मिलता है। उन्हें पता सब कुछ है, पर वो इंडस्ट्री को इतनी छूट देते हैं और रेगुलेशन ऐसा बनाते हैं कि पब्लिक की आँखों में धूल झोंकी जा सके। ये मोदी सरकार में भी हो रहा है, कॉन्ग्रेस में भी होता रहा है। तंत्र चलता रहता है, पैसा देते रहिए नियम आपके हिसाब से बदलते रहेंगे।
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