I'm supporting the #SaveSoil movement because it is important to leave behind soils capable of producing nutritious food for our children and sustaining all other life on this planet. Learn more on https://t.co/69vNw3yunA & share this with everyone. https://t.co/hUU43H5DY3
Through an anecdote and an illustration, Sadhguru explores the dangers of waiting for proof before acting on the impending global soil extinction crisis.
#SaveSoil
When soil is healthy, water stays and farmers' incomes multiply.
At a Delhi press conference, Cauvery Calling showcased a proven approach to addressing two of agriculture's biggest challenges: water security and farmer prosperity.
Healthy, carbon-rich soil acts like a sponge—absorbing rainfall, recharging groundwater, and supporting crops through changing climate conditions. Tree-based agriculture helps make this possible while creating additional income streams for farmers.
The results speak for themselves.
Valluvan, a farmer from Tamil Nadu and UN FAO Soil Health Guardian 2024, shared how he transformed his farm through tree-based agriculture—growing his income from ₹30,000 to ₹3,00,000 per acre per year while significantly improving soil health.
🌱 13.4 crore trees planted
🤝 2.5 lakh farmers engaged
🌍 A scalable model that brings ecology and economy together
#CauveryCalling #SaveSoil
In one of the cricket's memorable moments, @imVkohli chased down an almost impossible target, brought to life by @bhogleharsha’s iconic commentary.
28 needed from 8 balls.
Most people would say the game is over.
But until the last ball is bowled, the game isn't over!
Today, soil faces a different challenge. Scientists recommend a minimum of 3–6% soil organic matter (depending on regional conditions), yet many farmlands around the world fall below this level.
Healthy soil is one of our greatest allies against climate change, biodiversity loss, water scarcity, and declining food quality.
This World Environment Day, let's back the ground beneath our feet.
We can still win this.
#SaveSoil #WorldEnvironmentDay #NowForClimate
Addressed 4,000 young professionals at the Sima-land group in Yekaterinburg.
Also planted a tree in the heart of the city, joined by three Members of Parliament and several artists.
A century as far as Ramsar sites are concerned!
Glad that the Jai Prakash Narayan Bird Sanctuary (Surha Tal) in Ballia, Uttar Pradesh has been designated as India’s 100th Ramsar site. This wetland is rich in avifaunal biodiversity, attracting several migratory and resident birds.
India’s unwavering commitment to protecting our natural surroundings and wetlands in particular is clearly reflected in this feat.
Over the years, efforts to conserve and rejuvenate wetlands have been strengthened through greater community participation, science, innovation and awareness initiatives. These endeavours are helping preserve biodiversity, secure ecological balance and create a greener future for coming generations.
We do not just live on this Planet – we are the Planet. If you do not understand this today, you will understand it when you are buried. #SadhguruQuotes
प्रकृति और पर्यावरण मानव जीवन के केवल बाह्य आधार नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्��ि के प्राणतत्त्व हैं। यह चराचर जगत् पंचमहाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के दिव्य संतुलन पर आधारित है। जब यह संतुलन सुरक्षित रहता है, तब जीवन में शान्ति, समृद्धि, स्वास्थ्य और सौन्दर्य का विस्तार होता है; किन्तु जब मनुष्य स्वार्थ, अति-भोग और असंयमवश प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण करता है, तब यही प्रकृति विक्षुब्ध होकर आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और असंतुलन के माध्यम से मानवता को च���तावनी देती है।
भारतीय संस्कृति ने आदिकाल से प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे मातृस्वरूप मानकर वंदित एवं पूजित किया है। हमारे वेदों ने पृथ्वी को माता कहा, नदियों को देवत्व प्रदान किया, वृ��्षों को जीवनदाता माना और पर्वतों को दिव्यता का प्रतीक बताया। अथर्ववेद का यह उद्घोष - “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” मानव और प्रकृति के मधुर एवं आत्मीय सम्बन्ध का सनातन घोष है। भारतीय ऋषियों ने सदा यह शिक्षा दी कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और समन्वय ही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
आज मानव सभ्यता विज्ञान और तकनीक की अभूतपूर्व उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचकर भी गम्भीर पर��यावरणीय संकटों से घिरी हुई है। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, वन क्षेत्र निरन्तर सिमट रहे हैं, वायु विषाक्त होती जा रही है, जलस्रोत सूख रहे हैं तथा ऋतुचक्र का संतुलन विचलित हो रहा है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के असंतुलन का भी प्रतीक है। जब मनुष्य प्रकृति से दूर होता है, तब वह अन्ततः अपने ही अस्तित्व और मूल्यों से भी दूर हो जाता है।
जल जीवन का मूलाधार है। प्रत्येक नदी, सरोवर, झरना और जलधारा केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धमनियाँ हैं। जल के बिना न कृषि सम्भव है, न संस्कृति और न ही सभ्यता। यदि जल प्रदूषित होगा तो जीवन भी रोग, संकट और असुरक्षा से भर जाएगा। अतः जल-संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों की स्वच्छता और जल के प्रति संवेदनशील जीवनशैली केवल विकल्प नहीं, बल्कि वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। हमें जल को ���ेवल संसाधन नहीं, ईश्वर के अमृततुल्य प्रसाद के रूप में देखना होगा।
इसी प्रकार वृक्ष पृथ्वी के प्राण हैं। वे केवल पर्यावरण की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि जीवन का आधार निर्मित करते हैं। वृक्ष वायु को शुद्ध करते हैं, वर्षा को संतुलित रखते हैं, जैव-विविधता का संरक्षण करते हैं तथा असंख्य जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं। एक वृक्ष केवल लकड़ी नहीं देता; वह छाया, प्राणवायु, शीतलता, फल, औषधि और ��ीवन का संरक्षण प्रदान करता है। इसलिए वृक्षारोपण केवल एक सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक एवं आध्यात्मिक जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष एक वृक्ष लगाकर उसका संरक्षण करने का संकल्प ले, तो पृथ्वी पुनः हरित, पावन और संतुलित बन सकती है।
पर्यावरण-संरक्षण केवल सरकारों, संस्थाओं अथवा संगठनों का दायित्व नहीं है। यह प्रत्येक जागरूक नागरिक का नैति���, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है। जल का संयमित उपयोग, प्लास्टिक का त्याग, स्वच्छता का पालन, ऊर्जा-संरक्षण, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ये छोटे-छोटे प्रयास मिलकर एक बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। प्रकृति की रक्षा किसी एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि जीवन की सतत् साधना है।
वास्तव में प्रकृति और मानव का सम्बन्ध केवल आवश्यकता का नहीं, आत्मीयता का है। प्रकृति ��े सान्निध्य में मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल होता है, उसकी संवेदनाएँ जागृत होती हैं और उसका जीवन संतुलित बनता है। वन की हरियाली, नदी की क��-कल ध्वनि, पर्वतों की स्थिरता और आकाश की विराटता मनुष्य को ईश्वर की निकटता का अनुभव कराती है। प्रकृति का सौन्दर्य केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है।
आज "विश्व पर्यावरण दिवस" के पावन अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे और पर्यावरण-संरक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे। स्मरण रहे ! यदि प्रकृति सुरक्षित है तो मानवता सुरक्षि��� है; यदि पर्यावरण संतुलित है तो जीवन समृद्ध है। प्रकृति का संरक्षण ही भविष्य का संरक्षण है, पर्यावरण की सेवा ही मानवता की सच्ची सेवा है, और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा सर्वोच्च उत्तरदायित्व है।
"विश्व पर्यावरण दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ।
@byadavbjp
@KVSinghMPGonda
@SubodhUniyal1
@pushkardhami
#विश्व_पर्यावरण_दिवस #savenature #saveearth #savewater #WorldEnvironmentDay #AvdheshanandG_Quotes
।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थय��क्ता।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्।।९।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त-दर्शन के अत्यन्त गूढ़ और मौलिक सिद्धान्तों में से एक को उद्घाटित करता है। यहाँ केवल सृष्टि-विज्ञान अथवा जीव-जगत्-ईश्वर के परस्पर सम्बन्ध का वर्णन नहीं है, अपितु सम्पूर्ण बन्धन और मोक्ष के रहस्य को अत्यन्त संक्षिप्त व प्रभावशाली भाष��� में प्रस्तुत किया गया है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में यह मंत्र साधक को उस बिन्दु तक ले जाता है, जहाँ से संसार का समस्त वैविध्य एक अद्वितीय ��्रह्म-सत्य में विलीन होता हुआ दिखाई देता है।
मंत्र में “अज” अर्थात् “अजन्मा” शब्द का प्रयोग हुआ है। यहाँ तीन तत्त्वों का संकेत है- ईश्वर, जीव और प्रकृति (माया)। ईश्वर “ज्ञ” तथा “ईश” है; वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, समस्त जगत् का नियन्ता एवं उपादान-अधिष्ठान कारण है। इसके विपरीत जीव “अज्ञ” तथा “अनीश” है; उसका ज्ञान सीमित है, शक्ति सीमित है, और वह अपने को देह, मन तथा बुद्धि के साथ अभिन्न मानकर सुख-द��ःख का भोक्ता बन जाता है। तीसरा तत्त्व है “अजा” अर्थात् प्रकृति या माया, जो भोक्ता, भोग्य और भोग- इन तीनों के व्यवहार को प्रकट करती है तथा सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत् की रचना का माध्यम बनती है।
किन्तु उपनिषद् का उद्देश्य केवल इन तीन तत्त्वों का पृथक्-पृथक् निरूपण करना नहीं है। उसका वास्तविक प्रयोजन साधक को यह दिखाना है कि ये तीनों भेद अन्तिम सत्य नहीं हैं। आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि जीव का अज्ञान ��र ईश्वर का सर्वज्ञत्व भी व्यवहारिक स्तर की उपाधियाँ हैं; परमार्थतः आत्मा न तो सीमित है, न कर्ता है, न भोक्ता है। आत्मा अनन्त है, विश्वरूप है, सर्वव्यापक है और सर्वथा अकर्ता है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा बन्धन केवल अविद्या-जनित अध्यास हैं, जो देह-मन-बुद्धि के साथ तादात्म्य के कारण प्रतीत होते हैं।
जब तक जीव अपने को शरीर, इन्द्रिय, मन और अहंकार के साथ जोड़कर देखता है, तब तक वह स्वयं को कर्मों का कर���ता और उनके फल का भोक्ता मानता है। यही बन्धन का मूल कारण है। परन्तु जब विवेक के प्रकाश में यह अनुभव होता है कि शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, किन्तु इन सब परिवर्तनों का साक्षी चैतन्य कभी नहीं बदलता, तब आत्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होने लगता है। वही साक्षी आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न कर्म करती है और न कर्मफल का भोग करती है।
मंत्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद है - “त्रयं यदा विन��दते ब्रह्म एतत्”। इसका आशय केवल इतना नहीं कि साधक ईश्वर, जीव और प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर ले; वरन् यह है कि वह इन तीनों के व्यवहारगत भेद को समझकर उनके एकमात्र अधिष्ठान ब्रह्म का साक्षात्कार करे। जब यह ज्ञात हो जाता है कि ईश्वर, जीव और जगत् - ये सभी उपाधि-जनित भिन्नताएँ हैं तथा इनके आधार में एक ही अद्वितीय चैतन्य सत्ता विद्यमान है, तब द्वैत की समस्त संरचना ढह जाती है।
यही सत्य सम्पूर्ण प्रस्थानत्रयी की समवेत वाणी है। उपनिषद् अविद्या से उत्पन्न जीव-भाव का निरूपण कर ब्रह्म की साक्षी-सत्ता का प्रतिपादन करते हैं। भगवद्गीता बार-बार यह शिक्षा देती है कि “इन्द्रियाँ अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं”; आत्मा न कर्ता है न भोक्ता। ब्रह्मसूत्र इस निष्कर्ष को दार्शनिक दृढ़ता प्रदान करते हुए सिद्ध करते हैं कि जीव और ब्रह्म का भेद वास्तविक नहीं, अपितु उपाधि-जनित है। इस प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र के अद्वैत-सिद्धान्त का एक सशक्त सूत्ररूप बन जाता है।
इसके अन्य मंत्रों में भी य��ी उद्घोष सुनाई देता है कि ब्रह्म अपनी मायाशक्ति के माध्यम से जगत् की प्रतीति कराता है और वही माया जीव को नाम-रूप के जाल में उलझा देती है। अतः मुक्ति का साधन किसी बाह्य उपलब्धि में नहीं, अपितु विवेक, वैराग्य और आत्मचिन्तन द्वारा उस अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप की पहचान में निहित है, जो सदा से प्राप्त है, किन्तु अज्ञानवश अप्राप्त प्रतीत होता है।
अतः इस मंत्र का साधक के लिए अत्यन्त व्यवहारिक सन्देश है- प्रथम, प्रकृति के समस्त गुण, विकार और परिवर्तनशील प्रपंच को अनात्म समझना; द्वितीय, सीमित जीवभाव, अहंकार तथा भोक्तृत्व के अध्यास को पहचानना; और तृतीय, अपने वास्तविक स्वरूप को अनन्त, अकर्ता, असंग और सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में दृढ़तापूर्वक स्थापित करना। जब यह बोध परिपक्व होता है, तब बन्धन की समस्त ग्रन्थियाँ स्वतः शिथिल हो जाती हैं और साधक ब्रह्मनिष्ठा की उस अवस्था को प्राप्त होता है, जहाँ न भय शेष रहता है, न शोक, न मोह।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
Healthy soil supports the food we grow, helps regulate water cycles, stores carbon, and sustains countless forms of life. Revitalizing soil is not just about agriculture—it is about securing a healthier future for people and the planet.
#SaveSoil#WorldEnvironmentDay #NowForClimate
Forests are not a resource — they are the source of life.
370 million years ago, Earth was a harsher world of rock, floods, high atmospheric carbon, and unstable climate.
Then forests emerged.
They transformed the planet — building soil, drawing carbon from the atmosphere, releasing oxygen, regulating rainfall, and helping create a world capable of sustaining complex life.
Even today, forests continue to regulate the systems human civilization depends on.
They influence climate, sustain biodiversity, stabilize rainfall, and move moisture across continents through invisible “Flying Rivers.”
But in just a few centuries, humanity has removed nearly half of the world’s forests.
What took millions of years to stabilize can begin unraveling within decades.
Protecting forests is not simply about conservation.
It is an act of self-preservation.
#WorldEnvironmentDay #ConsciousPlanet #SaveSoil #NowForClimate
Namaskara & Congratulations Hon’ble Chief Minister of Karnataka Shri D. K. Shivakumar avare. Our very best wishes to the new administration in fulfilling the aspirations of all citizens of the glorious state of Karnataka. -Sg
@DKShivakumar
It is in the lap of Mahakala, or the ultimate stillness, that all creation has manifested. The significance of being human is that we are competent to experience and become one with that lap.
।। "श्वेताश्वतर" - उपनिषद् ।।
संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च
व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृ-
भावाज् ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।८।।
("श्वेताश्वतर" - उपनिषद् - प्रथमोऽध्यायः)
यह मंत्र संसार-तत्त्व का अत्यंत सूक्ष्म “समन्वय” दिखाकर भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-सिद्धान्त की ओर संकेत करता है। “क्षर-अक्षर” तथा “व्यक्त-अव्यक्त” - ये दोनों युग्म समस्त अनुभव-जगत् की सीमा और आधार को प्रकट करते हैं। क्षर/व्यक्त वह है जो परिवर्तनशील, दृश्य, नाम-रूपात्मक है; अक्षर/अव्यक्त वह सूक्ष्म मूल-प्रकृति/बीज-रूप कारण है, जो प्रत्यक्ष नहीं, पर जिससे व्यक्त जगत् प्रकट होता है। भगव���न आदि शंकर की दृष्टि में यह सब व्यवहार-क्षेत्र है, सत्य का अन्तिम स्वरूप नहीं, बल्कि उपाधि-सम्बद्ध प्रपंच।
मंत्र कहता है - “विश्वम् ईशः भरते”- ईश्वर इस संयुक्त तत्त्व-समूह को धारण करता है। शाङ्कर-भाष्य के अनु��ूप, ईश्वर कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि ब्रह्म ही मायोपाधि-सहित-नियन्ता, धारक, सर्वशक्तिमान के रूप में प्रतीत होता है। वह “धारण” करते हुए भी वस्तुतः अस्पृष्ट है - जैसे सूर्य प्रकाश देता है पर कर्मफलों में लिप्त नहीं होता। यही प्रस्थानत्रयी का स्वर है: जगत् का नियमन ईश्वराधीन है, पर ब्रह्म का पारमार्थिक स्वरूप अक्रिय, निरुपाधि है।
इसके बाद मंत्र जीव की स्थिति स्पष्ट करता है - “अनीश आत्मा”। जीव “���नीश” इसलिए नहीं कि आत्मा में शक्ति नहीं, बल्कि इसलिए कि वह अज्ञान से आच्छन्न होकर अपने स्वराज्य (स्वरूप-स्वतंत्रता) को भूल बैठता है। यह भूल “भोक्तृभाव” है- “मैं भोगता हूँ, मैं दु:खी-सुखी हूँ”- यह धारणा ही बन्धन का मूल है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य इसे अध्यास कहते हैं : देह-मन के धर्मों का आत्मा पर आरोप, और आत्मा के चैतन्य का देह-मन पर आरोप; फलतः कर्तृत्व-भोक्तृत्व का बन्धन दृढ़ हो जाता है।
उपाय मंत्र स्वयं बताता है - “देवं ज्ञात्वा मुच्यते सर्वपाशैः।” “देव” का ज्ञान यहाँ केवल बाह्य आस्था नहीं; शंकर के अनुसार यह ऐसा तत्त्व-ज्ञान है, जो भेद-बुद्धि का क्षय करता है। आरम्भ में ईश्वर-उपासना चित्त-शुद्धि देती है; और शुद्ध अन्तःकरण में जब उपनिषद्-वाक्य का बोध उदित होता है, तब साधक जान लेता है कि जिस ईश्वर को ‘देव’ ���हकर जाना-वही ब्रह्म है, और वही मेरा आत्मस्वरूप है। तब “भोक्तृभाव” ढह जाता है, और साथ ही “सर्वपाश”- कर्म, वासना, भय, जन्म-मरण, सब छूट जाते हैं।
निष्कर्ष : यह मंत्र भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य की शिक्षा को संक्षेप में स्थिर करता है - जगत् (क्षर/व्यक्त) और उसका कारण-बीज (अव्यक्त/अक्षर) ईश्वर के अधिष्ठान में चलते हैं; जीव अज्ञानजन्य भोक्तृभाव से बँधता है; और देव-तत्त्व का यथार्थ ज्ञान (जो अंततः आत्��-ब्रह्म-अभेद-ब��ध है) उसे सर्वपाशों से मुक्त कर देता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#भगवत्पादाचार्य
#AvdheshanandG_Quotes
ऋषिकेश की पुण्यभूमि, भागीरथी माँ गंगा के पावन तट तथा भारतीय अध्यात्म की अनादि परम्परा के दिव्य आलोक से आलोकित परमार्थ निकेतन के परमा���्यक्ष, स्वामी चिदानंद सरस्वती “मुनिजी” महाराज का व्यक्तित्व आधुनिक युग में भारतीय सनातन संस्कृति के जीवंत प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित है। उनका जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं, अपितु सेवा, साधना, संस्कार, समर्पण और सार्वभौम सद्भावना का एक विराट आध्यात्मिक अभियान है। वे भारतीय अध्यात्म की उस महान परम्परा के तेजस्वी संवाहक हैं, जिसने सदैव समस्त मानवता को प्रेम, करुणा, शांति और आत्मबोध का संदेश दिया है।
पूज्य स्वामी चिदानंद जी महाराज ने अपने तप, त्याग, पुरुषार्थ और करुणा से न केवल भारत, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति की दिव्य चेतना को प्रतिष्ठित किया है। उनका जीवन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की ऋषि-दृष्टि का सजीव स्वरूप है। उन्होंने अध्यात्म को केवल मंदिरों तक सीमित न रखकर उसे मानव-कल्याण, पर्यावरण-संरक्षण, सेवा, शिक्षा, संस्कार और वैश्विक शांति से जोड़ा। गंगा-स्वच्छता अभियान, जल-संरक्षण, वृक्षारोपण, योग-जागरण, नारी-सशक्तिकरण तथा पर्यावरण-चेतना के क्षेत्र में उनका योगदान अद्वितीय और प्रेरणादायी है।
परमार्थ निकेतन के माध्यम से उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश दिया कि अध्यात्म केवल ध्यान या उपासना नहीं, बल्कि प्रकृति, मानवता और समस्त सृष्टि के प्रति संवेदनशीलता का नाम है। उनके मार्गदर्शन में परमार्थ निकेतन आज विश्व-स्तर पर अध्यात्म, योग, सेवा और संस्कृति का एक महान केंद्र बन चुका है, जहाँ भारत की ऋषि-परम्परा का दिव्य प्रकाश विश्व के कोने-कोने तक पहुँच रहा है। उनके स्नेहिल व्यक्तित्व में संत की करुणा, ऋषि की दूरदृष्टि, ग��रु की आत्मीयता और राष्ट्रऋषि की व्यापक चेतना का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है।
परमपूज्य वंदनीय स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज के पावन ७५वें अवतरण दिवस का भव्य एवं गरिमामय आयोजन परम पूज्य श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर, अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज की अध्यक्षता में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक गरिमा के मध्य सम्पन्न हुआ। इस दिव्य आयोजन का संचालन विश्वविख्यात पतंजलि योगपीठ के संस्थापक योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने किया।
इस पावन अवसर पर वात्सल्यमूर्ति, सनातन धर्म-संस्कृति की सबल संरक्षिका पूज्या दीदी माँ ऋतम्भरा जी, गीता मनीषी महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज, संत शिरोमणि परम पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द जी महाराज, पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के प्रमुख आदरणीय पूज्य श्री स्वामी रवीन्द्���पुरी जी महाराज, गोसेवा एवं लोकसेवा के अप्रतिम प्रकल्पों के प्र���रणास्रोत परम पूज्य स्वामी ईश्वरदास जी महाराज, वन्दनीया माँ साध्वी भगवती जी, लोकप्रसिद्ध रससिद्ध कथावाचक पूज्य मुरलीधर जी सहित भारत तथा अनेक देशों से पधारी गणमान्य विभूतियाँ उपस्थित रहीं। समस्त वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार, संत-सान्निध्य, आध्यात्मिक ऊर्जा और गंगा-तट की दिव्य पवित्रता से अनुप्राणित हो उठा।
विशेष रूप से यह अवतरण-दिवस समारोह पर्यावरण-संरक्षण और प्रकृति-जागरण के निमित्त ��मर्पित रहा। यह अत्यंत सार्थक एवं प्रेरणादायी तथ्य है कि पूज्य संत चिदानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने जन्मोत्सव को भी लोकमंगल और प्रकृति-संरक्षण की भावना से जोड़ दिया। इस अवसर पर उपस्थित संतों, विद्वानों एवं गणमान्य अतिथियों ने जल-संरक्षण, गंगा-स्वच्छता, पर्यावरण-चेतना तथा मानवता के भविष्य को सुरक्षित रखने के विषय में प्रभावी उद्बोधन दिए। परमार्थ निकेतन घाट पर आयोजित इस भव्य समारोह में अ���ेक देशों से आए श्रद्धालुओं, योग-साधकों एवं भक्तों ने सहभागिता कर इसे वैश्विक आध्यात्मिक एकता का अनुपम उत्सव बना दिया।
आज जब विश्व भौतिकता, अशांति, पर्यावरण संकट और सांस्कृतिक विघटन की चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे समय में पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन सम्पूर्ण मानवता के लिए आशा, संतुलन, संवेदना और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य संदेश है।उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा अध्यात्म वही है, जो मानवता को जोड़ता है, प्रकृति की रक्षा करता है और जीवन को करुणा, सेवा तथा आत्मबोध ���े आलोकित करता है।
उनके पावन ७५वें जन्म-अवतरण दिवस पर हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि पूज्य मुनि जी का जीवन दीर्घ, स्वस्थ, यशस्वी और लोकमंगलकारी बना रहे। उनका दिव्य सान्निध्य, प्रेरणादायी मार्गदर्शन और सेवा-यात्रा युगों-युगों तक समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती रहे; यही मंगलकामना ! शुभम् भवतु !!
@PujyaSwamiji @yogrishiramdev #AvdheshanandG_Quotes