लखनऊ में तवे से वार कर पति की हत्या 2013 में हुई थी लव मैरिज
आशीष और तपस्या ने वर्ष 2013 में प्रेम विवाह किया था। शादी के बाद से ही दोनों के बीच विवाद की स्थिति बनी रहती थी। बेटी के जन्म के बाद दोनों के बीच तनाव और बढ़ गया।
लखनऊ में कड़ाके की ठंड में मुख्यमंत्री आवास के गेट पर एक दुबला-पतला आदमी, साधारण कुरता-पायजामा पहने, पैरों में पुरानी हवाई चप्पल डाले पहुंचा।
सुरक्षाकर्मियों ने रोका, नाम पूछा।
“मुलायम से मिलने आया हूँ… पुराना दोस्त हूँ... विश्राम सिंह नाम है।”
सुरक्षाकर्मियों ने ऊपर से नीचे तक देखा चप्पल, साधारण कपड़े, झिझकता चेहरा। अंदर सूचना भेजी गई।
कुछ ही पलों बाद अचानक भीतर हलचल हुई। स्टाफ़ भागता हुआ निकला। मुख्य दरवाज़ा खुला और खुद नेताजी तेज़ क़दमों से बाहर आते दिखाई दिए।
जैसे ही उनकी नज़र विश्राम सिंह पर पड़ी…
“अरे विश्राम… तुम?”
नेताजी ने जैसे ही उनके पैरों पर नजर डाली, वे ठिठक गए।
“विश्राम… इतनी ठंड में तुम हवाई चप्पल पहनकर आए हो?”
विश्राम मुस्कराए, ठिठुरती आवाज़ में बोले,
“सोचा तुमसे मिल आऊँ… बहुत दिन हो गए थे।”
और फिर दोस्त का हाथ थाम लिया वही हाथ, जिसके साथ कभी कॉलेज की सीढ़ियाँ चढ़ी थीं, करहल की गलियों में नौकरी की थी, और जवानी में समाजवाद की बातें की थीं।
“अंदर चलो…”
पुरानी बातें चलने लगीं कॉलेज के दिन, आंदोलन, संघर्ष, करहल की नौकरी, इटावा की गलियाँ। हँसी भी हुई, आँखें भी नम हुईं।
फिर विश्राम सिंह उठे, हाथ जोड़कर बोले,
“चलता हूं… बस तुम्हें देखना था।”
नेताजी ने कहा,
“ठीक है… फिर मिलेंगे।”
विश्राम लौट आए
शाम ढल रही थी। इटावा की ओर जाने वाली बस धूल उड़ाती हुई गाँव के बाहर रुकी। विश्राम नीचे उतरे।
घर पहुँचे तो अजीब-सा माहौल था।
खाकी वर्दी वाले सिपाही, सफ़ेद कमीज़ में अफ़सर, हाथ में फाइलें। पड़ोसी छतों से झाँक रहे थे। बच्चों की फुसफुसाहट गली में तैर रही थी।
विश्राम ठिठक गए।
तभी एक अफ़सर आगे बढ़ा।
“आप ही विश्राम सिंह जी हैं?”
“हाँ… मैं ही हूँ।”
अफ़सर ने मुस्कराकर कहा,
“लखनऊ से आदेश आया है।”
“आपको दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री बनाया गया है।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
विश्राम कुर्सी पर बैठ गए। हाथ काँप रहे थे।
उन्होंने सिर झुका लिया बस इतनी आवाज निकली
“मुलायम…”
देश की राजनीति में ऐसे नेता बहुत कम हुए हैं, जिनसे आम लोग खुद को सहज जोड़ पाते हों। जिनके जाने के बाद लोग उनके किए एहसानों को याद कर भावुक हो उठें। ऐसे ही नेताओं में परम श्रद्धेय नेताजी मुलायम सिंह यादव का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है।
वे सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुँचे नेता नहीं थे, बल्कि उन लोगों को आगे बढ़ाने वाले व्यक्ति थे जिनके पास चुनाव लड़ने की हैसियत तक नहीं होती थी। विधायक, सांसद, मंत्री, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष ऐसे न जाने कितने नाम हैं जिनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत नेताजी के भरोसे से हुई। उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई जिला हो, जहां उनसे जुड़ी कोई कहानी न मिलती हो।
विश्राम सिंह बताते हैं कि उन्होंने और नेताजी ने साथ पढ़ाई की थी। जब वे स्नातक कर रहे थे, उसी समय नेताजी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय होने लगे थे। बाद में दोनों ने करहल में साथ नौकरी भी की। राजनीति में उतरने के बाद नेताजी लगातार आगे बढ़ते गए, लेकिन पुराने साथियों से रिश्ता कभी टूटा नहीं।
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नवंबर 2004| मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव राजधानी लखनऊ में बढ़ते अपराध से बेहद गुस्से में थे। हजरतगंज के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में नेताजी की आवाज गूंज रही थी। बाहर खड़ी लाल बत्ती वाली गाड़ियों से ज़्यादा गर्म माहौल अंदर था। नेताजी के सवाल सीधे थे राजधानी में अपराध क्यों नहीं रुक रहा, व्यापारी डर के मारे पलायन क्यों कर रहे हैं।
डीजीपी ने बताया कि “सर, पिछले तीन महीनों में रंगदारी के 27 केस, जमीन कब्ज़े के 19, और हत्या के 6 मामले सीधे एक ही गैंग से जुड़े हैं।”
नेताजी ने कहा “नाम?”
डीजीपी ने कहा,
“रमेश यादव… उर्फ़ कालिया।”
नेताजी ने कहा,
“इतने केसों के बाद भी वह खुले घूम रहा है?”
डीजीपी ने बताया कि पुलिस कोशिश कर रही है, मगर रमेश कालिया हाथ नहीं आ रहा। कालिया हर छापे से पहले निकल जाता है और उसका नेटवर्क बहुत तेज़ है।
नेताजी ने साफ शब्दों में कहा कि मुझे बहाने नहीं चाहिए, नतीजे चाहिए। आधे-अधूरे ऑपरेशन नहीं चलेंगे, पूरा तंत्र तोड़ना होगा। राजधानी में समानांतर सत्ता नहीं चलेगी। ऐसा अफसर चाहिए जो राजधानी को वापस ले आए। ऐसा जो फाइलें नहीं, जमीन पर काम करे।”
डीजीपी ने कहा,
“सर… एक नाम है।”
“कौन?”
“IPS नवनीत सिकेरा।”
नवनीत सिकेरा, एक तेज़तर्रार और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट IPS अधिकारी, मुज्जफरनगर में बड़े अपराधियों के खिलाफ़ अभियान चला चुके थे और उन्हें अपराध नियंत्रण में सख्ती के लिए जाना जाता था।
नाम सुना है “कहाँ पोस्टेड हैं?”
“अभी बाहर, सर। लेकिन रिकॉर्ड मजबूत है।”
नेताजी ने तुरंत कहा,
“लखनऊ बुलाइए।”
उस समय राजधानी लखनऊ में “माफिया राज के नए मॉडल” जैसी स्थिति बन चुकी थी, जहाँ कुख्यात अपराधी रमेश यादव उर्फ़ रमेश कालिया का नाम सुनते ही ठेकेदार, व्यापारी और आम लोग डर जाते थे। कलिया की पहचान डॉन के तौर पर थी उसके आतंक से खुद बड़े बाहुबली डरते थे, और वह 50 से अधिक संगीन मामलों से पहले ही वांछित हो चुका था। उसके खिलाफ़ एफआईआर और मुकदमे दर्ज थे, लेकिन वह पुलिस को चुनौती देता घूमता था। वह हर छापे से पहले ठिकाना बदल देता। पुलिस पहुँचती, तो वह निकल चुका होता। राजधानी में यह चर्चा फैल चुकी थी कालिया को पकड़ना आसान नहीं।
दो दिन बाद नए एसएसपी नवनीत सिकेरा कुर्सी पर बैठे थे। राजधानी पहुँचते ही उन्होंने सबसे पहले पुराने केस डायरी निकलवाईं। किन थानों में मामले दर्ज हैं, कौन से गवाह पलटे, किन इलाकों में कालिया के आदमी सक्रिय हैं सबका नक्शा तैयार कराया। उन्होंने STF, सर्विलांस यूनिट और लोकल थानों की संयुक्त टीम बनाई। मुखबिरों को फिर से सक्रिय किया, मोबाइल कॉल की निगरानी बढ़ाई और उन लोगों की लिस्ट तैयार हुई जिनसे कालिया सीधे पैसे वसूलता था।
सिकेरा जानते थे कि सीधे छापा मारना बेकार होगा। कालिया को तब पकड़ा जा सकता है जब वह खुद शिकार लेने निकले। वही मौका फरवरी 2005 में मिला।
10 फरवरी 2005 को प्रॉपर्टी डीलर इम्तियाज के फोन की घंटी बजी। उधर से रौबदार आवाज आई पांच लाख तैयार रखो, नहीं तो अंजाम बुरा होगा। इम्तियाज के हाथ कांप गए। अगले ही दिन वह एसएसपी ऑफिस पहुंचा। सिकेरा ने उसे शांत किया, समझाया कि पुलिस उसके साथ है और हर कदम उनकी निगरानी में होगा।
सिकेरा ने योजना बनाई 12 फरवरी 2005 को पूरे ऑपरेशन को छलावरण में ढाला गया। उसी गली में “शादी” का माहौल रचा गया बैंड-बाजा, लाइटें, फूलों से सजी गाड़ियाँ। बाहर से देखने वाले को लगता कि कोई सामान्य बारात निकल रही है, जबकि हकीकत में हर तीसरा आदमी पुलिसवाला था। किसी ने फोटोग्राफर का रूप ले रखा था, कोई रिश्तेदार बनकर खड़ा था। आगे चल रही कार में दूल्हे की तरह बैठे अफसर के जूतों में हथियार थे और कान में वायरलेस।
इम्तियाज अंदर पहुंचा तो कालिया ने सीधा पूछा रुपये लाया?
इम्तियाज हकलाया भइया… साठ हजार ही हो पाए, बाकी दो-चार दिन में।
कालिया भड़क उठा यहीं जिंदा गाड़ दूंगा पूरे रुपए लेकर आ। विशुनाथ ने उसे इशारे से बाहर भेजा। इम्तियाज बाहर आया, बारात गली में धीरे-धीरे मुड़ चुकी थी। उसने हल्का सा सिर झुकाया संकेत साफ था।
चारों तरफ़ से गली बंद कर दी गई। लाउडस्पीकर से घोषणा की कि पुलिस ने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है, हथियार डाल दो। जवाब में खिड़की से पहली गोली चली। कुछ ही सेकेंड में पूरी गली में गोलियों की गूंज फैल गई। करीब बीस-पच्चीस मिनट तक फायरिंग होती रही। दीवारों में सुराख़ बन गए, खिड़कियों के शीशे टूट गए। दो पुलिसकर्मी घायल हुए लेकिन पीछे नहीं हटे।
आख़िर गोलियाँ धीमी पड़ीं। पुलिस अंदर घुसी। फर्श पर खोखे बिखरे थे, कमरे में बारूद की गंध भरी थी और वहीं पड़ा था वह शख़्स जिसने राजधानी को सालों डराया था रमेश कालिया। उसके दो साथी भी ढेर हो चुके थे। ऑपरेशन खत्म हो चुका था।
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Mini Marathon – First Time in Karhal! 🇮🇳
Running not just for fitness… but for freedom, pride, and a hero’s legacy!
Join us in honoring Shaheed Ramadhar Singh Yadav Ji through this historic run!
📍 Nagla Tank, Karhal, Mainpuri
📆 Date: 10 SEP 2025 https://t.co/vWMP7y3Bf4
आपका व्यक्तित्व और कार्यशैली युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यदि आप इस अवसर पर हमारे मुख्य अतिथि बनकर पधारें और युवाओं का मार्गदर्शन करें तो यह हमारे लिए अत्यंत सौभाग्य और गर्व की बात होगी।
@navsekera माननीय श्री नवनीत सिकेरा जी (IPS साहब),
सादर प्रणाम 🙏
करहल में आगामी "चौथी मिनी मैराथन – शहीद स्मृति दौड़" का आयोजन हम क्षेत्रवासियों द्वारा शहीद श्री रामाधार सिंह जी की पुण्य स्मृति में किया जा रहा है।
📅 तिथि: 10/09/2025
📍 स्थान: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे सर्विस रोड
समाजवादी पार्टी की मैनपुरी से सांसद श्रीमती डिम्पल यादव ने मैनपुरी के करहल विधानसभा क्षेत्र के नगला टांक गांव में आयोजित शहीद सम्मान समारोह में अमर शहीद रामाधार सिंह यादव की प्रतिमा का अनावरण किया।
श्रीमती डिम्पल यादव ने शहीद की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित किया। इस अवसर पर 2000 मीटर और छात्राओं की 400 मीटर दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। श्रीमती डिम्पल यादव ने विजेताओं को पुरस्कार वितरित किया।
इस अवसर पर शहीद रामाधार सिंह के परिजनों ने कहा कि शहीद जवानों के परिवार स्व0 मुलायम सिंह यादव जी के ऋणी रहेंगे। क्योंकि उनके फैसले से ही शहीदों का पार्थिव शरीर घर तक आता है।
कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं के साथ समाजवादी सैनिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष कर्नल शरद सरन और अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।
(राजेन्द्र चौधरी)
मुख्य प्रवक्ता
मैनपुरी ब्रेकिंग (करहल):शहीद रामाधार सिंह यादव के नाम स्वीकृत गेट पर लगी दूसरे शहीद की पटिया, सैनिकों में गहरा रोष
करहल क्षेत्र के ग्राम नगला टांक से एक बेहद भावुक और संवेदनशील मामला सामने आया है, जहाँ देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीद रामाधार सिंह यादव के नाम से स्वीकृत गेट पर अचानक रात्रि में दूसरे शहीद के नाम की पटिया लगा दी गई। यह घटना न केवल शहीदों के सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली है, बल्कि क्षेत्रीय सैनिक समुदाय की भावनाओं को भी गहरा आघात दे गई है।
सैनिक प्रकोष्ठ के पदाधिकारी इस मामले को लेकर काफी आक्रोशित हैं। उन्होंने मैनपुरी मुख्यालय पहुंचकर जिलाधिकारी @DmMainpuri से मुलाकात की और पूरे प्रकरण की शिकायत करते हुए ज्ञापन सौंपा। उनकी मांग है कि जिस गेट को शहीद रामाधार सिंह यादव के नाम पर स्वीकृति मिली थी, उस पर किसी और शहीद की पटिया लगाना न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि शहीदों के प्रति सम्मान की भावना पर भी सवाल खड़ा करता है।
सैनिकों ने यह भी मांग रखी है कि दूसरे शहीद के नाम से एक नई जगह स्वीकृत की जाए, जहाँ उनकी पटिया उचित सम्मान के साथ लगाई जा सके।
सैनिक प्रेम विलास सिंह ने इस घटना पर अपनी गहरी नाराज़गी जताते हुए कहा, "शहीदों का सम्मान राजनीति या लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। हर शहीद हमारे लिए गर्व का प्रतीक है, लेकिन उनके नामों के साथ ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।"
सैनिक प्रकोष्ठ ने जिलाधिकारी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और उचित कार्यवाही की मांग की है। फिलहाल प्रशासन की ओर से जांच के आदेश दिए गए हैं और ग्रामीण भी इस मुद्दे पर एकजुट होकर न्याय की मांग कर रहे हैं।
पूरा मामला थाना करहल के अंतर्गत ग्राम नगला टांक का है, जहाँ अब यह मामला सम्मान, व्यवस्था और भावनाओं से जुड़कर संवेदनशील होता जा रहा है।
@adgpi
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मैनपुरी में शहीद रामाधार सिंह यादव के नाम से स्वीकृत गेट पर रात के समय दूसरे शहीद के नाम की पट्टी चस्पा कर दी गई, जिससे स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। सैनिक प्रकोष्ठ ने इसे अनुचित और शहीद के सम्मान के खिलाफ बताया है।
मैनपुरी
🪖 शहीद के नाम स्वीकृत गेट पर दूसरी पट्टी लगाई
📝 स्वीकृत गेट पर दूसरे शहीद की लगाई गई पट्टी
⚖️ सैनिक प्रकोष्ठ ने दूसरे पक्ष की DM से की शिकायत
🎖️ शहीद रामाधार सिंह यादव के नाम से हुई थी स्वीकृति
🌙 गेट पर रात में दूसरे शहीद के नाम की पट्टी लगाई
🏠 थाना करहल के ग्राम नगला टांक का मामला
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अमर शहीद रामाधार सिंह यादव के स्मृति द्वार पर विवाद निर्माण में भ्रष्टाचार और गुणवत्ता की शिकायत से जुड़ा है। शहीद की पत्नी कुशमा देवी ने आरोप लगाया कि घटिया सामग्री इस्तेमाल हुई और ठेकेदार ने दूसरे शहीद का नाम भी अंकित कर दिया, जो अपमानजनक है। ठेकेदार ने आरोप खारिज किए, कहा कि सामग्री उत्तम थी और नाम पट्टिकाएं जिला पंचायत से मिलीं। परिवार ने DM से कार्रवाई मांगी है।
नमस्ते! अमर शहीद रामाधार सिंह यादव जी भारतीय सेना के वीर सैनिक थे, जिनका जन्म मैनपुरी (उ.प्र.) के नगला टांक, करहल में हुआ। 10 सितंबर 1995 को कुपवाड़ा (जम्मू-कश्मीर) में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी स्मृति में स्मृति द्वार और दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। उनका बलिदान राष्ट्र को प्रेरित करता हैनमस्ते! अमर शहीद रामाधार सिंह यादव जी भारतीय सेना के वीर सैनिक थे, जिनका जन्म मैनपुरी (उ.प्र.) के नगला टांक, करहल में हुआ। 10 सितंबर 1995 को कुपवाड़ा (जम्मू-कश्मीर) में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी स्मृति में स्मृति द्वार और दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। उनका बलिदान राष्ट्र को प्रेरित करता हैनमस्ते! अमर शहीद रामाधार सिंह यादव जी भारतीय सेना के वीर सैनिक थे, जिनका जन्म मैनपुरी (उ.प्र.) के नगला टांक, करहल में हुआ। 10 सितंबर 1995 को कुपवाड़ा (जम्मू-कश्मीर) में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी स्मृति में स्मृति द्वार और दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। उनका बलिदान राष्ट्र को प्रेरित करता है।