पिछले 20 वर्षों में बैंकिंग बदल गयी है पांच दिन बैंकिंग करने से कोई नुकसान नहीं होने वाला नेट बैंकिंग और मोबाइल बैकिंग से सब कुछ 365 दिन चल रहा है बैंक कर्मचारी रोज 13 से 15 घटे काम करता है #Bank
बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कारण पूछने पर यही लगा कि जिस बैंक की नौकरी को अच्छी नौकरी में गिना जाता था, उसकी हालत बदतर हो गई है। टारगेट के नाम पर कर्मचारी देर शाम तक रोके जाते हैं, छुट्टी नहीं दी जाती है,
तनाव रोज़ का हिस्सा है। काम करने की जगह भी अच्छी नहीं है। ऐसा लगता है कि बैंकर को सज़ा दी जा रही है कि उन्होंने बैंक की नौकरी क्यों की। लोगों ने बताया कि अत्यधिक तनाव के कारण बीमारियाँ होने लगी हैं।
एक बैंकर ने यह भी बताया-
सुबह 8:00 बजे घर से निकलने वाला बैंकर रात को 8:00 या 9:00 बजे के बाद ही घर लौट पाता है, क्योंकि एनपीए (NPA - गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) को रोकने का भारी दबाव होता है। हर खाते की मंथली ईएमआई (EMI) होती है, और यदि वह 90 दिनों तक जमा न हो, तो खाता एनपीए हो जाता है। ऐसे में रीजनल ऑफिस से ब्रांच हेड पर दबाव आता है कि यह खाता आज किसी भी हाल में एनपीए नहीं होना चाहिए। पहले केवल महीने की आखिरी तारीख को एनपीए रोकने का दबाव होता था, लेकिन अब हर सिंगल डे (प्रतिदिन) यह प्रेशर रहता है।
रात के 9:00 बज रहे होते हैं और रीजनल ऑफिस से फोन आता है कि "किसी भी तरह इस खाते को बचाइए।" थक-हारकर जब ब्रांच हेड को लगता है कि उसे अब घर जाना चाहिए, तो वह अपनी जेब से 2,000, 4,000 या 10,000 रुपये तक की ईएमआई खुद भर देता है। बाद में ग्राहक वह पैसा लौटाता नहीं है, जिससे बैंक मैनेजर के अपने पैसे डूब जाते हैं।
बैंक में दिनभर कई तरह के मानसिक तनाव झेलने पड़ते हैं। आपको रिकवरी के लिए फील्ड में निकलना होता है। वहाँ कोई ग्राहक आपको ब्लैकमेल करता है कि "मेरे घर मत आओ, नहीं तो मैं पैसा जमा नहीं करूँगा, सिर्फ़ फोन पर बात करो।" फोन पर बात करने के दौरान ग्राहक कभी-कभी अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। उस तनाव में यदि मैनेजर के मुँह से गलती से भी कोई गलत बात निकल गई, तो ग्राहक उसकी कॉल रिकॉर्डिंग करके ब्लैकमेल करने लगता है।
कृपया बैंकर की बात सुनें । कोई रास्ता निकालें।
लगभग 50 बीघा सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त करवाया गया साथ ही 5 बीघा में बसाई जा रही अवैध कॉलोनी को किया गया प्रारंभिक स्तर पर ध्वस्त
अतिक्रमण, अवैध निर्माण एवं अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध जेडीए की कार्रवाई निरंतर जारी
#JDA#Enforcement#AntiEncroachment
एक पूर्व मुख्यमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार रहे हैं…उनके पास मनगढ़ंत कहानियाँ और उसकी बुनियाद पर पूर्वाग्रहों का भंडार है..जब उनकी सरकार थी तब उसी पूर्वाग्रहों के भंडार से वो चूरन आसपास के नेताओं को बांटते थे..ये पहले पत्रकार बने फिर सलाहकार बने फिर क़ानूनकार बने…अनुमान मत लगाइएगा…
बिहार में जमुई के बाद समस्तीपुर उसके बाद बांका का मासूम बालिकाओं के साथ छेड़खानी के वीभत्स घटनाओं का वायरल वीडियो सामने आया । पुलिस ने कारवाई की , गिरफ्तारी हुई लेकिन इसके बाद स्पीडी ट्रायल के हर बार की तरह घोषणा भी हुई लेकिन बिहार में एनडीए शासन काल में भी अपराधियों के हौसले क्यों बुलंद हैं उसके पीछे आपको यहाँ सता में बैठे लोगों का दोहरा चरित्र का विश्लेषण करना होगा । सही हैं घटनाएं हर राज्य में होती हैं लेकिन किस राज्य में एक दलित आईएएस अधिकारी के हत्या के सजायाफ्ता आनंद मोहन सिंह को कानून में संशोधन कर रिहा किया गया उसके बाद गया के रोड रेज के निचली अदालत से दोषी रॉकी यादव के केस में क्या बिहार की एनडीए सरकार सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की और कोई मालूम कर ले ऐसे पॉक्सो एक्ट के मामले में निचली अदालत से दोषी करार दिए गए राजबल्लव यादव जिन्हें हाई कोर्ट से राहत मिली जब ख़ुद बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट में उस फ़ैसले के बाद अपील में गयी तो उसके बाद इस मामले में क्या खेल हो रहा हैं ।सबके जानकारी के लिए ये संयोग हैं आनंद मोहन सिंह के पुत्र चेतन आनंद ने नीतीश सरकार को बचाने के लिए राजद का सदस्य रहने के वावजूद व्हिप का उल्लंघन किया और सदस्यता बरकरार रही और उनकी आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर सांसद बनी ।रॉकी यादव की माता मनोरमा देवी भी जनता दल यूनाइटेड से विधायक हैं और राजबल्लव यादव की पत्नी विभा देवी ने भी व्हिप का उल्लंघन किया और पिछले चुनाव में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जिताने की अपील की और अब वो विधायक नीतीश कुमार की पार्टी से हैं @ravish_journo@iamnarendranath
Lawyers’ Association for Constitution writes to CJI Surya Kant raising concerns over the “out-of-turn” listing of a plea arising from strictures against the Noida District Magistrate and the muting of live proceedings during its hearing
The letter flags that the petitioner, a public servant, is the daughter of the Chief Election Commissioner of India and alleges that the matter was specially assigned to a particular Bench despite the prevailing roster
@MedhaRoopam #SupremeCourt
#JDA कमिश्नर की ये भी एक उपलब्धि है समस्या को छापने वाले न्यूज पेपर को troll करना ये #JDA में join करते जनता को #JDA में जनता को जाने के लिए सीमा निर्धारित कर दी
अनंत सर आप वरिष्ठ संपादक हैं..विनम्रता पूर्वक लिख रहा हूँ…आपने कहा कि खबर शानदार है लेकिन बारीकी से रिपोर्टर को किस source से खबर मिली है उस पर आपने सवाल खड़ा कर दिया..
दूसरा खबर को इसलिए आपने अधूरी बता दिया कि आपत्ति के बाद क्या हुआ उसका ज़िक्र नहीं है…जबकि ये खबर फ़ैसले लेने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़ा करती है…ना कि ये फ़ैसला ग़लत है या सही है इस पर…
एक तरफ चुनाव आयोग कहता है कि 10 महीनों में 40 से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया में सुधार के फ़ैसले लिए गए…जबकि ख़बर में साफ़ लिखा है कि कैबिनेट सचिव को पत्र लिखने के बाद 4 महीने में पहली बैठक तीन चुनाव आयुक्तों के बीच हुई..समझा जा सकता है कि ये फ़ैसले कैसे लिए गए..जबकि चुनाव आयोग के नियमों में कहा गया है कि ज़्यादातर फ़ैसले सर्व सम्मत से होने चाहिए..
नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से राहत तो मिल गई लेकिन CJI जस्टिस सूर्यकांत पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है ! क्या राहत देने के लिए बदली गई बेंच?
https://t.co/vKa8ZmvN7B
Questions Over Listing Of Noida DM Medha Roopam's Plea In Supreme Court |@1Simranbakshi
The episode also brings the exercise of Master of Roster powers under scrutiny.
https://t.co/Z7iHM0tGn8
सूत्रों के हवाले से @timesofindia ने बताया है कि, @ECISVEEP में कोई मतभेद नहीं है। सब कुछ नियम के तहत हुआ है, लेकिन @RitikaChopra__ की रिपोर्ट पर तीनों चुनाव आयुक्तों को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करना चाहिए। https://t.co/0WJJu504fG
#ExpressInvestigation | SIR, which began in Bihar in June 2025, an otherwise routine clean-up of the rolls, has struck more than 13 crore names off the draft voter rolls in 30 States and Union Territories. This has put the Election Commission at the centre of intense public debate over its role in deciding who gets to vote — and who doesn’t.
An investigation by The Indian Express reveals that questions were raised on these very issues within the three-member Election Commission itself, time and again through much of this same period. By two of the three Election Commissioners, Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi, no less.
Reported by: @RitikaChopra__
Read: https://t.co/5wxH2BOWkG
The Election Commission of India is under fire like never before.
The SIR has struck 13 crore names off draft rolls, putting the EC at the centre of intense public debate over its role in deciding who gets to vote — and who doesn’t.
HOWEVER, what nobody knew: through that same period, some of the sharpest questions were being asked from inside.
Out today, after months of work. Our #ExpressInvestigation 🧵
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