आज कानपुर देहात के थाना डेरापुर के ग्राम लाल पूर्वा में बाबा साहब की प्रतिमा को संविधान विरोधी देशद्रोहियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया प्रशासन उक्त प्रकरण की गंभीरता से जांच करते हुए प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने वाले लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करते हुए कानूनी कार्रवाई करे
क्या ये देश का दुर्भाग्य नहीं है कि तड़ीपार व्यक्ति आज गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठा है...?
हमारे लिए तो अंबेडकर के नाम और उनके विचार ही स्वर्ग का अनुभव कराने के लिए काफी हैं।
भ्रष्टाचार की भेंट चढा पुष्टाहार! ऑगवाड़ी कार्यकत्री से फोन पर जानकारी करने पर बिफरी और हाथ में कटौरा थमाने की धमकी दी। प्रकरण कानपुर देहात के गॉव कृपालपुर (शिवाजीनगर) वि0ख0 अकबरपुर कानपुर देहात का है। कृपया @DMKanpurDehat@CdoKanpurDehat@CMOfficeUP
जी संज्ञान लें
अगर हिम्मत हो तो तुम शहीद सम्मान रथ यात्रा मेरे क्षेत्र में निकाल लेना, मुकदमा कर जेल भेज दूंगा...
-संजय कुमार सिंह,CO भोगनीपुर
शहीदों के सम्मान में बृजेश प्रजापति जी के नेतृत्व में निकली जा रही शहीद सम्मान रथ यात्रा जिसमे बहुजन आर्मी के अध्यक्ष देवा रावत जी का अहम योगदान रहा है।
यात्रा 26 को कानपुर पहुंचने वाली थी और उसके पहले की रिकॉर्डिंग सुनिए CO और देवा रावत जी के बीच में....
@DevaRawatBEM@brajeshkmpraja@rajkumarbhatisp@prajaptiinder@Uppolice@kanpurnagarpol@adgzonekanpur@DMKanpur@igrangekanpur
अजीब जबरदस्ती है... @myogiadityanath योगी जी आपके प्रदेश मे शहीदों का क्या यही सम्मान है ❓
सिंधु घाटी सभ्यता में न ही रामायण के ट्रेस पाए गए न ही महाभारत के न ही कोई वैदिक सबूत पाए गए ।
तो सवाल यह है की सिंधु घाटी सभ्यता के लोगो का धर्म क्या था ?
इतिहासकारों ने सिंधु घाटी के स्तूप को पहली सदी के कुषाण काल का स्तूप प्रचारित करने की भी कोशिश की लेकिन यहाँ दो प्रॉब्लम खड़ी हो गई ।
पहली प्रॉब्लम यह थी क्या कुषाण बौद्ध शासकों को सिंधु घाटी सभ्यता का पता था जो उसके ऊपर स्तूप बने दिए ?
दूसरी प्रॉब्लम ने तो सारे इतिहासकारों के माथे पर पसीना ला दिया जब यह साबित हो गया कि सिंधु घाटी का स्तूप 4100 साल पुराना है। उसके ईंटो की साइज और मैटेरियल की जांच के बाद अंतर्राष्ट्रीय पुरातत्वविदों ने स्तूप के सिंघु घाटी सभ्यता में ही बने होने पर मुहर लगा दी ।
अब फिर से सवाल यही है दुनिया के हरेक देश अपना सही इतिहास जानना चाहते है जबकि हम भारतीयो को सही इतिहास जानने से कौन वंचित करने का प्रयास करते आया है ?
आखिर किसी को भारतीयो के सही इतिहास प्रचार प्रसार से इतनी नफ़रत क्यो है ?
आखिर वो कौन गद्दार और देशद्रोही है जो हमे झूठा इतिहास परोस कर सही इतिहास से भटकाने में अपना फायदा खोजते आया है ?
जिसे अब भी इन तथ्यों पर डाउट हो Open Debate Invitation hai आज Sunday 7:30pm “Rational World” Yt live में जुड़कर डिबेट कर लेवे ।
याद रहे यहाँ सिर्फ़ सबूत मायने रखता है ।
#indus
#sindhughatisabhyta
#सिंधु_घाटी_बौद्ध_सभ्यता
धीरेन्द्र शास्त्री का हिंदू जोड़ो यात्रा तो सब देख रहे हैं। इस धम्म यात्रा को भी देख लीजिए। जो सारनाथ से कुशीनगर तक बौद्ध भिक्षु चंदिमा जी के नेतृत्व में चल रहा है।यात्रा का समापन कुशीनगर में 8 दिसंबर को होगा.
इस यात्रा को न मीडिया दिखाएगी, न कोई सेलिब्रिटी पहुंचेंगे। आइए हमसब मिलकर इस यात्रा को लोगों को दिखाए.
#Live यह मंदिर #प्रयागराज के #भीटा में है और आपको बता दूं कि भीटा में कई पुरातात्विक अवशेष मौर्य काल के गुप्त काल के पाए गए हैं और इस मंदिर में बुद्ध की मूर्ति बनी हुई है इसका भी सर्वे होना चाहिए और इसको #बौद्धों के हाथों में दे देना चाहिए
Nmo Budhhay ❣️
झूठ बोले कौआ काटे. इतिहास में अपनी जाति के वर्चस्व के लिए काल्पनिक कहानी किसने ठुसी?
INDICA ग्रंथ में मेगस्थनीज ने कहीं भी किसी कौटिल्य या विष्णुगुप्त या चाणक्य का उल्लेख नही किया है. और ना ही सिंहासन हासिल करने के लिए किसी ब्राह्मण की सहायता ली.
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में चाणक्य नाम का कोई प्रधानमंत्री नही है. ना अर्थशास्त्र नाम का किसी किताब का उल्लेख है.
इस झूठे इतिहास को, इस राजनीति को "साम दाम दंड भेद" की नीति कहा जाता है. इस नीति के अंतर्गत हर उस महान व्यक्ति को "ब्राह्मण" अथवा "ब्राह्मण पूजक" सिद्ध करने की कोशिश हुई है.
1) एकलव्य और भगवान कृष्ण को "ब्राह्मण पूजक" सिद्ध करने के लिए कहानी बनाई गई कि एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर ब्राह्मण द्रोण को दे दिया.
भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण सुदामा के पैर धोकर गंदा पानी (चरणामृत) पीया.
2) महान सम्राट चंद्रगुप्त के हज़ारों साल बाद मुद्राराक्षस नामक नाटक लिखकर यह कहानी प्रचारित की गई वह गलियों में घूमने वाला आवारा बालक थे,
मगर एक गरीब ब्राह्मण कौटिल्य ने उनको भारत का राजा बना दिया.
जबकि सच्चाई ये है चंद्रगुप्त मौर्य का नंद वंश से खून का रिश्ता था. वे अकेले अपने दम पर अलैक्जेंडर से मिलने गए. जब अलैक्जेंडर ने उनके बात की कदर नही की, तो उन्होंने स्थानीय राजा-रजवाड़ों को एकत्रित किया आओके यवनों को यहां से मार भगाया, और भारत की राजसत्ता पर काबिज हुए.
कलम उनके हाथों में थी इसलिए हर काल खंड में अपनी जाति का काल्पनिक चरित्र ठूस दिया.
ब्राह्मण संप्रदाय में शास्त्र ही प्रमाण है जबकी बुद्ध धम्म में शास्त्र तब तक प्रमाण नहीं माना जाता जबतक की वो तर्क बुद्धि विवेक पर खरी न उतरे।
यानी कोई किताब खोल कर सबूत दिखाए तो ब्राह्मण संप्रदाय में सबूत मान लिया जाएगा लेकिन बुद्ध धम्म में तब तक उसे सबूत नहीं माना जाता जब तक कि वो मानवता की भलाई के लिए न हो।
रेफ़्रेंस संलग्न है ख़ुद पढ़ लेवे।
रामायण की तरह भारतीय संविधान को भी
टी.वी. TV पर दिखाना चाहिए ताकि सभी लोग
अपने हक और अधिकारों के बारे में जान सके।
~ अवध ओझा सर
आप लोगों का क्या मानना है साथियों...