सूरज भाई। पिछली बार से 3 सीट अधिक जीती है और वोट शेयर में भी इजाफा हुआ है
2019 में 16 बार्ड पार्षद
2026 में 19 वार्ड पार्षद
2019 वोट शेयर 1.18
2026 वोट शेयर 1.88
खुश होना चाहिए
@SurajKrBauddh
राजस्थान में बसपा का बुरा प्रदर्शन।
यहां नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के कुल 10,242 वार्ड हैं। इनमें से बसपा केवल 21 सीटें जीती है और हम ऐसे खुश हो रहे हैं, मानो कोई बड़ी जंग जीत ली हो।
एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह परिणाम बेहद निराशाजनक और चिंताजनक है। अभी अगले साल दिल्ली नगर निगम के चुनाव भी होने हैं। फिलहाल दिल्ली में हमारा एक भी पार्षद नहीं है। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों को मिलाकर बसपा को कुल लगभग 67,000 वोट मिले। सभी 70 सीटों पर हमारी जमानत जब्त हो गई। आखिरी बार बसपा के दो विधायक 2008 के विधानसभा चुनाव में जीते थे।
ऐसे में राजस्थान के इस चुनाव परिणाम को देखकर दिल्ली नगर निगम चुनाव के लिए भी कोई खास उम्मीद नजर नहीं आती। दिल्ली देश की राजधानी है। यहां बसपा के पदाधिकारियों को और ज्यादा मेहनत, सक्रियता और संगठन निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन दिल्ली में जिस तरह की सुस्ती दिखाई दे रही है, हालिया परिणामों के बाद भी उसमें सुधार की कोई उम्मीद नजर नहीं आती।
अब सवाल यह है कि आखिर राजस्थान में बसपा का इतना खराब प्रदर्शन क्यों हुआ? कुछ साथियों का तर्क है कि बसपा महज एक तिहाई सीटों पर चुनाव लड़ी थी। ऐसे में भी बड़ा सवाल यही है कि बसपा सभी सीटों पर चुनाव क्यों नहीं लड़ी? लोकतंत्र में किसी भी पार्टी को पूर्ण तैयारी के साथ अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की भूख होनी चाहिए।
एक समय था जब बसपा को नेता बनाने वाली फैक्ट्री कहा जाता था। कांशीराम साहब ने हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं को तैयार किया और उनमें से नेतृत्व खड़ा किया। आज स्थिति यह है कि हमारे पास पर्याप्त संख्या में स्थानीय नेता और जिम्मेदारी उठाने वाले कार्यकर्ता ही नहीं हैं। मजबूरन एक-एक व्यक्ति को कई-कई राज्यों का प्रभारी बनाया जा रहा है और परिणाम लगातार गिरते जा रहे हैं।
आप खुद सोचिए। मुझे नहीं पता कि वर्तमान में राजस्थान का प्रभार किसके पास है, लेकिन जब एक व्यक्ति को पांच-पांच, दस-दस राज्यों का प्रभारी बना दिया जाएगा तो ऐसे परिणाम आने ही हैं। एक व्यक्ति अपना कितना समय और ऊर्जा अलग-अलग राज्यों में दे सकता है? उसका अधिकांश समय यात्रा में निकल जाता है। समय और संसाधन दोनों खर्च होते हैं और लगातार भागदौड़ का असर स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
यह व्यवस्था सिर्फ संगठन को कमजोर नहीं करती, बल्कि इससे पदाधिकारियों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने और अधिक से अधिक आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलने की आशंका रहती है। जब एक व्यक्ति के पास कई राज्यों की जिम्मेदारी होगी, तो स्वाभाविक है कि उसकी प्राथमिकता हर राज्य के जमीनी संगठन और कार्यकर्ताओं पर बराबर नहीं रह पाएगी।
बारां में आप खुद देखिए, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को भी पछाड़ दिया है। दूसरी तरफ, 10,242 वार्डों में बसपा केवल 21 सीटें जीत सकी है। एक राष्ट्रीय पार्टी का इतनी बुरा परफॉर्मेंस पर गंभीर समीक्षा होनी चाहिए, न कि समाज के युवाओं को यह बहलाने की कोशिश कि देखो इतनी कम सीटें जीतकर कोई बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।
21 सीटें जीतना उपलब्धि नहीं, बल्कि समीक्षा का विषय है। माननीया बहन @Mayawati जी को बसपा पदाधिकारियों की जवाबदेही करनी चाहिए। किस प्रभारी ने कितने कार्यकर्ता जोड़े? कितने नए बूथ बनाए? कितने स्थानीय नेताओं को तैयार किया? संगठन कितना मजबूत हुआ? चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत क्यों नहीं बढ़ा? इन सबकी समीक्षा होनी चाहिए।
एक व्यक्ति को 5-10 राज्यों का प्रभारी बनाकर हम न तो मजबूत स्थानीय नेतृत्व तैयार कर पाएंगे और न ही संगठन को जमीन पर खड़ा कर पाएंगे। इसीलिए हमारा सुझाव है कि बसपा में एक व्यक्ति को सिर्फ एक राज्य का प्रभारी बनाया जाए। सिंपल सा फॉर्मूला है; एक व्यक्ति, एक राज्य, एक प्रभारी।
- सूरज कुमार बौद्ध
@kamaalrkhan@Mayawati कोई उधम सिंह का वंशज है जो लंदन में रहता हो जिसने जनरल डायर को वही जाके मारा था इसे मारना नहीं है इसके हाथ ओर मुंह तोड़ना जो जुड़ न पाए
मोदी जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहें, लेकिन उनको लगता हैं वे पहली बार हार गयें, भावुक होने लगे वह भी कैमरे के सामने
माननीया बहनजी,
आप ने अपने जीवन में बहुत बार ऐसे हालात देखे लेकिन आप अलग ही मिट्टी की बनी हैं, हर बार खुद को सम्भाल कर नयी उर्जा के साथ वापसी करती हैं आप को दिल से सैलूट है
आज बसपा की जो भी स्थिति हैं उसको देखकर तमाम विरोधी खुश हैं, होना भी चाहिए, खुला मैदान मिलने के बाद भी उनसे कुछ खास हुआ नही, राजनीतिक गिद्धों की लार टपकने लगी, कुछ तो यहाँ तक कह रहें अगले चुनाव में भाजपा के साथ जा कर अपमानजनक समौता करेंगी, उम्मीद है कि आप हमेशा की तरह अडिग रहते हुए वापसी जरूर करेंगी
हम जैसे लोगो को माफ कर दीजिए कभी कभी हम लोग भवावेश में आकर आलोचना कर बैठते हैं
एक बात जरूर कहूंगा
प्रदेश बहुत बड़ा है, यूपी के कोने कोने के सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ समीक्षा जरूर करिये, उनकी भी बात सुनिये फिर किसी निर्णय पर आईये
उन सब से भी जबाव मांगिये जिनके कंडिडेट बैठ गयें
बस्ती मंडल में तीनों टिकट आखिर 2 दिन में हुए
डुमरियागंज से चौधरी नाक रगड़ते रह गये टिकट नही मिला, वहाँ तो जिला अध्यक्ष को कार्यकर्ताओं ने ही पीटा कारण चुपके से एक बाहरी का नामांकन करा दियें
बस्ती में मिश्रा जो कि ठीक चुनाव लड़ रहें थे रातो रात टिकट कटा
संतकबीरनगर में दो दो बार टिकट हुआ दोनों बार डमी जो कि भाजपा का आदमी थें, उनको रातो रात टिकट हुआ जबकि एक पूर्व विधायक टिकट के लिए नाक रगड़ता रहा
संतकबीरनगर में बूथों पर बस्ता तक नही बटा हालात यह थें
19 मई को को आप की बस्ती मंडल की रैली थी, डुमरियागंज और संतकबीरनगर ने जनता को ले जाने के लिए कोई व्यवस्था नही थी, जो भी भीड़ थी सब अपने संसाधनों से गयें थे
सिर्फ एक मंडल ही नही शायद पूरे यूपी में यही चला और नतीजे सामने हैं
एक और आखिरी बात गैर राजनीतिक व्यक्ति चाहे खरबपती ही क्यूँ ना हो एक महीने में जनता या अपनी जाति को नही जोड़ सकता है, जनता( गैर कैडर) वोट देने से पहले चाहती हैं कि प्रत्याशी एक बार उनके गली मुहल्ले में वोट मांगने आयें
हम लोगो की यही छोटी छोटी शिकायतें हैं, हमारा कोई अन्य प्लेटफार्म नही है तो मजबूरी में यहाँ लिखना पड़ता हैं, उसके लिए माफ़ी
जय भीम जय भारत 🙏🙏🙏
जय संविधान जय बहुजन🙏🙏🙏
मैं बहुत ख़ूश हु की ये मनुबादी मानसिकता का इंडी गठबंधन हार जाएगा और उसे बड़ी खुशी इस बात की एक सीट के लिए समाज का दलाल कुर्सी के लालच में बहुजन समाज का सौदा कर गठबंधन में घुस रहा था और बेइज्जत करके वाहर निकला
बीएसपी हारे या जीते अपने समाज को झुकना नहीं सिखाया
अगर गठबंधन की हार होती है तो उसका सबसे बड़ा जिम्मेदार होगा ये आदमी, वरना अबकी बार जनता का पूरा मन था बदलाव का। अगर एकजुट होकर लड़ा जाता तो भाजपा की हार निश्चित थी। लेकिन @yadavakhilesh जैसे स्वार्थी नेताओं ने अपनी राजनीति बचाने के लिए विपक्ष का जानबूझकर कमजोर रखा।
@RahulNagpal1980 इस तस्वीर मे आपको बहन जी के साथ राहुल नागपाल नाम का दलाल, चमचा भी दिखाई दे रहा होगा जो आज कल अपनी पोस्ट मे बहन जी पर अपनो से मिलने का समय न होने का आरोप लगता फिर रहा है। ऐसे लम्पटों से सावधान रहे जिनके गले मे मनुवादीयों का पट्टा बंधा हुआ है।
शर्म करो दलालों
आंध्र प्रदेश के धर्मावरम में NSUI के राष्ट्रीय सचिव व SC समुदाय के युवा नेता संपथ राज की निर्मम हत्या कर दी गई। वह पिछले कई महीनों से पुलिस-प्रशासन की मदद मांग रहे थे लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की।
हत्यारों एवं पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। @ysjagan@APPOLICE100
आज कि ताजा खबर ,
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिगराम गर्ग का आतंक, अपने साथियों के साथ जीतू तिवारी के घर किया हमला, पूरे परिवार को पीटा, वीडियो वायरल....
धीरेंद्र शास्त्री का भाई गुंडा और आतंकवादी है इस पर कंट्रोल जरूरी है
मुसलमानों 2029 मे अगर ये फीगर ज़ीरो हो जाए
तो आपको हाय तौबा नहीं करनी हैं
क्यूँकि आपको संविधान जो बचाना है ।
जितने टिकट सब पार्टियों ने मिलकर दिये हैं वों तो शुक्र मानो लगभग उतने ही टिकट अकेले बसपा ने दें रखें हैं @AnandAkash_BSP
संयुक्त राष्ट्र ने फ्लॉप 'सावरकर' फिल्म के एक्टर रणदीप हुड्डा को बहन जी के बारे में घटिया टिप्पणी करने के कारण एम्बेसडर पद से बर्खास्त कर दिया।
हमारी बसपा सुप्रीमो आदरणीया बहन मायावती जी विश्व की सर्व सम्मानित नेता हैं। भारत में तो उनका सम्मान है ही, @KumarSudeshArya
हिम्मती बहन को मेरा आखिरी सलाम!🙏
अंजना अहिरवार के साथ 2019 में छेड़खानी की एक वारदात हुई थी। दरिंदों ने लड़की पर केस वापस लेने का दबाव बनाया। वह नहीं मानी तो 2023 में उसके भाई की हत्या कर दी गई। मां को निर्वस्त्र करके पीटा गया।
इस हत्या में कुल 9 दरिंदे शामिल थे। उनके नाम हैं: विक्रम ठाकुर, इस्लाम खान, विजय, आजाद, नफीस खान, वाहिद खान, गोलू, कोमल ठाकुर, लालू खान।
अंजना बहुत हिम्मती थी लेकिन अपने भाई की निर्मम हत्या के बाद से पूरी तरह से टूट चुकी थी। अब उसके संबल सिर्फ उसके चाचा राजेन्द्र अहिरवार थे। वह अपनी भतीजी के न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। तीन दिन पहले 25 मई को आशिक कुरैशी, बबलू बेना, फहीम खान, टंटु कुरैशी आदि ने मिलकर राजेन्द्र अहिरवार की जघन्य हत्या कर दी।
अपने चाचा की जान बचाने के लिए अंजना ने तुरंत एम्बुलेंस मंगाई और इलाज के लिए उन्हें भोपाल लेकर निकल पड़ी। अफसोस उनकी रास्ते में ही मौत हो गई।
दुखों का बोझ झेल रही अंजना एम्बुलेंस से अपने चाचा का शव लेकर घर वापस आ रही थी और रास्ते में संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी भी मौत हो गई। इस तरह बहन अंजना ने पांच सालों में अनगिनत अपमान सहा, न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाई, अपने मासूम भाई को खो दिया, मां के साथ सरेआम बदसलूकी सही, अपने चाचा को खो दिया और अंततः खुद भी मार दी गई। पांच साल में अंजना का सबकुछ खत्म हो गया।
संघ सरकार एवं मध्य प्रदेश सरकार को थोड़ी सी भी लाज बची हो तो इस मामले को CBI के हाथों सौंप दिया जाए। हत्यारों का BJP नेताओं से सांठगांठ है। पुलिस पक्षपात कर रही है। अतः न्याय की उम्मीद कम है।
पीड़िता बहन का गुनाह सिर्फ इतना है कि वह SC समुदाय से आती है। इसीलिए न्यायपालिका से लेकर महिला आयोग तक सब तमाशबीन बने हुए हैं। वह अपने आखिरी सांस तक न्याय के लिए लड़ती रही। बहन के हिम्मत को मेरा सलाम है। आप सबसे उम्मीद है कि सरकारों को टैग करके CBI जांच की मांग करें। बहन को हर हाल में न्याय मिलना चाहिए। @narendramodi@DrMohanYadav51@AmitShah@DGP_MP@NCSC_GoI@NCWIndia@mohdept@MPPoliceDeptt@SurajKrBauddh ✍️bhai
मेरे परिवार से पांच लोग निकल गए हैं दिल्ली से बिल्थरा रोड आखिरी चरण के चुनाव के लिए क्योंकि घोसी और सलेमपुर लोकसभा बसपा को जिताना है मैं और मेरे भाई 31मई को निकलेंगे और 1 जून को पहुंच जाएंगे!!
#जय_बीएसपी#विजय_बीएसपी@Mayawati@AnandAkash_BSP
@Ravindr96380642
@archanaranjang
हरदोई में बसपा पोलिंग एजेंट की हत्या के मामले में DM, SSP, SDM, CO, थानाध्यक्ष समेत 50 से ज्यादा पुलिस कर्मियों पर SC ACT में मुकदमा दर्ज।
इस मामले को आदरणीय बहन @Mayawati जी ने सीधा संज्ञान लिया था
बक्सर लोकसभा पर अनिल कुमार बीएसपी के उम्मीदवार है "और पहले नंबर पर चल रहे हैं!! यहां पर भीम आर्मी ने निर्दलीय ददन यादव का समर्थन करना बहुत गलत है " ये वही ददन यादव है जिन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति कचरे में फेक दिया था
@abhijatav07 जो बाते लिखी ह ये सब बीएसपी की हो सकता ह बीएसपी को वोट दिया हो पर दिल और दिमाग कहता ह indi गठबंधन को दिया होगा क्योंकि वो भी सब वोट के लालच में बाबा साहब और बहुजनों के महापुरुष के नाम लेते फिर रहे ह
@Profdilipmandal@RahulNagpal1980@Sumitchauhaan@ratanlal72 भेड़ को वहम था कि उसका रखवाला उसकी ऊन बेचकर लाभ कमा रहा है,
इसलिए बदला लेने के लिए वह कसाई के साथ चली गई।
राजनीति में यही हाल कुछ वहम में जी रहे बहुजनों का है,
खासकर दलितों का........
यादव जब थोड़ा शिक्षित हो जाता है तो अपने शिक्षित होने के प्रमाणस्वरूप वो अपनी पार्टी पहचानने लगता है और उसे मज़बूत करने के लिए अन्य वर्गों में जाकर समर्थन मांगता है।
दलित जब थोड़ा शिक्षित हो जाता है तो अपने शिक्षित होने के प्रमाणस्वरूप वो सबसे पहले अपनी पार्टी, अपने नेता और अपने महापुरुषों पर सवाल उठाता है और अपने समाज, नेता व पार्टी से कटकर दूसरे की गोद में बैठ जाता है।
ये रूझान क्या आप भी अनुभव करते हैं.?
दिल्ली से सटे नोएडा में हजारों बीघा में फैली 'गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी ' बहन मायावती जी के शासन काल में बनी थी ,
दोबारा से बौद्ध विरासत का पुनर्जन्म करने का श्रेय बहन मायावती जी को ही जाता है , जबकि इससे अलग बहन जी ने सैंकड़ों स्कूल कालेज और यूनिवर्सिटी बनाईं हैं l
#budhpurinama