Recite the name of the Guru, your mind will find peace.
The one who remembered the Guru, his work got accomplished.
Salutations to that Satguru who dispels darkness
By leading us on the path of devotion, it helps us meet God.
ध्यान की तरह मंत्र जाप वह प्रक्रिया है जो शरीर गत पदार्थ के साथ दिव्य उपस्थिति को यथासंभव संयुक्त करने में अधिकतम सक्रिय तथा प्रभावी प्रतीत होता है I देखो, यह ध्वनि का जादू है I यह पदार्थ को दिव्य बनाने की चेष्टा है I लगभग समान दृष्टिकोण से, वह शारीरिक वायुमंडल को दिव्य उपस्थिति से आपूरीत कर देता है I तो नाम जप में व्यतीत हुआ काल वह समर्पित काल है जो भौतिक पदार्थ को भगवान के संपर्क में अधिक अंतरंग रूप से लाने में सहायक होता है I - श्री मां ( महर्षि श्री अरविंद की एक फ्रेंच सहयोगी शिष्या )
चेतना का रूपांतरण ही वास्तविक समाधान है। गुरु सियाग सिद्ध योग (GSSY) के साथ अपने भीतर की सोई हुई ऊर्जा को जागृत करें और जीवन को नई दिशा दें। आत्म-साक्षात्कार का मार्ग अब सबके लिए खुला है।
Jay gurudev sa 🙏
सिद्ध योग में आज्ञा चक्र तक शरीर और मन का "सुन्न होना" एक बहुत महत्वपूर्ण अवस्था है। इसे योग की भाषा में लय या "तुरीय अवस्था की ओर बढ़ना" भी कहते हैं।
1. ये सुन्न होना क्या दर्शाता है?
ये सुन्नपन कोई बीमारी नहीं है, अपितु यह सुन्नपन एक विशेष घटना है। ये 3 चीजों का संकेत है:
- *प्राण का ऊपर उठना*: सिद्ध योग में कुंडलिनी जब मूलाधार से उठकर आज्ञा चक्र तक पहुंचती है, तो निचले चक्रों का स्थूल आकर्षण कम हो जाता है। इसलिए शरीर का भान धीरे-धीरे चला जाता है।
- *मन का एकाग्र होना*: जब मन बार-बार भटकना बंद करके एक जगह - भ्रूमध्य यानी आज्ञा चक्र पर टिक जाता है, तो बाहर की आवाजें, शरीर का दर्द, भूख-प्यास सबका अहसास कम हो जाता है।
- *गुरु शक्ति का काम करना*: सिद्ध योग में शक्तिपात के बाद गुरु की शक्ति साधक के अंदर काम करती है। वो शरीर के तनाव, संस्कार और ब्लॉकेज को साफ करती है। इस सफाई के दौरान शरीर "सुन्न" या "भारी-हल्का" महसूस होता है।
सीधे शब्दों में - *आप शरीर से अलग होकर दृष्टा बन रहे हैं*।
*2. ये कैसे घटित होता है?*
सिद्ध योग में ये प्रक्रिया अपने आप घटती है, जबरदस्ती नहीं की जाती। इसके 4 मुख्य कारण हैं:
1. *शक्तिपात*: सिद्ध गुरु द्वारा दी गई ऊर्जा रीढ़ में प्रवेश करती है और सुषुम्ना नाड़ी में बहने लगती है।
2. *सहज ध्यान*: आंखें बंद करके भ्रूमध्य पर गुरु मूरत का ध्यान। सांस पर कोई नियंत्रण नहीं, बस साक्षी भाव।
3. *मंत्र जप* गुरु द्वारा दिया गया मंत्र अंदर ही अंदर चलता रहता है। यह ही अजपा है,ये मन को एक जगह बांधता है।
4. *समर्पण भाव*: "मैं कुछ नहीं कर रहा, सब गुरु शक्ति कर रही है" - ये भाव जितना गहरा होगा, उतनी जल्दी लय होगी।
जब प्राण आज्ञा चक्र पर आकर ठहरता है तो मस्तिष्क की बीटा वेव्स कम होकर अल्फा/थीटा में चली जाती हैं। इसलिए शरीर का बोध चला जाता है।
*3. आज्ञा चक्र के बाद क्या-क्या होता है?*
आज्ञा चक्र "दो आंखों के बीच" का केंद्र है। इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। यहां के बाद यात्रा और सूक्ष्म हो जाती है:
*आज्ञा चक्र पर अनुभव:*
- *प्रकाश दर्शन*: आंख बंद करने पर नीला, सुनहरा, सफेद प्रकाश, ज्योति या ज्योति का अंडाकार गोला दिखना
समय का भान खत्म: 15 मिनट लगे या 2 घंटे, पता ही नहीं चलता
गहरी शांति और आनंद, बिना किसी कारण के अंदर से खुशी
अंतर्ज्ञान तेज होना, सही-गलत का फैसला अपने आप आने लगता है
इसके बाद के पड़ाव:
1. *बिंदु चक्र*: खोपड़ी के पीछे। यहां परम शांति और शून्य का अनुभव होता है।
2. *सहस्रार चक्र*: सिर के ऊपर। इसे "परम लय" कहते हैं। यहां साधक को लगता है "मैं शरीर नहीं, मैं चेतना हूं"। इसे *समाधि* की पहली अवस्था भी कहते हैं।
3. *निर्विचार अवस्था*: मन में एक भी विचार नहीं। सिर्फ शुद्ध साक्षी भाव।
4. *बाहरी जीवन में बदलाव*: क्रोध, भय, चिंता कम। करुणा, स्थिरता और स्पष्टता बढ़ती है।
*जरूरी बातें - सावधानी*
1. *डरें नहीं*: सुन्न लगना सामान्य है। अगर बहुत ज्यादा घबराहट हो तो आंख खोल लें और गहरी सांस लें।
2. *जबरदस्ती न करें*: प्राण को खींचकर ऊपर ले जाने की कोशिश न करें। सिद्ध योग में सब सहज होता है।
3. भय,शर्म या लज्जा का भाव ही अवरोधक है निर्द्वंद हो कर साधना करे।
संक्षेप में,शरीर-मन का सुन्न होना ये दिखाता है कि आपकी ऊर्जा स्थूल से सूक्ष्म की ओर जा रही है। आप संसार से हटकर अपने असली स्वरूप - चेतना - के करीब आ रहे हैं।
जो कुछ भी हो रहा है वह चेतना का विस्तार है उसे जज न करें, बस साक्षी बनकर देखें।
आओ सिद्ध योग अपनाए यह स्वचालित स्वाघटित होता, सिद्ध योग के अभ्यास का अर्थ है, हमेशा धैर्य समभाव कृतज्ञता और आनंद के राज्य में रहना। जय गुरुदेव जी ❤️ 🙏। www the-comforter. Org
सिद्ध योग में कुंडलिनी: तनाव का रहस्य, वहन और समाधान.........
सिद्ध योग में स्पष्ट कहा गया है कि कुंडलिनी जागरण वास्तव में तनाव की ही साधना है — कोई शांत, सुखद अनुभव नहीं, बल्कि सूक्ष्म और स्थूल दोनों स्तरों पर संघर्ष। यह तनाव कोई रोग या थकावट नहीं, बल्कि संकुचित चेतना को विस्तारित करने की दिव्य प्रक्रिया है। जब तक साधक इसके स्वरूप, कारण, समय और वहन के तरीके को नहीं समझता, तब तक यही तनाव विघ्न बन जाता है; समझने पर यही मुक्ति का मार्ग बनता है।
कुंडलिनी तनाव क्यों होता है?
सिद्ध योग में कुंडलिनी मूलाधार चक्र में साढ़े तीन लपेट में सोई दिव्य ऊर्जा है — वही शक्ति जो सारे ब्रह्मांड को चलाती है, जब गुरु कृपा से वह जागती है तो उसकी ऊर्जा का प्रवाह 720000नाड़ीओ में दौड़ने लगता है।
ग्रंथियों का टूटना: तीन मुख्य गांठें हैं — ब्रह्म ग्रंथि (अविद्या), विष्णु ग्रंथि (आसक्ति), रुद्र ग्रंथि (अहंकार)। जब कुंडलिनी ऊपर उठती है, ये गांठें टूटती हैं; यही टूटना तनाव, जलन, दबाव का रूप लेता है।
दो विपरीत प्रवाह: सामान्य मनुष्य में प्राण नीचे की ओर बहता है; कुंडलिनी उसे ऊपर मोड़ती है — विपरीत धाराओं का टकराव ही तनाव उत्पन्न करता है ।
संस्कारों का बाहर आना: अवचेतन में दबे काम, क्रोध, लोभ,भय, दुःख के पुराने संस्कार जलकर बाहर निकलते हैं — यह शुद्धिकरण का दर्द है।
संकुचन से विस्तार: चेतना की सीमित स्थिति से असीम स्थिति में जाना — जैसे बंद कली का खिलना, उसमें आंतरिक खिंचाव अनिवार्य है।
तनाव = शुद्धिकरण है+ परिवर्तन का संकेत हैं, न कि कोई गलती या खतरा।
यह तनाव कब-कब होता है?
सिद्ध योग में यह चरणबद्ध रूप से प्रकट होता है:
जागरण के समय: शक्तिपात या नियमित साधना से पहली बार कुंडलिनी जागती है, तब रीढ़ की हड्डी में गर्मी, झुनझुनी, खिंचाव महसूस होता है।
चक्रों को पार करते समय: हर चक्र पर रुकावट आती है — मूलाधार में भार, स्वाधिष्ठान में अशांति, मणिपुर में जलन, अनाहत में दबाव, विशुद्धि में गले का तनाव, आज्ञा में सिर भारी होना।
साधना के बाद: बैठने के बाद कई घंटे तक या रात में नींद में भी ऊर्जा काम करती है शरीर कभी हल्का कभी भारी, मन चंचल या उदास लगता है।
आंतरिक परिवर्तन के दौरान: जब पुराने स्वभाव, विचार, आदतें बदल रही हों — अचानक क्रोध, उदासी, या अत्यधिक खुशी जैसे उभार आते हैं।
गुरु कृपा या तीव्र भावना के आवेश के क्षण: कभी-कभी बिना अभ्यास के भी ऊर्जा जागकर तनाव दे जाती है ।
इस तनाव को कैसे वहन करें? — सिद्ध योग के सिद्ध उपाय,
निरंतर नाम जप या नाद श्रवण करना।
यहां भावना को दबाना नहीं, स्वीकार करना और मार्ग देना ही नियम है।
मानसिक दृष्टिकोण — सबसे महत्वपूर्ण,
स्वीकृति: कहें — “यह मेरी शक्ति है, शुद्ध हो रही है”। विरोध करने से तनाव बढ़ता है, स्वीकार से कम होता है।
अलगाव का भाव: “मैं तनाव नहीं देखने वाला हूं” — चेतना को शरीर-मन से अलग रखें; दर्द अपने आप कम होता है।
धैर्य रखे,सिद्ध योग कहता है — जितना गहरा संस्कार, उतना अधिक तनाव; लेकिन यह स्थायी नहीं।
- सहज कुंभक: श्वास लें, धीरे रोकें, फिर बहुत धीरे छोड़ें — जबरदस्ती नहीं। रुकावट के स्थान पर ऊर्जा को बहने का रास्ता मिलता है।
मंत्र और समर्पण:
गुरु मंत्र के जाप से कंपन उत्पन्न होता है जो गांठें तोड़ता है और तनाव को कंपन में बदल देता है।
गुरु प्रणिधान: सारा भार गुरु या परमशक्ति को सौंप देंने से यह सबसे आसान हो जाता है।
जीवन शैली:
सात्विक भोजन: हल्का, शुद्ध, ताजा — नाड़ियां साफ रहें, भारी भोजन से तनाव बढ़ता है।
मौन और विश्राम: साधना के बाद 30–60 मिनट मौन रहें, या लेट जाएं — ऊर्जा अपना काम कर सके।
ऊर्जा का अपव्यय रोकें ताकि वह शुद्धिकरण में लग सके।
कुंडलिनी का तनाव वह दबाव है जो लोहे को सोना बनाता है। जितना अधिक दबाव, उतनी ही उच्च शुद्धता।”
यह तनाव दो अवस्थाओं के बीच का सेतु है जब यह पूरी तरह वहन हो जाता है और गांठें टूट जाती हैं, तो वही तनाव, धैर्य, समभाव, कृतज्ञता,असीम आनंद, प्रकाश और स्वतंत्रता में बदल जाता है। कुंडलिनी सहस्रार में पहुंचकर शिव से मिल जाती है यहीं से तनाव का अंत और अद्वैत अवस्था का आरंभ होता है ।
सिद्ध योग का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि कुंडलिनी तनाव की ही साधना है — लेकिन यह विनाशकारी नहीं, रूपांतरकारी तनाव है। यह तब आता है जब ऊर्जा अपना मार्ग बदलती है, पुरानी गांठें तोड़ती है और नया निर्माण करती है। स्वीकृति, धैर्य, सहज साधना, गुरु कृपा और संयम से इसे आसानी से वहन किया जा सकता है।
जब साधक यह समझ लेता है कि तनाव ही उसकी अपनी छिपी हुई शक्ति का संकेत है, तो वह न केवल इसे सहर्ष वहन करता है बल्कि इसके माध्यम से सिद्धि की ओर तेजी से बढ़ता है।
जय गुरुदेव जी 🙏❤️
*महर्षि अरविंद के दर्शन में "अधिमानस" और "अतिमानस"* उनकी पूरी Integral Yoga साधना की नींव हैं।
इसे समझने के लिए पहले ये जानो कि अरविंद जी के अनुसार ब्रह्मांड कैसे बना है।
*1. सृष्टि का क्रम - ऊपर से नीचे*
अरविंद जी कहते हैं परम सत्य "सच्चिदानंद" से सृष्टि ऐसे उतरती है:
*सच्चिदानंद → अतिमानस → अधिमानस → उच्चतर मन → प्रदीप्त मन → अंतर्ज्ञानी मन → सामान्य मन → प्राण → अन्न/शरीर*
*2. अधिमानस / Overmind क्या है?*
*शब्द का अर्थ*: "Over" = ऊपर, "Mind" = मन। यानि "मन से ऊपर का स्तर"
*क्या है ये:*
1. *देवताओं का लोक*: अधिमानस वही स्तर है जहां से देवता, देवी, cosmic powers काम करती हैं। इंद्र, अग्नि, वरुण, सरस्वती सब इसी तल से आते हैं।
2. *एकता में अनेकता*: अतिमानस में सब एक है। अधिमानस में "एक" टुकड़े-टुकड़े होकर अलग-अलग देवता, अलग-अलग नियम, अलग-अलग लोक बन जाता है।
3. *सीमित ज्ञान*: अधिमानस को सत्य का पूरा ज्ञान नहीं होता। उसे सत्य के अलग-अलग पहलू दिखते हैं। इसलिए यहां भ्रम, युद्ध, अधूरापन आ जाता है। यही हमारी दुनिया का कारण है।
*कैसे कार्य करता है:*
अधिमानस ऊपर से "आइडिया" लेता है और उसे हजार टुकड़ों में बांट देता है।
उदाहरण: अतिमानस कहेगा "प्रेम"। अधिमानस उसे बांटेगा - माँ का प्रेम, गुरु का प्रेम, देशभक्ति, रोमांस, मित्रता... और हर एक के अलग देवता बना देगा।
यही कारण है कि धर्मों में इतने देवता हैं। सब अधिमानस के प्रोजेक्शन हैं।
*3. अतिमानस / Supramental क्या है?*
*शब्द का अर्थ*: "Supra" = सर्वोच्च, "Mental" = मानसिक। यानि "सर्वोच्च मन"
क्या है ये:
1. *ईश्वर और सृष्टि के बीच की कड़ी*: सच्चिदानंद सीधे दुनिया में नहीं उतर सकता। अतिमानस ही वो "सत्य-चेतना" है जो ईश्वर की इच्छा को बिना तोड़े-मरोड़े धरती पर लाती है।
2. *सत्य-चेतना*: इसमें कोई गलती, भ्रम, अज्ञान नहीं। जो सोचा वही तुरंत हो जाता है। संकल्प और सृष्टि एक हैं।
3. *एकता*: यहां सब चीजें अलग नहीं दिखतीं। विरोध नहीं है। शिव और शक्ति, पुरुष और प्रकृति एक ही हैं।
अरविंद जी कहते थे: "अतिमानस ही अगला विकास है। जैसे मान्यतानुसार बंदर से इंसान बना, वैसे इंसान से अतिमानस प्राणी बनेगा। जो दिव्य शरीर धारण करेगा।
*कैसे कार्य करता है:*
अतिमानस 4 काम करता है:
1. *सत्य-दृष्टि*: हर चीज को जैसा है वैसा देखता है
2. *सत्य-संकल्प*: जो संकल्प करे वो तुरंत प्रकट हो
3. *सत्य-शक्ति*: बिना विरोध के काम करे
4. *सत्य-आनंद*: हर क्रिया में आनंद हो
उदाहरण: सामान्य मन सोचेगा "मैं बीमार हूं, दवा लूं"। अतिमानस सोचेगा "स्वस्थ हूं" और शरीर तुरंत स्वस्थ हो जाएगा।
*4. अधिमानस vs अतिमानस - सीधा अंतर*
**अधिमानस Overmind** **अतिमानस Supramental**
**ज्ञान** टुकड़ों में ज्ञान समग्र, पूर्ण ज्ञान
**देवता** अनेक देवता बनते हैं एक ही सच्चिदानंद दिखता है
**भ्रम** भ्रम संभव है भ्रम असंभव
**समय** काल में बंधा है काल से परे
**उदाहरण** इंद्र, विष्णु, दुर्गा स्वयं ईश्वर की सत्य-शक्ति
*5. ये हमारे जीवन में कैसे काम करता है?*
अरविंद जी की साधना का लक्ष्य था "अतिमानस को धरती पर उतारना"।
*स्टेप 1*: पहले हमारा सामान्य मन शांत हो
*स्टेप 2*: फिर उच्चतर मन, प्रदीप्त मन, अंतर्ज्ञान खुले
*स्टेप 3*: फिर अधिमानस खुलेगा - यहां साधक को देव-दर्शन, सिद्धियां मिलती हैं। पर अरविंद जी कहते थे यहां मत रुको
*स्टेप 4*: अंत में अतिमानस उतरेगा - तभी "दिव्य जीवन" संभव है
जब अतिमानस शरीर में उतरता है तो शरीर, प्राण, मन सब बदल जाते हैं। बुढ़ापा, रोग, मृत्यु पर भी विजय मिलती है। इसे ही "सुपरमेंटल ट्रांसफॉर्मेशन" कहते हैं।
अधिमानस देवताओं का HQ। बहुत शक्तिशाली है पर अधूरा है। यहीं से धर्म, मिथक, कर्मकांड आए।
*अतिमानस* = ईश्वर का डायरेक्ट पावर हाउस। इसमें कोई बंटवारा नहीं। यही धरती पर "स्वर्ग" लाएगा।
अरविंद जी और माँ ने पांडिचेरी में इसी अतिमानस को पृथ्वी पर स्थापित करने की साधना की, और वह अतिमानसिक देव अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ 24 नवंबर 1926 को पूज्य गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग के रूप में अवतरित हुई। आओ सिद्ध योग के अभ्यास द्वारा हम अपने आप को अतिमानस देव के रूप में स्थापित करें और सदैव धैर्य,समभाव, कृतज्ञता और आनंद के राज्य में रहे। जय गुरुदेव जी 🙏 ❤️
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It’s Wednesday! 🎯
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