घड़ी दो घड़ी जिए पर युग युग को पर्याप्त हो गए
फूल जो मिले धूल में तो कण कण में व्याप्त हो गए
सलामत देश रहे ये कहते हुए समाप्त हो गए
सफर पर चलते हैं कह जो वीरगति को प्राप्त हो गए
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