अपने स्वार्थ के लिए कब तक जिएंगे आइए हम सब मिलकर देश के लिए जियें आपस में मैं नहीं हम की भावना लाएं। वैदिक यज्ञ करें योग प्राणायाम करें। दूसरों को स्वस्थ बनाएं।
ईशे॒ यो विश्व॑स्या दे॒ववी॑ते॒रीशे॑ वि॒श्वायु॑रु॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ । आ यस्मि॑न्म॒ना ह॒वींष्य॒ग्नावरि॑ष्टरथः स्क॒भ्नाति॑ शू॒षैः ॥
अग्रणायक परमात्मा उपासकों के लिये दिव्यभोगों और प्रकाशमय बुद्धि को प्रदान करने में समर्थ है, उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करने वालों को पूर्ण आयु देता है
परमात्मा अपने प्रकाश से मुक्तात्माओं के साथ रहता है, वह सत्य ज्ञानवान् एकरस है, उपासक आत्माओं का मित्र है, उन्हें सरलरूप से प्राप्त होता है। ऐसे ही सूर्य भी आकाश में वर्तमान हुआ अपने प्रकाश से ग्रहों के साथ मित्र सा बना रहता है ॥
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ब्रह्माण्ड में वर्तमान पिण्ड ग्रह आदि सुप्रसिद्ध अग्निरूप सूर्य से बल पाते हैं, द्युलोक, पृथिवीलोक अपने ऊपर धारण करते हैं। तेजों अन्नों -तेज शक्ति अन्नशक्ति को प्राप्त कर मनुष्यादि प्रजाओं को समृद्ध करने के लिए द्युलोक सूर्य से तेज शक्ति पृथिवीलोक सूर्य से अन्न शक्ति को लेता है।
द्युलोक और पृथिवीलोक का पुत्ररूप अग्नि है, उसे विद्वान् सुरक्षित करते हैं-लाभ लेते हैं, पुत्रोत्पत्ति चाहनेवाले माता-पिता उचित आहार-व्यवहार द्वारा अपने अन्दर सन्तति बीज रस को बनावें और अपनी प्रबल शुभ भावना से गर्भाधान करें, तो उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है ॥
परमात्मा सब उत्पन्न अग्नि आदि का जाननेवाला है-सर्वज्ञ है, उसके लिये मनन उपासन स्तुति यज्ञ आदि करने चाहियें, जो हमारे आत्मा में उसके साक्षात् स्वरूप को बढ़ानेवाले हैं और वह परमात्मा हमारी तथा हमारे पुत्र-पौत्रों आदि की सदा ही निःसंकोच रक्षा करनेवाला है ॥
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शिशुं॒ न त्वा॒ जेन्यं॑ व॒र्धय॑न्ती मा॒ता बि॑भर्ति सचन॒स्यमा॑ना । धनो॒रधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ हर्य॒ञ्जिगी॑षसे प॒शुरि॒वाव॑सृष्टः ॥ (ऋग्वेद 10-04-3)
प्राणियों की माता पृथिवी जयशील विद्युद्रूप अग्नि को बढ़ावा देती है और वह विद्युद् अग्नि वृष्टि के निमित्त चमकती और कड़कती है ॥
परमात्मा उत्पत्तिरहित होने से बाल्य और वार्धक्य से रहित सदा युवा है। जनमात्र उसकी शरण लेते हैं, जैसे शीतपीड़ित गौएँ गोशाला की। परमात्मा मुमुक्षु और साधारण जनों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, दुःख का निवारक है, वह प्रभावकारी तेज से सब में व्याप्त है, उसकी उपासना करनी चाहिये ॥
प्रकाशमान सूर्य की प्रकाश तरंग संसार में सर्वत्र क्रीडा सी करती हुई गति करती हैं, उपासक जैसे परमात्मा की स्तुति करते हुए संसार में विचरते हैं और अन्त में मोक्ष में विराजते हैं, ऐसे विद्यासूर्य विद्वान् की ज्ञान तरंग संसार में फैला करती हैं।
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सूर्य की प्रकाशतरङ्ग स्तुत्य उपासनीय परमात्मा के स्तवन-गुणगान करती हुई सी उपास्य परमात्मा के ज्ञान मार्ग में-उपासना मार्ग में प्रकाशस्तम्भ बन जाती हैं। इसी प्रकार विद्यासूर्य विद्वान् के ज्ञानप्रकाश परमात्मा की ओर ज्ञानप्रेरक होने चाहियें ॥ @bst_arya@indiatvnews