विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
इसका मतलब है कि विद्या से नम्रता आती है, नम्रता से पात्रता मिलती है, पात्रता से धन मिलता है, धन से धर्म मिलता है और धर्म से सुख मिलता है.
Shubh prabhaat 🌻
#Sanskrit#shloka
अपूज्यायत्र पूज्यंते पूजनीयो न पूज्यते।
त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्।।
#शिवमहापुराण_रूद्रसंहिता_सतीखंड ३५/९
जहां अपूज्य की पूजा होती है, और पूज्य की की पूजा नहीं होती, वहाँ दरिद्रता, मरण और भय -- ये तीनों अवश्य होंगे।
जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे
जब अपनी अपनी मोहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे
वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था
उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे
अहमद सलमान
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रखते अगर्चे आँख को हैं नम उदास लोग
अश्कों में ज़ाया करते नहीं ग़म उदास लोग
तुम चाहतों वाले कभी ख़ुश हो कभी दुखी
हम इश्क़ वाले लोग हैं हर दम उदास लोग
~ भास्कर शुक्ला
ज़ियादा पास मत आना
मैं वो तहख़ाना हूँ जिस में
फ़क़त क़ब्रें ही क़ब्रें हैं
कहीं ऐसा न हो तुम भी
इन्हीं क़ब्रों में खो जाओ
इन्ही में दफ़न हो जाओ
मुहब्बत की हरारत खो के
बिल्कुल सर्द हो जाओ
सरापा दर्द हो जाओ
सो मेरे सादा-ओ-मासूम
मुझ को रास मत आना
ज़ियादा पास मत आना
रहमानफ़ारिस
बदन कजला गया तो दिल की ताबानी से निकलूँगा
मैं सूरज बन के इक दिन अपनी पेशानी से निकलूँगा
नज़र आ जाऊँगा मैं आँसुओं में जब भी रोओगे
मुझे मिट्टी किया तुम ने तो मैं पानी से निकलूँगा
मैं ऐसा ख़ूबसूरत रंग हूँ दीवार का अपनी
अगर निकला तो घर वालों की नादानी से निकलूँगा
ज़फ़र
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है
नई उम्रों की ख़ुद-मुख़्तारियों को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी✍️
जलकर बुझते लावे बहकर आख़िर पत्थर हो जाते हैं
नदियों को ठुकराने वाले साहिल बंजर हो जाते हैं
अपना आप बयां करने के सौ माक़ूल तरीक़ों में से
ख़ामोशी को चुनने वाले उम्दा शायर हो जाते हैं
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कनु प्रिया
क़हक़हा मार के हंसते हुए रोएंगे यहीं
दाग़ जो दिल पे लगा है उसे धोएंगे यहीं
जब तलक लौट के आता नहीं जाने वाला
दिन बैठेंगे यहीं रात में सोएंगे यहीं
ये जो हम सहरा लिए फिरते हैं अपने अन्दर
तिशनगी तुझको किसी रोज़ डुबोएंगे यहीं
- शकील आज़मी