कल छात्रों के साथ जो हुआ...
उस पर चुप रहना मुश्किल है।
आज कुछ सवाल हैं...
और ये सवाल सिर्फ छात्रों के नहीं, हर उस माँ-बाप के हैं जिनके बच्चे मेहनत करके अपना भविष्य बना रहे हैं।
मेरी पूरी बात एक बार ज़रूर सुनियेगा। 🙏
जहाँ संविधान की शपथ ली, आज वहीं संविधान का सम्मान बचाने बैठा हूँ।
मासूमों पर हुए अत्याचार के विरुद्ध अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ।
जय भीम, जय भारत।
#संसद_मार्च#जंतर_मंत्र
सोनम वांगचुक के अनशन के साथ ही वहीं एक और अनशन हुआ. @aisa के छह छात्रों का अनशन. इसने इस आंदोलन को जीवटता प्रदान की. कल जब जंतर मंतर पहुँचा, तो उनसे मिलकर हिम्मत ली. उनसे हौसला लिया. क्योंकि इन युवा विद्यार्थियों में हिम्मत और हौसला ही था जिसने तीन हफ़्ते यानी लगभग 22 दिन भूख हड़ताल करवा दिया. @neha_aisa और मनीष को लंबे अरसे से लड़ते क़रीब से देख रहा हूँ. इन्हें हमारी भी हिम्मत मिले.
शुक्र है आज भी बॉलीवुड में ऐसे सितारे हैं !
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच नसीरुद्दीन शाह अपने बेटों इमाद और विवान शाह के साथ पहुंचे।
उन्होंने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया, बस शांत भाव से खंभे के सहारे खड़े होकर प्रदर्शन देखा।
पुलिस कार्रवाई के बाद बिखरते छात्रों को भी गंभीरता से देखा। उनकी मौजूदगी ने वहां काफी ध्यान खींचा।
Seeking accountability, encouraging dialogue, and peaceful protests are hallmarks of a healthy democracy. But when peaceful protesters, seeking accountability are met with force and dissent is suppressed, it signals authoritarianism.
Whether it is the forcible removal of Sonam Wangchuk from Delhi's Jantar Mantar during his indefinite hunger strike demanding accountability over the NEET paper leak, the dismantling of a 15-day protest by Gond and Kol Adivasis in Madhya Pradesh's Chhatarpur district, who are facing displacement and were demanding fair rehabilitation, adequate compensation, protection of their land rights in the Ken–Betwa River Project, or the use of police force and lathi-charge against students protesting today, these incidents highlight the authoritarianism, silencing voices, dissent, and critical questions.
In his speech to the Constituent Assembly on November 25, 1949, Dr. Babasaheb B.R. Ambedkar warned that democracy requires constitutional methods for achieving social and political change. He cautioned against abandoning these methods in favour of extra-constitutional means, while also making clear that democratic institutions must remain responsive to the voices and grievances of citizens. A Constitution, in his view, could only succeed when those entrusted with power respected its spirit and not merely its written provisions.
Babasaheb also emphasised that political democracy cannot survive without the values of liberty, equality, and fraternity. The right to question authority, demand accountability, and peacefully express disagreement is central to preserving these values. For him, democracy was not only about majority rule; it was about ensuring that power remained accountable and that citizens retained the ability to challenge injustice.
A democracy is ultimately tested not by how it treats agreement, but by how it responds to disagreement!
Suppression of dissent has not worked well for those in power in the long run. Successive Congress governments, and now the BJP government have all restricted voices of opposition and curb dissent like the British Raj.
History shows that silencing questions and suppressing democratic expression does not strengthen authority; it only deepens public resistance and ultimately weakens those who attempt to impose authoritarian practices within a democracy.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पंत छात्रावास स्थित समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित आईएएस-पीसीएस प्री एग्जामिनेशन सेंटर छात्रावास में एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के छात्रों को अवैध बताकर जबरन छात्रावास खाली कराना, कमरों के ताले तोड़ना तथा बिजली-पानी काटना एनडीए सरकार की बहुजन विरोधी मानसिकता का एक और उदाहरण है।
छात्रों का कहना है कि उन्होंने वर्ष 2024 में प्रवेश लिया था तथा 13 सितंबर 2024 को उन्हें छात्रावास आवंटित किया गया। वर्ष 2025 में विश्वविद्यालय ने छात्रावास में नए प्रवेश की प्रक्रिया ही नहीं कराई और न ही नए आवेदन आमंत्रित किए। ऐसे में छात्रों का कहना है कि उनका आवंटन सितंबर 2026 तक वैध है।
बांग्लादेश में दलितों की दिखावटी चिंता करने वाले मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी, क्या इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पंत छात्रावास में एससी, एसटी एवं ओबीसी छात्रों के साथ हो रही ज्यादती आपको दिखाई नहीं देती?
हम @UPGovt से मांग करते हैं कि छात्रों का उत्पीड़न तत्काल बंद किया जाए, छात्रावास की बिजली-पानी की व्यवस्था तुरंत बहाल की जाए, वर्ष 2025 से लंबित छात्रावास प्रवेश प्रक्रिया तत्काल प्रारंभ की जाए तथा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के छात्रों की शिक्षा और सम्मान पर किसी भी प्रकार का हमला स्वीकार नहीं किया जाएगा।
@UoA_Official
यह सच में दिल को छू लेने वाला वीडियो है।
जंतर-मंतर पर CJP के विरोध-प्रदर्शन में शामिल दिव्यांग छात्र साइन लैंग्वेज के ज़रिए अपनी बात रखते हुए दिखे।
यह दृश्य बेहद मनमोहक है।
#WamanMeshram
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रख रहे विद्यार्थियों पर हुआ पुलिस लाठीचार्ज लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता का विषय है। ब्राह्मणवादी आरएसएस-बीजेपी सरकार के निर्देश पर उठाया गया यह कदम सरकार की गैर-जवाबदेही को दर्शाता है। युवाओं पर बल प्रयोग करना देश के भविष्य को अंधकार में धकेलने के समान है। हम सरकार की इस दमनकारी नीति का कड़ा विरोध करते हैं और छात्रों के प्रति दिखाई गई इस क्रूरता की घोर निंदा करते हैं।
#JantarMantar #StudentProtest #Delhi #StandWithStudents #YouthPower #VoiceOfYouth
📍 जंतर मंतर, दिल्ली
19 दिन से अनशन कर रहे सोनम वांगचुक से आज वंचित बहुजन आघाड़ी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बालासाहब आंबेडकर ने मुलाकात की।
#sonam_wangchuk#सोनम_वांगचुक
पेपर लीक होने पर बोले नगीना सांसद @BhimArmyChief चंद्रशेखर आजाद जी ने किया सवाल जिन बच्चों ने सुसाइड किया है क्या सरकार उनको वापस ला सकती है आज सत्ता में हम होते तो MBBS की पढ़ाई देता
एक सांसद बच्चों के भविष्य के लिए इतना सोच रहा है तो मुख्यमंत्री बन जायेगा तब क्या करेगा सोचो!
कितना भी अब दुष्प्रचार कर लो
कितना भी पूतना या सम्पूर्णखा लगा लो बदनाम करने को अब नहीं रोक सकते इस बंदे को।
लोगों के दिलों में जगह बना लिया है, इसके बगैर चुनाव जीतने की कल्पना करना ही बेकार है विपक्ष का।
केंद्र में सरकार बनानी है तो पीएम उम्मीदवार बहनजी को बनाओ।
28 जून 2026 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले की सलोन विधानसभा क्षेत्र के ग्रामसभा खेमराई निवासी मेवालाल पासी जी की निर्मम हत्या कर दी गई। पीड़ित परिवार का आरोप है कि गांव के ही जातिवादी लोगों ने पुरानी रंजिश के चलते सुनसान रास्ते में उन्हें रोककर जान से मारने की नीयत से कई बार वाहन चढ़ाया, जिससे उनकी मौत हो गई। मेवालाल पासी जी अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे।
पीड़ित परिवार के अनुसार जब उन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने की मांग की तो पुलिस ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। इसके विरोध में ग्रामीण धरने पर बैठ गए, जिसके बाद प्रशासन ने लगभग 250 पासी समाज के ग्रामीणों सहित 12 नामजद लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया, जिनमें आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के कार्यकर्ता भी शामिल हैं।
इस मामले की जानकारी मिलते ही मैंने 3 जुलाई को पीड़ित परिवार से बात कर उन्हें भरोसा दिलाया था कि न्याय की इस लड़ाई में हर कदम पर उनके साथ हैं। मैंने यह भी आश्वस्त किया था कि परिवार को न्याय दिलाने के साथ-साथ उन्हें हर संभव सरकारी सहायता दिलाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि उनके जीवनयापन और बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो।
आज रायबरेली पहुंचकर मेवालाल पासी जी के परिजनों से मुलाकात की, उनका दुख-दर्द साझा किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि इस अन्याय के खिलाफ हमारी लड़ाई अंतिम न्याय मिलने तक जारी रहेगी। दोषियों को कानून के अनुसार कड़ी से कड़ी सजा दिलाने और पीड़ित परिवार को न्याय एवं सम्मान दिलाने के लिए हर स्तर पर संघर्ष किया जाएगा।
"हम अपनी ज़मीन दिन-ब-दिन इंच-दर-इंच चीनियों के हाथों खो रहे हैं... बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र जो 2020 से पहले हमारी ज़मीन थे, अब चीनियों के कब्ज़े में हैं और उन्होंने पिछले पांच वर्षों के भीतर सेना की चौकियां स्थापित कर लिए हैं और अच्छी तरह से जुड़ी सड़कें बना ली हैं।"
ये मेरे शब्द नहीं हैं, बल्कि अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग स्थित नाह वेलफेयर सोसाइटी (NWS) के हैं। 26 जून 2026 को ऊपरी सुबनसिरी ज़िले के उपायुक्त को लिखे अपने पत्र में संगठन ने आरोप लगाया है कि भारत धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक सीमा क्षेत्रों पर नियंत्रण खोता जा रहा है। संगठन के अनुसार, जिन इलाकों का स्थानीय समुदाय 2020 से पहले चराई, शिकार, वन उपज संग्रह और अन्य पारंपरिक गतिविधियों के लिए स्वतंत्र रूप से उपयोग करता था, वे अब चीनी सेना के नियंत्रण में हैं। वहाँ चीनी चौकियां, सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी ढाँचे बनाए जा चुके हैं।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू भले ही चीनी घुसपैठ की बात को सिरे से नकार रहे हों, लेकिन 1 जुलाई 2026 की NDTV की रिपोर्ट और ताज़ा सैटेलाइट तस्वीरें साफ़ गवाही दे रही हैं कि चीन ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों में सड़क निर्माण और बुनियादी ढाँचे के विकास को युद्धस्तर पर तेज़ कर दिया है। सबसे गंभीर बात यह है कि कुछ चीनी निर्माण उपकरण और दो हेलीपैड सीधे तौर पर भारत की सीमा के भीतर ऊपरी सुबनसिरी ज़िले में दिखाई दे रहे हैं, जो भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ के दावों को पूरी तरह सच साबित करते हैं।
🔴 क्या भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार झूठ बोल रही है? क्या किरेन रिजिजू झूठ बोल रहे हैं?
🔴 मोदी की 'लाल आंख' को क्या हुआ? मोदी के '56 इंच के सीने' को क्या हुआ?
🔴 हम जानते हैं कि मोदी अमेरिका के इसारों पे मुजरा कर रहे हैं, लेकिन क्या वह चीन का खिलौना भी बन गए हैं?
🔴चुनाव जीतने के लिए 'घर में घुसकर मारेंगे' का नारा देने वाले नेता, आज चीन के हमारे घर में घुसकर हेलीपैड और सड़कें बनाने पर खामोश क्यों हैं?
🔴 क्या भाजपा का राष्ट्रवाद सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ रैलियों में दहाड़ने के लिए है? चीन का नाम लेते ही यह दहाड़ 'मौन व्रत' में क्यों बदल जाती है?
🔴 क्या सरकार के लिए अपनी राजनीतिक लाज बचाना, देश की सुरक्षा और ज़मीन से ज्यादा जरूरी हो गया है?
🔴 क्या सरकार का राष्ट्रवाद सिर्फ कुछ चीनी ऐप्स को बैन करने की नौटंकी तक सीमित है? क्या चीनी कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए देश की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है?
🔴 अरुणाचल के जो आदिवासी समुदाय सदियों से भारत के प्रहरी बनकर सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, आज जब उनकी अपनी जमीन छिन रही है, तो सरकार उन्हें झूठा साबित करने पर क्यों तुली है?
ये सारे सवाल किसी एक राजनीतिक दल के विरोध का नहीं है। यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता, जवाबदेही और भारत की सीमाओं की रक्षा करने की सरकार की संवैधानिक ज़िम्मेदारी का सवाल है। जब बात देश की सीमाओं की हो, तो सरकार की चुप्पी और इंकार दुश्मन के घुसपैठ से भी बड़े हथियार होते हैं!
जय भारत 🇮🇳
अगले साल तक इथोनॉल ब्लेंडिंग के रिजल्ट्स कुछ भी आए,
तब तक करोड़ों गाड़ियों में इथोनॉल और उस एथनॉल से आया मुनाफ़ा गड़करी जी के सुपुत्रों की जेब में जा चुका होगा।