कौन कहता है कि पुरुष खोज़ते हैं रूपवती स्त्री पुरुष वो तो एक सामान्य स्त्री के तलाश में हैं
जो विषम परिस्थितियों में साथ रहे और सहारा दे ग़र रोये तो कायर न समझ कर श्रद्धा और प्रेमभाव से चूम ले माथे को
और हर ले उसके दिल के तमाम दुख और पीड़ाओं को !
144 साल में एक बार…
ये लाइन भारी पड़ रही है। आम आदमी इसी में पगला गया है कि 2 पीढ़ी तो ये कुंभ देख नहीं पाएगी।
विवेकानंद जी ने भी 144 साल वाला प्रचारित कुंभ नहीं देखा,आप उनसे बड़े हिंदू हो गए हो? भक्ति होनी चाहिए अंधभक्ति नहीं।
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