फीफा हेड को सीधे सीधे ट्रम्प को हर अमेरिका वाले मैच में उतार देना चाहिए और सामने वाली टीम के सरे मेंबर को रेड कार्ड दे देना चाहिए! ट्रम्प आराम से गेंद ले जाकर गोल कर दें और अमेरिका कप जीत जाए!
जब करना है तो ऐसा करो! छोटा मोटा क्या करते हो!
जीत के बाद भाई लोग फिर पहुंच गए टाइम्स स्क्वायर। हालैंड ने इनको अपार खुशी और गर्व का अवसर दिया है। नॉर्वे की वर्ल्ड कप में पहले कभी इतनी हैसियत नहीं थी।
Norway की फुटबॉल टीम को सप्पोर्ट करने के लिए नॉर्वे के राजकुमार और राजकुमारी आए थे.
Haaland के गोल दागते ही राजकुमारी खुशी के मारे उछाल पड़ीं.
Human Development Index के मामले में Norway दूसरे स्थान पर है. यहां प्रधानमंत्री और चपरासी एक साथ चाय नास्ता करते हैं.
अमीर और मध्यवर्गीय परिवार के बच्चे एक ही स्कूल और एक ही क्लासरूम में पढ़ने का सरकारी नियम है.
आज 56 लाख की आबादी वाला Norway Civilzed मुल्क है. लेकिन 800 AD में इस देश की आबादी 3 लाख के करीब थी. तीन लाख लोग इतने खूंखार थे कि यूरोप तटीय इलाकों में जाकर जमकर लूटपाट और हिंसा करते.
तब दुनिया इन्हें Norwegian नही, Vikings के नाम से पुकारती थी.
कल ब्राज़ील के मैच से पहले नॉर्वे के कोच ने यह लिखा था।
‘आप नॉर्वे के किसी पुस्तकालय चले जाइए, वहाँ दर्जनों किताबें सिर्फ इस विषय पर मिल जाएँगी जब 1998 विश्व कप में नॉर्वे ने विश्व चैंपियन ब्राजील को हराया था। रोनाल्डो को वह मैच याद भी नहीं होगा, क्योंकि यह लीग मैच था, और ब्राजील यूँ भी फाइनल में पहुँच गयी थी। लेकिन नॉर्वे जैसे मामूली देश के लिए यह ऐसी उपलब्धि बनी, कि लोग आज तक उस मैच की रिकॉर्डिंग देखते हैं। मैं उस टीम में था, लेकिन मैं बेंच पर था। एर्लिंग हालांड के पिता उस विश्व कप में नहीं खेल पाए थे (*1994 में खेले थे)।
हमने तीस सालों तक यह रिकॉर्ड कायम रखा कि हम ब्राजील से कभी नहीं हारे, (हँस कर) दरअसल उस मैच के बाद हमने ब्राजील के साथ खेला ही नहीं। न ही हम विश्व कप में क्वालिफ़ाई कर सके।
कल जब नॉर्वे की टीम ब्राजील के ख़िलाफ़ उतरेगी, तो ब्राजील के लिए यह सामान्य मैच होगा। हमारे लिए यही बड़ी उपलब्धि है कि हम उस मुकाम तक पहुँचे कि ब्राजील के साथ खेल सकें। चाहे हम जीतें या हारें, नॉर्वे में एक बार फिर इस मैच पर किताबें लिखी जाएगी।’
अब यह मैच भी इतिहास में दर्ज हो गया !
(साभार डॉक्टर प्रवीण झा)
जब कोई पुरुष भीतर से टूटकर या ठानकर मौन हो जाता है, तो वह उन चीज़ों से भी दूरी बना लेता है जो कभी उसके लिए सबसे प्रिय हुआ करती थीं। यह उदासीनता हमेशा घमंड नहीं होती, कई बार यह थकान, आत्मसम्मान या अनकहे घावों का परिणाम होती है। तब वह चाहकर भी पहले जैसा नहीं रह पाता। ❤️🩹
इस वर्ल्ड कप की सबसे बदकिस्मत टीम ईरान है। बिना एक भी मैच हारे वर्ल्ड कप से बाहर हो गया ईरान। ईरान ने अपने तीनों गेम ड्रॉ खेले, ऐसा ही करके दूसरे ग्रुप में केप वर्डे नॉक आउट के लिए क्वालीफाई कर गया लेकिन ईरान बाहर हो गया।
तीन गेम्स में ईरान के तीन गोल रद्द किए गए, नियमों के मुताबिक सही ही रहा होगा रद्द करना लेकिन बदकिस्मती ही है ये। इजिप्ट के खिलाफ इंजरी टाइम में तो गोल मार कर ईरान सेलिब्रेट कर रहा था नॉक आउट में प्रवेश लेकिन ऑफ साइड घोषित हो गया एक प्लेयर और गोल नहीं माना गया।
तीसरे स्थान पर रही 8 टीमों को भी राउंड ऑफ 32 में प्रवेश मिलना था, ईरान की उम्मीद अब उसी पर टिकी थी लेकिन वहां भी अंतिम पलों में किस्मत धोखा दे गई।
आज फिर आखिरी आखिरी मिनट तक अल्जीरिया जीत रहा था ऑस्ट्रिया से और अगर ऐसा होता तो ईरान क्वालीफाई करता लेकिन अंतिम पलों में ऑस्ट्रिया ने गोल मार दिया और ईरान बाहर हो गया।
दो दिन में दो बार ईरान लगभग पहुंच गया था नॉक आउट स्टेज में और दोनों बार अंतिम पलों में निवाला छिन गया।
न्यूट्रल होकर देखें तो ईरान पूरे वर्ल्ड कप में फाइटर की तरह खेला। बेल्जियम को गोल न मारने देना जिस टीम में केविन डि ब्रायना और लुकाकू हों बहुत बहादुरी का काम था। मो सालाह की इजिप्ट को तो लगभग हरा ही दिया था ईरान ने।
ये सब तब किया ईरान ने जबकि पिछले दिनों उनका देश युद्ध में था, वर्ल्ड कप की पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाई, वीजा की परेशानी हुई, सपोर्टिंग स्टाफ में कुछ को वीजा नहीं मिला, टीम को अमेरिका में रुकने की इजाजत नहीं मिली,मैक्सिको को बेस बनाना पड़ा, अमेरिका में खेल कर उसी दिन रात तक लौटना होता था क्योंकि वहां रुकने की इजाजत नहीं थी, पर्याप्त अभ्यास मैच नहीं मिले।
बेल्जियम और इजिप्ट दोनों ईरान से बेहतर टीमें थीं, सिर्फ अपने जज्बे के बल पर लड़ा ईरान और क्या खूब लड़ा। फिर भी नॉक आउट स्टेज में नहीं पहुंच सका। ऐसा नहीं कि नॉक आउट में पहुंच जाता तो कोई चैंपियन बन जाता, अगले ही मैच में संभवतः हार जाता लेकिन मेहनत का इनाम होता राउंड ऑफ 32 में पहुंचना, वही इतिहास बन जाता और ईरान के लिए उतना ही बहुत था, पर किस्मत ने उतना भी न दिया अभागे ईरान को। फिर भी ईरान टीम के जज्बे की सराहना हर किसी को करनी चाहिए।
#Iran
वसीम बरेलवी साहब की इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह साहब ने अमर कर दिया।
अक्सर ये ग़ज़ल सुनता हूँ और सोचता हूँ कि इसमें ज़्यादा बड़ा जादू किसका है, लेखक का या गायक का ?