प्राचीन काल में दुनिया में सिर्फ 3 सभ्यताओं में विज्ञान फला-फूला: हिंदू-बौद्ध सभ्यता, ग्रीस-रोमन सभ्यता और चीन की सभ्यता.
भारत को अतीत के गौरव से और बाहरी आक्रमण में सभ्यता के विनाश से क्या सीखना चाहिए. जानिए वरिष्ठ आईएएस शशि रंजन कुमार से. @DDNewsHindi पर.
Jio वालों कान खोलकर सुन लो 5g अनलिमिटेड का प्लान तुम अपने पास रखो नहीं चाहिए अब
15 अगस्त को रिचार्ज खत्म हो रहा है अब जीवन में कभी jio में रिचार्ज नहीं कराउंगी
और सबसे घटिया नेटवर्क तुम्हारा ही है सुन लो 😡
मैने जिओ नेटवर्क को लेकर मई में complain किया था तो 19 मई को हमारे घर पर 3 लोग आए थे
उन्होंने हमसे कहा था कि 5G पर काम चल रहा है और ये काम 1 महीने में पूरा हो जाएगा
अब लगभग 3 महीना होंगे वाला है मगर नेटवर्क देख लो इतना घटिया है
ये जिओ कंपनी बहुत ही घटिया है
मुझसे हर महीने 5g का प्लान बताकर रिचार्ज का पैसा लेता है और 4g भी ढंग से नहीं पकड़ता है
सुधर जाओ jio वालों झूठ की बनाई दीवार ज्यादा दिन नहीं टिकती है
अगर 5g का प्लान बेचते हो तो 5 g का नेटवर्क भी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी रखो
नहीं तो साफ मना कर दो
@reliancejio@JioCare
लाखों करोड़ की संपत्ति होने के बाद टाटा-बिड़ला-डालमिया आलसी नहीं हुए और उनकी कमाने की चाहत खत्म नहीं हुई तो दस-बीस हजार आने पर गरीब आदमी आलसी कैसे हो जाएगा?
वे गधे हैं जो कह रहे हैं कि सरकार हर साल जो 7.5 लाख करोड़ रुपए सीधे जनता को दे रही है, या अनाज या फ्री मकान या गैस या खाद पर सब्सिडी दे रही है, उससे लोग आलसी हो जाएंगे.
ऐसे विश्लेषक न सिर्फ अनाड़ी और मूर्ख है, बल्कि उनको मानव स्वभाव और अर्थव्यवस्था की कोई जानकारी नहीं है.
जब किसी के पास पैसा आता है तो उतने से संतुष्ट नहीं होता है बल्कि और ज्यादा की चाहत करता है.
गरीबों को पास पैसा आने से एक चक्र शुरू होता है जिससे डिमांड बढ़ती है और गरीब कुछ दिनों बाद गरीब नहीं रह जाता.
वह आर्थिक चक्र का हिस्सा बन जाता है.
भारतीय मार्केट इन करोड़ों गरीब लोगों के मिडिल क्लास में आने का इंतजार कर रहा है. सरकार ने इस काम में अपना थोड़ा सा योगदान दिया है, इस कारण मिडिल क्लास बड़ा हुआ है.
गरीबी को जड़ से मिटाने का दायित्व इतिहास ने @narendramodi को सौंपा है. वे बस अपना काम कर रहे हैं.
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यह तर्क ओबीसी (OBC) समाज के मजबूत सामाजिक स्वाभिमान और ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित करता है। हालांकि, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान के दृष्टिकोण से इस विचार के विपक्ष में कई मुख्य काउंटर-आर्गुमेंट (Counter-arguments) दिए जाते हैं:
1. "OBC" एक आधुनिक संवैधानिक श्रेणी है, न कि प्राचीन एकीकृत पहचान
* ऐतिहासिक रूप से एकरूपता का अभाव: प्राचीन और मध्यकालीन भारत में "ओबीसी" नाम की कोई एक वर्ग-पहचान नहीं थी। यह स्वतंत्र भारत में मंडल आयोग और संविधान के तहत बनाई गई एक सामाजिक-आर्थिक और प्रशासनिक श्रेणी है।
* विविधता और आंतरिक विभाजन: ओबीसी में शामिल सैकड़ों जातियां (किसान, कारीगर, पशुपालक) अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरी हुई थीं। इसलिए, इतिहास में उन्हें एक संगठित वर्ग के रूप में देखना समाजशास्त्रीय रूप से सटीक नहीं माना जाता।
2. वर्ण व्यवस्था और सामाजिक संरचना (Sanskritization)
* शूद्र वर्ण और सामाजिक श्रेणीबद्धता: परंपरागत हिंदू सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था (शास्त्रों और क्षेत्रीय व्यवस्था) में अधिकांश उत्पादक जातियों (कृषक, पशुपालक और कारीगर) को वर्ण व्यवस्था के तहत 'शूद्र' वर्ग में रखा गया था।
* संस्कृतीकरण (Sanskritization): प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, 19वीं और 20वीं सदी में कई पिछड़ी जातियों द्वारा क्षत्रिय या ब्राह्मण वंशावली का दावा करना सामाजिक गतिशीलता का प्रयास (Sanskritization) था। यह इस बात का प्रमाण है कि ऐतिहासिक रूप से उन्हें वह सामाजिक दर्जा प्राप्त नहीं था, जिसके वे हकदार थे।
3. पतन के कारण: केवल मुस्लिम आक्रमण या सामंती/औपनिवेशिक व्यवस्था?
* सामंती और जातिगत उत्पीड़न: ओबीसी जातियों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का कारण केवल मध्यकालीन मुस्लिम शासन नहीं था। प्राचीन काल से चली आ रही सामंती व्यवस्था, भूमि पर असमान अधिकार और जाति-आधारित श्रम विभाजन ने भी इन जातियों को संसाधनों से वंचित रखा।
* अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियां: ब्रिटिश काल की जमींदारी और रैयतवाड़ी व्यवस्था ने भी कृषक और कारीगर जातियों को आर्थिक रूप से कमजोर किया और भूमिहीन बनाया।
4. क्रांति न करने के वास्तविक कारण: लोकतांत्रिक अधिकार और आर्थिक हित
ओबीसी समाज ने सशस्त्र या वामपंथी क्रांति की जगह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाया, इसके मुख्य कारण हैं:
* भूमि सुधार और हरित क्रांति: आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और हरित क्रांति से मध्यवर्ती कृषक जातियों (जैसे यादव, कुर्मी, जाट, वोक्कालिगा आदि) के पास भूमि स्वामित्व आया और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
* लोकतांत्रिक सशक्तिकरण (Mandal Politics): 1970 और 1980 के दशक के बाद राममनोहर लोहिया के समाजवाद और मंडल राजनीति के माध्यम से ओबीसी जातियों को मतपत्र (Ballot Paper) की ताकत समझ आई। जब सत्ता चुनाव के जरिए मिल सकती थी, तो उन्हें नक्सलवाद या वामपंथी हिंसा का रास्ता चुनने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
* 'प्रभुत्वशाली जातियां' (Dominant Castes): ग्रामीण इलाकों में कई ओबीसी जातियां सामाजिक और राजनीतिक रूप से खुद ताकतवर (Dominant) थीं, इसलिए वे व्यवस्था को बदलने के लिए क्रांति करने के बजाय व्यवस्था के भीतर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में विश्वास रखती थीं।
> निष्कर्ष:
> ओबीसी जातियों का वामपंथी क्रांति या नक्सलवाद की ओर न जाना उनके ऐतिहासिक स्वाभिमान, भूमि स्वामित्व और भारतीय लोकतंत्र में मतपत्र (Ballot) के जरिए मिली राजनीतिक सफलता का परिणाम है, न कि केवल इस कारण कि वे प्राचीन काल से निर्विवाद शासक वर्ग थे।
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