"लोकसभा में आपकी संख्या भले ही एक हो लेकिन उस एक के पीछे लाखों-करोड़ों लोग खड़े हैं। अगर आरक्षण विरोधियों को दिन में तारे न दिखा दिये तो कहना" मऊ की धरती से गरजे
@BhimArmyChief
चन्द्रशेखर आजाद, आरक्षण विरोधियों को चेतावनी 🚨📷
मऊ जिले की मधुबन विधानसभा सीट पर नगीना सांसद @BhimArmyChief चन्द्रशेखर आजाद की रैली में उमड़ा भारी जनसैलाब 🚨👇🏻
सीमित संसाधनों व बिना मजबूत प्रचार तंत्र के बावजूद चन्द्रशेखर आजाद को सुनने के लिए जो हुजूम उमड़ रहा है, वो यह बता रहा है कि 2027 में परिवर्तन होने जा रहा है।।
जातिवाद के खिलाफ मुखर होकर अपनी कहानी कह रहीं मंजिमा संडील को सुनना चाहिए।
जाति पर बात करने वालों को चुप कराने से जाति खत्म नहीं होगी।
सच सुनने का साहस ही बदलाव की पहली शर्त है।
उनकी कहानी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जिसे हमें देखने और समझने की जरूरत है।
#मंजिमा
सावित्रीबाई फुले पर गोबर फेंकने की मानसिकता आज भी जिंदा है। नेहा पर फेंकी गई स्याही उनके विचारों को नहीं रोक सकती। चे���रे पर स्याही फेंकी जा सकती है, इतिहास लिखने वाले हौसलों पर नहीं।
@neha_aisa
#neha #jaybhim #victory
दलित नेता दलितों का नेता और ब्राह्मण नेता पूरे समाज का नेता ?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह नैरेटिव सबसे ज्यादा बहुजन समाज को नुकसान पहुंचा रहा है.
चंद्रशेखर आजाद ने भी एक बड़ी लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की, कुल 5,12,552 वोट प्राप्त किया.
आजाद समाज पार्टी के नेता हैं. UP के 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव सभी 400 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
लेकिन मीडिया ने चंद्रशेखर आजाद को उस तर�� प्रोजेक्ट नही किया जैसे प्रशांत किशोर को कर रही है.
प्रशांत किशोर ने एक छोटी सी विधानसभा में 64,151 वोट पाकर जीत हासिल की है. मीडिया ऐसे गुणगान कर रहा मानो प्रशांत किशोर इस देश के बहुत बड़े नेता हैं. इस मानसिकता को जातिवाद कहा जाता है.
सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा के लिए सदैव संघर्षरत आदरणीय राहुल गांधी जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। हम आपके उत्तम स्वास��थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं।
@RahulGandhi
छत्तीसगढ़ में महिलाओं और बच्चियों के लापता होने का मुद्दा एक बा��� फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के अध्यक्ष @AmitJogi ने 96 हजार से अधिक महिलाओं और बालिकाओं के लापता होने का दावा करते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। आंकड़ों की सत्यता और समयावधि की जांच अलग विषय हो सकती है, लेकिन यह सच है कि लापता बच्चों और महिलाओं के मामले किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। हर लापता व्यक्ति के पीछे एक परिवार का दर्द और वर्षों की प���रतीक्षा छिपी होती है। ऐसे मामलों को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत��यारोप तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी आंकड़े सार्वजनिक करे, जांच एजेंसियों को जवाबदेह बनाए और मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों पर सख्ती से कार्रवाई करे।
सवाल केवल विपक्ष के आरोपों का नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों का है जो आज भी अपने घर लौटने वाले कदमों की आहट सुनने का इंतजार कर रहे हैं।