विजयादशमी का डंडा
हर साल संभालता है
अनगिनत शरीरों को।
विजयादशमी का डंडा
बनाए रखता है भीड़ का प्रवाह
बस एक ही दिशा में
वह पूरा ध्यान रखता है
छिटक न जाए एक भी श्रद्धालु
दाएँ या बाएँ।
विजयादशमी का डंडा
मैला हो चुका है
इतना हाथों के स्पर्श से
और कमज़ोर भी
आखिर बीस सालों से
हर बार ट्रक पर ढ़ोया जाता है
लाया जाता है और पटक दिया जाता है
हर बार
एक थोड़ी सी नई
थोड़ी सी पुरानी भीड़ पर।
आश्चर्य,
भीड़ इतने कमज़ोर डंडे को भी तोड़ नहीं पाती
अरे इस साल तो
डंडा खुद ही
चरमरा गया है
पर कुछ वृद्ध मुखों
और कुछ नौजवान हाथों
का सहारा पा
वह दुबारा टँगा है अपनी जगह पर
बेचारा डंडा ।
जानता है वो,
एक बार वह टूटा नहीं,
कि पुजारी को दूसरा डंडा न मिलेगा,
पुराने जंगल नई दुनिया ने
बड़ी बेरहमी से साफ़ कर दिये हैं।
डंडा डटा हुआ है
तब भी
जब उसे अतीत में खो जाना चाहिए था
पर अब
अब डंडा बहुत जी चुका
किसी बेघर बूढ़े की चिता के साथ
वह जल जाना चाहता है
भीड़ का दबाव इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है ।
~ प्रशान्त (१०.१०.९७, दशहरा)
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*परिवर्तन*
सामान्य कहावतों में हमनें सुना है कि परिवर्तन संसार का नियम है। बच्चा पैदा होने से लेकर बूढ़ा होने तक बदलता रहता है। ये सुनो तो लगता है सच में हम बदल रहे हैं।
पर बचपन से पचपन तक अहंकार केवल विषय बदलता है पर उसकी जिंदगी के पुराने ढर्रे, उसकी मान्यताएं, नहीं बदलती।
वास्तविक बदलाव केवल बाहरी विषयों को नहीं बदलता वो अहंकार को भी बदल देता है। जो अहंकार पहले स्थिर था या और फूल रहा था वो क्षीणता की ओर, पतले होने की दिशा में गति करने लगता है।
*BEFORE* 👇
आचार्य जी की शिक्षाओं से पहले तक त्यौहार का मतलब मेरे लिए था खुद के बाहरी रूप को सजाना, नए कपड़े, नए गहने लेना। जो भीड़ कर रही है उसे ही सही मानकर उस पर चलना, त्यौहार मतलब घरो की सफाई करना, पकवान बनाना, और अपनी मान्यताओं को फॉलो करना।
ये सब करने में पहले तो मेरे बहुत सारे पैसे खर्च हो जाते थे। फिर बहुत ज्यादा ऊर्जा इनमें चली जाती थी। और परिणाम में, अंदर का खालीपन कभी नहीं भरता था, और अगले त्यौहार या विषय के आने का इंतजार करती उस खालीपन को भरने के लिए।
*AFTER* 👇
आचार्य जी की शिक्षाओं से जुड़ने के बाद सजने का मतलब समझ आया कि केवल शरीर को बाहरी कपड़े, गहने और मेकअप से भरना सुंदरता नहीं है, जहां लगातार अहंकार जितना अनुपस्थित होगा सुंदरता उतनी अधिक होगी।
भीड़ का पीछा करना छूट गया, क्योंकि अब सवाल उठने लगे कि ये क्यों, और क्या? और जहां जहां से क्यों और क्या का जवाब नहीं मिला उस भीड़ का साथ छूटता गया।
त्यौहार मतलब किसी विशेष दिनों में खुद को सजाने से ज्यादा रोज शरीर को मजबूत बनाना हो गया, घर की सफाई से पहले अहंकार की सफाई ज्यादा जरूरी हो गई, और मान्यताओं को फॉलो करने से ज्यादा जरूरी खुद का भ्रम तोड़ना और लोगों के बीच जा जा कर उन्हें उनके भ्रम से परिचित करवाना हो गया।
परिणाम में आर्थिक दृष्टि से तो सबसे बड़ा लाभ हुआ है कि मेरे बहुत सारे पैसे बचने लगे, जिन्हें मै सिर्फ अहंकार की संतुष्टि के लिए खर्च करती थी।
और परिणाम में जो भीतरी लाभ हुआ वो है खालीपन मिटता गया क्योंकि मौज आने लगी। न किसी विशेष दिन या त्यौहार की आवश्यकता है कुछ भरने के लिए, न किसी व्यक्ति या किसी विषय की।
जितनी बार मैं आचार्य जी के ऑफलाइन सत्रों को अटेंड करके आती हूं, उतनी बार और निखर जाती हूं। और स्पष्टता आती है। और नया सीखती हूं जिससे और ऊपर उठती जाती हूं।
आचार्य जी 🙏
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आचार्य जी, मेरे जीवन में आने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏
ऐसा लगता है जैसे मैं हर दिन बदल रही हूँ। हर दिन मैं अपने भीतर के छिपे हुए दोषों, मान्यताओं और डरों को पहले से ज़्यादा गहराई से देख पा रही हूँ।
इस साल पहली बार मैं त्योहारों का सच में मतलब समझ रही हूँ। ये त्योहार मेरे सामने आईने की तरह आ रहे हैं, और मुझे अपने जीवन और उसके उद्देश्य को और गहराई से समझने में मदद कर रहे हैं।
पहली बार मेरे भीतर दशहरा और दिवाली के लिए सच्चा उत्साह उठ रहा है। इसकी वजह यह है कि इन त्योहारों के ज़रिए आप हमें अपनी प्रवृत्तियाँ और गहराई से देखने में मदद कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे आईना वह दिखाता है जो हम अपने भीतर अक्सर नहीं देख पाते।
जीवन में मैं नई चीज़ें सीख रही हूँ। पहले मैं बहुत सारी चीज़ों से डरती थी, पर अब मैं सुबह स्कूटी चलाने लगी हूँ। मैंने जिम जाना शुरू किया है, थोड़ा संगीत सीख रही हूँ, और अगले महीने बैडमिंटन की क्लास में दाखिला लेने की योजना है।
जीवन सच में जीवन जैसा लगने लगा है, ऊर्जा और जीवंतता से भरा हुआ।
आप हमें हमेशा याद दिलाते रहे हैं कि हम जहाँ भी हों और जो भी कर रहे हों, सामने के काम में अपना सौ प्रतिशत दें। जो भी कर रहे हों, उस पल में पूरे मन और पूरे अस्तित्व से करें।
दिल की गहराई से आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आचार्य जी। धन्यवाद शब्द मेरी कृतज्ञता के लिए बहुत छोटा लगता है। 🙏❤️
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अवलोकन -
जितना खुद को तोड़ोगे उतना ही निखरोगे । ऐसी चोट शुभ होती है जो आपको निखारे । चाहे फिर जिम हो या काम हो । घबराना नहीं है इस टूट फूट से ।
ये टूट फूट अच्छी है । हां ,दर्द होता है पर अच्छा है ऐसा दर्द । टूटोगे तभी पता चलेगा कि कितना हम दर्द झेल सकते है ।खुद को चुनौती दो ।
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अवलोकन: काम बदला, तो जीने का तरीका भी बदल गया
पहले भी काम करता था। अलग-अलग कंपनियों में काम किया, अपना बिज़नेस भी किया। व्यस्तता की कमी नहीं थी। अक्सर लगता था कि जीवन में बहुत कुछ करना है, लेकिन समय ही नहीं है।
जिम जाना है, खेलना है, सेहत का ध्यान रखना है, अच्छा खाना खाना है, किताबें पढ़नी हैं। पता था कि ये सब ज़रूरी है, लेकिन कभी समय का बहाना होता था, कभी मन नहीं करता था।
अजीब बात यह थी कि पहले काम के घंटे भी तय थे, वीकेंड पर छुट्टी भी थी, फिर भी अपने लिए कुछ नहीं कर पाता था। काम इतना उबाऊ लगता था कि सारी ऊर्जा उसी में खर्च हो जाती थी। किसी तरह काम पूरा करो, घर जाओ, सो जाओ और अगले दिन फिर वही दिनचर्या।
लेकिन जब से संस्था में काम कर रहा हूँ, जीवन जीने का तरीका ही बदल गया है।
अब काम करते हुए समय का पता नहीं चलता और साथ-साथ बाकी चीज़ें भी सहजता से हो जाती हैं। दिन में काम, शाम को जिम, रात में खेलना, किताबें पढ़ना और अपनी सेहत व खानपान का ध्यान रखना।
सत्र वाले दिनों में रात देर तक सत्रों में समय बीतता है। और जिन रातों में सत्र नहीं होते या परीक्षा अथवा एक्सक्लूसिव सत्र होते हैं, उन दिनों भी सत्र के बाद साथियों के साथ खेलने निकल जाते हैं। कई बार खेलकर लौटते-लौटते रात के दो-तीन बज जाते हैं और अगली सुबह फिर काम पर जाना होता है।
यह सब लिखते हुए लगता है कि दिनचर्या कितनी व्यस्त है, लेकिन वास्तव में यह उतनी बोझिल नहीं लगती। शायद इसलिए कि यहाँ केवल काम नहीं होता, काम के साथ जीवन भी चलता रहता है।
इसमें माहौल और साथियों की भी बड़ी भूमिका है। लोग एक-दूसरे को खेलने, किताबें पढ़ने, परीक्षा देने और सत्र सुनने के लिए प्रेरित करते हैं। जो चीज़ें पहले खुद को समझाकर करनी पड़ती थीं, वे अब दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बन गई हैं।
पहले लगता था कि इन सबके लिए अलग से समय निकालना पड़ेगा। अब समझ आता है कि केवल समय होना ही काफ़ी नहीं है। काम की प्रकृति, आसपास का माहौल और साथ रहने वाले लोग भी तय करते हैं कि हम अपने समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं।
एक बात और महसूस हुई है। जब दिन का बड़ा हिस्सा किसी सार्थक काम में बीतता है, तो व्यर्थ की चीज़ों में उलझने का अवसर भी कम हो जाता है। हर बार खुद से लड़ना नहीं पड़ता, ध्यान स्वाभाविक रूप से दूसरी दिशा में लगा रहता है।
पहले भी व्यस्त था, आज भी हूँ। फर्क शायद इतना है कि पहले काम मेरी ऊर्जा ले लेता था, अब काम के साथ ऊर्जा भी मिलती है।
मैं अभी भी सीख रहा हूँ, लेकिन पिछले कुछ महीनों में आया यह बदलाव साफ़ दिखाई देता है।
शायद जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमेशा समय बढ़ाने की ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी सही काम और सही माहौल खोजना ज़रूरी होता है, जहाँ जीवन की ज़रूरी चीज़ों के लिए समय अपने आप निकलने लगे।
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🪔 *गीता सत्रों में भारतीय खिलाड़ियों की सहभागिता | सभी को शारीरिक बल अर्जित कर संघर्ष और ईमानदारी की प्रेरणा*🔥
🪔 कल वेदांत संहिता सत्र में हमारे तीन भारतीय एथलीट्स का आगमन हुआ था।
इनमें हैं :
🚣 *भारतीय रोइंग (नौकायन) एथलीट्स सलमान खान और सतनाम सिंह;*
🥉 इन्होंने एशियन गेम्स 2026 (आइची-नागोया, जापान) में पुरुषों की डबल स्कल्स स्पर्धा में कांस्य पदक (Bronze Medal) जीता है।
🥋 *भारतीय कुराश खिलाड़ी पिंकी बलहारा;*
🥉 इन्होंने एशियन गेम्स 2026 में महिला 78 किलोग्राम भारवर्ग में कांस्य पदक (Bronze Medal) जीता है।
🏅 इसके पहले भी अन्य सत्रों में अन्य भारतीय एथलीट्स भी शामिल हुए हैं।
🏆 सभी ने ऐतिहासिक रूप से ऐसे खेलों में अपना दमखम दिखाया और लोहा मनवाया है।
🔥 संस्था द्वारा यह शानदार प्रयोग न सिर्फ गीता कम्युनिटी से जुड़े लोगों को शारीरिक बल अर्जित करने के लिए प्रेरित कर रहा है! बल्कि भारत में खेलों के माध्यम से मजबूत लोग तैयार करने की नींव रख रहा है।
🪔 जो गीता कम्युनिटी के बाहर तक प्रकाशवान हो रहा है।
💪 एथलीट्स को सत्रों में सम्मान देना और गीता प्रतिभागियों के सीने में ज्वाला भरना एक शानदार माध्यम है।
🫵 अब हमारी बारी; कि सिर्फ तारीफे नहीं बल्कि उस पर काम शुरू किया जाए।
अपने मन के साथ तन को भी मजबूत बनाएं।
✊ जीवन में कठिनाइयों के आगे; साहस और ईमानदारी से संघर्ष करें।
🪔 जैसा कि आचार्य जी कहते हैं;
✨ शारीरिक मजबूती अध्यात्म में बहुत सहायक है।
🍃 *मन के लिए अध्यात्म और तन के लिए व्यायाम।* 💪
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माउंटेन ट्रेकिंग 🌄
पिछले लगभग एक महीने से स्वयं को माउंटेन ट्रेकिंग के लिए तैयार कर रही थी।
यह ट्रिप और ट्रेकिंग 10 दिनों की थी परंतु इससे पहले कई ट्रायल हुए ।
जिनमें कुछ में तो कलेजा मुंह को आ गया ।
टाइमलाइन दौड़ में तो अंदर से रोना आ रहा था ।
पैरों का दर्द तो सतत चलता ही रहा ।
सुबह 4:30 से सफर शुरू होता था और 2 घंटे तक लगातार शारीरिक फिटनेस संबंधी गतिविधियां करवाई जाती थी।
हर रोज लगता था क्यूं झेल रही है इतनी पीड़ा, जबकि यह अनिवार्य नहीं बल्कि स्वैच्छिक था ।
यह पहली बार था जब खुद को शारीरिक फिटनेस के तल पर परखा।
स्वयं को कई स्तरों पर कमजोर पाया और काम करना शुरू किया।
कम्यूनिटी के ही एक सदस्य राहुल जी से भी वीगन डाइट संबंधी सुझाव लिए।
ऊंचे ऊंचे पहाड़ और गंगा के उत्पत्ति स्थल का नजारा अद्भुत था । शांत और मजबूत पहाड़ ठहरने पर विवश कर रहे थे।
सतत बहती भागीरथी और अन्य नदियां किसी जगह रूक जाने को प्रतिबंधित करती प्रतीत हो रही थी।
पानी इतना साफ की नदियों से सीधे ले रहे थे।
पहली बार कुछ दिनों तक आउट औफ नेटवर्क रहने का अनुभव भी सुकून देने वाला था
यहां तक की नेटवर्क में आने के बाद भी किसी अपने से बात करने की कोई जल्दबाजी नहीं थी।
माउंटेन लाईफ ने जरूरत और विलासिता के बीच के अंतर को भी बारीकी से समझाया ।
मेरे लिए यह सफर 2024 में आचार्य जी के आने से जिंदगी की एक नई परिभाषा से ही उपजा था
जिसमें सुरक्षा को दरकिनार करते हुए चुनौतियों को निमंत्रण देना ही जीवन का पर्याय बन गया था ।
मैंने पहले दिन ही खुद से कहा था कि मैं खुद से पीछे नहीं हटूंगी, बेशक यदि मैं इनके क्राईटेरिया को पूरा नहीं कर पाती तो ये लोग ही मुझे निकाल दे।
जब जब लगा बहुत दर्द हो रहा है तब दर्द और दुःख के बीच के अंतर को समझने का प्रयास किया।
आचार्य जी दर्द के क्षणों में हमेशा जहन में थे कि पीछे हट गई तो क्या मुंह दिखाएगी ।
जिंदगी में अब यही बेपरवाही अच्छी लगने लगी है।
कोई डर नहीं चोट लगेगी या दर्द होगा
बस जहन में यही रहता है जो होगा देखा जाएगा।
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Posted by Santosh Choudhary on Acharya Prashant App.
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मैं अपने माता-पिता के घर गया था और माँ के लिए भक्ति वाली किताब लेकर गया।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
मुझे नहीं पता कैसे, पर किताब की शुरुआत से ही माँ बहुत भावुक हो गईं।
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Posted by Atul Goyal on Acharya Prashant App.
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*नमस्ते आचार्य जी*
*आपको आज बहुत पास से देखा और आज का सत्र मेरे लिए बहुत अलग था।*
क्योंकि आज उन बातों को समझ पा रही थी, जिन पर पहले इतनी गहराई से सोचा ही नहीं।
आपको प्रत्यक्ष सुनने के बहुत अवसर मिल रहे हैं और हर बार कुछ टूट रहा है, कुछ बेचैन कर रहा है।
जो ज़िंदगी जीती आई हूँ, उस पर सवाल उठ रहे हैं और फिर रात में नींद नहीं आ रही है।
*अभी सुबह के 5 बज गए हैं, लेकिन नींद नहीं आ रही है, आचार्य जी।*
आज समझ आ रहा है कि प्रत्यक्ष सत्र का कितना महत्व है।
प्रत्यक्ष सत्र आपको पूरी तरह चोट करता है, बेचैन करता है, तोड़ता है और जितने ज़्यादा प्रत्यक्ष सत्र, उतनी ही उस कीचड़ भरे जीवन से घृणा होने लगती है।
*मैं खुद को देख पा रही हूँ, रोज़ मेरे व्यवहार में आते हुए बदलाव को।*
मुझे 6 महीने होंगे आपके साथ काम करते हुए, लेकिन अवलोकन से बचती थी। बस सेशन नोट्स पोस्ट करती थी, लेकिन कल से अवलोकन लिखने के लिए मुझे आतुरता हो रही है।
ये बदलाव मेरे लिए बिल्कुल नया है, आचार्य जी।
*आज के सत्र से मेरी सीख - सही दर्द का चुनाव करो।* और मैं करने की कोशिश कर रही हूँ, आचार्य जी।
रोज़ एक विरोध आता है काम के प्रति, लेकिन फिर वही जीवन याद करती हूँ कि कैसे फँसी हुई थी और फिर से काम करने के लिए ऊर्जा मिलती है।
रोज़ रोना आता है। लेकिन रो लेती हूँ और फिर से काम में लग जाती हूँ।
ये आपने मुझे क्या से क्या बना दिया, आचार्य जी।
मैं एक तथाकथित समाज की अच्छी लड़की थी।
और उस बोझ को ढोने के लिए मुझे अपना कितना समय बर्बाद करना पड़ा।
आज भी कहीं न कहीं वही स्वभाव सामने आता है, जहाँ मैं पहले की तरह बर्ताव करती हूँ, तथाकथित अच्छी बच्ची की तरह, लेकिन फिर आपका चेहरा सामने आता है और फिर संभल जाती हूँ।
*धन्यवाद आचार्य जी, मुझे मुझसे बचाने के लिए।*
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Posted by Shreya Sontakke on Acharya Prashant App.
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साधो ये मुर्दो का गॉंव
पीर मरे पैगंबर मरि है
मरि है जिन्दा जोगी
राजा मरि है परजा मरि है
मरि है बैद और रोगी
साधो ये.............
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Posted by Renu yadaw on Acharya Prashant App.
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पलट कर देखती हूं तो साफ दिखाई देता है कि अतीत पर जो कमी पूरी तरह अपना शिकंजा जकड़े थी, वो थी - खुद का खुद से अपरिचित रहना।
जीवन में सारी बेकार की भाग-दौड़ का सबसे बड़ा कारण, ये एक कमी थी कि मेरा खुद से ही परिचय नहीं था।
अपनी काबिलियत दुनिया को समझाने के लिए जो तत्परता हमेशा दिखाई, साथ ही जो ऊर्जा मैंने बर्बाद की, वो कितनी खोखली थी, ये साफ़-साफ़ देख पा रही हूं।
आचार्य जी आपसे जुड़ने के बाद गंदगी का पहाड़ दीखा अपने अंदर।
ये वो कचरा था जिसकी बदबू से मैं खुद ही ज़बरदस्त परेशान रहने लगी।
चूंकि आसपास वालों के साथ ही रहने की आदत पड़ी थी, तो शुरू-शुरू में मेरे समझाने पर जब नहीं समझते तो बड़ी चिढ उठती थी।
सत्रों के साथ मजबूती से जुड़े रहने के कारण बातें और गहराई से समझ आने लगीं कि मेहनत स्वयं पर करनी सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।
यह पहला साल होगा जब दिवाली वाले दिन हमेशा की तरह पूरा घर लोक धार्मिक तरीके से, पंडित से पूजा करवा कर दीवाली मनाएगा परंतु मैं घर पर नहीं रहूंगी।
खुलकर बोलने की क्षमता विकसित हुई है तो उसका एकमात्र कारण आचार्य जी आप हैं।
आपने समझाया असली धर्म क्या होता है, वरना मैं तो नैतिकता और लोकधर्म का चोगा ही ओढ़े थी।
अपने असली स्वभाव के ऊपर जितनी परतें चढ़ गई हैं, उनको कुरेद- कुरेदकर उतारना, मिटाना, घटाना आपने सिखाया।
आपने बताया, कि यही एकमात्र काम है, यही धर्म है और यही प्रेम है।
लोक धर्म के हिसाब से दिवाली मनाना अब मुझे मंजूर नहीं।
अब मैं ये सवाल पूछती हूं कि यदि ये धार्मिक त्योहार है तो बताओ इसमें धर्म कहां है?
लोग चुप्पी साध लेते हैं।
भेड़ बनकर भीड़ के साथ चलने की इनको बीमारी हो गई है।
ऐसों का साथ देना मुझे मंज़ूर नहीं।
सोना-चांदी, मिठाई, मान्यता-प्रथा, नात-रिश्तेदार और भी बहुत कुछ है, मगर सब मिलकर भी मुझे अब दिवाली को अधार्मिक तरीके से मनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।
क्योंकि आपने सिखाया है कि, तुम खुद अकेले भी अपने आप में काफ़ी हो, पर्याप्त हो।
मिटते चलो, बढ़ते चलो!
जीवन की 63 साल मैंने बर्बाद कर लिए मगर अब और नहीं !
अब और सड़-सड़कर नहीं मरूंगी।
इतना जीवन बर्बाद कर लिया, कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।
"विरहिनि ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुधुआय।
छूट पड़े या विरह से, जो सगरी जरि जाय ।।"
आचार्य जी आपने एक बर्बाद जाते जीवन को जीना सिखाया है।
रेंगते और घिसटते हुए को आसमान की ओर देखना सिखाया है।
आंसू नहीं थम रहे, आपने आंसुओं के साथ गलना सिखाया है।
🙏🙏🙏
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Posted by Shashi Bhaiya on Acharya Prashant App.
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नमस्ते आचार्य जी 🙏
नमस्ते गीता कम्युनिटी की सभी प्रतिभागियां
आप लोगों के साथ मैं एक बात शेयर करने जा रही हूं,
मेरे काम के दौरान समय बचाना बहुत महत्वपूर्ण है।
लेकिन मेरे बेटे भी हैं उनकी पढ़ाई और लाने जाने की एक झंझट रहती है प्राइवेट स्कूल इन में समय जय होते हैं और मैं पहले साइकलिंग करके इनको हैंडल करती थी।
लेकिन उनमें समय बहुत लगता था।
फिर मैं स्कूटी चलाने के लिए सेशंस लिया है हालांकि उतना अच्छा अभी भी है नहीं।
काम के दौरान में सशक्त हो पाई हूं और इनमें से मैं अपना वाहन खरीदा हूं, हां हालांकि यहां पर थोड़ी सी मुझे उधार करना पड़ा है, लेकिन अभी समय बचा पाऊंगी।
मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि मैं कभी ऐसा कर पाऊंगी।
क्योंकि मैं बस आचार्य जी से मिलने से पहले थोड़ा सा ही काम करती थी वह भी घर पर सिलाई वाली काम करती थी।
लेकिन संस्था में ज्वाइन होने के बाद धीरे-धीरे खुद की सोच सकते कारण पर ध्यान भी दे पा रही हूं और और हां मन में साहस भी आ रही है,
मैं सीख सकती हूं मैं कर सकती हूं अपने जीवन को मैं बदल सकती हूं, आचार्य जी की शिक्षाओं ने मुझे यह शिक्षा दिए हैं कि संभव है अगर हम चाहे। बस यहां पर थोड़ी सी यही है कि बीच-बीच में मैं फिसल जाती हूं।
आचार्य जी की शिक्षाओं के बगैर यह सारी चीज मुझझे नहीं हो पाते ।
संस्था को बहुत-बहुत बहुत ज्यादा धन्यवाद मुझे सशक्त बनाने के लिए मैं यहां की लायक भी नहीं हूं फिर भी मुझे सीखाने के लिए।
#AcharyaPrashant #WomenEmpowerment
Posted by Priya Majumder on Acharya Prashant App.
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*पाओ और गाओ*
बहुत बार संघर्ष की एक छवि मन में ऐसी चढ़ जाती है कि लगता है, बस खुद को मार-मार कर ही यह रास्ता पार करना पड़ेगा। मगर असल बात तो यह है कि कई बार ऐसी बहुत-सी सरल मौजें होती हैं, जिनका मुझे पता भी नहीं होता कि मुझे मिल रही हैं, पर आस-पास वालों के लिए वे बहुत असंभव-सी हैं।
मन में कोई बात ज़्यादा ठहरती नहीं। काम कोई जगह ही नहीं देता कि कचरे में भी ज़्यादा लोट लूँ।
फ़ालतू विचारों का समय नहीं है। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, कुछ पता नहीं चल रहा। दिन से शाम हो जाती है। लोग जब घर में सोने को होते हैं, तब मैं गाड़ी घुमा रही होती हूँ। 😅
अकेले रहती हूँ, थक जाती हूँ, सो जाती हूँ। कमाल है!
घर में माँ-बाप को देखती हूँ: हर रात किसी बात पर लड़ते रहते हैं, बकवास TV shows, कोई फ़ालतू ज्ञान देता हुआ आदमी, और घंटों बस सोफ़े पर पड़े-पड़े 🦥
मुझे 30 घंटे का हिसाब रखने की आदत हो गई है, और यहाँ घंटे यूँ ही चले जा रहे हैं।
बचपन में स्पोर्ट्स में बहुत bullying हुई थी, तो मैंने स्पोर्ट्स लगभग छोड़ ही दिया था। अब अकेले टेनिस खेलने जाती हूँ, मज़ा आता है। 🎾
और भी बातें होंगी। अब गाते रहेंगे। अगली बार जब शंका उठे, तो बहाना कम मिले।
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Posted by Kriti on Acharya Prashant App.
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*महिलाओं से खास तौर पर बोल रहा हूँ।*💬
*कोमलता प्रेम में शोभा देती है,*
*शरीर को कोमल मत बना लीजिए।*
*~ आचार्य जी 🙏🏻*
_~चल रहे वेदांत संहिता सत्र से 💫_
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Posted by Kalpana on Acharya Prashant App.
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*बुक स्टाल- एक दर्पण* 🪞
हैमबर्ग बुक स्टाल की कुछ तस्वीरें।
मेरी पहली बुक स्टाल थी ये और जितना मैंने सीखा है वहाँ पर, उतना सोचा भी नहीं था।
मुझे लगता था कि मुझे बहुत कुछ आता है पर वहाँ जाकर पता लगा कि कितने पानी में हूँ मैं। दूसरी तरफ़ ऐसे बिन्दु ख़ुद में देखने को मिले जो मैंने कभी नहीं सोचे थें।मुझमें कुछ योग्यताएँ भी हैं ऐसी मैंने नहीं सोचा था।
घर बैठे बैठे सत्र सुनकर लगता है कि सब आता है, हमें सब समझ आ रहा है और हम बेहतर हो रहे हैं पर वहाँ खड़े होकर लोगों को बताना एक अलग चुनौती है। खुद के लिए चुनौती कि हम कितना और कैसे लोगों को बता पा रहे हैं।
मैं अंत में उतना ही बता पाई जितना मैं खुद जीती हूँ। ये भी मैंने वही जाकर देखा।
अब और देखना और उस पर काम करना बाक़ी है।🙇🏻♀️💪🏼
जिन लोगों ने अभी तक बुक स्टाल में काम नहीं किया है वो एक बार जरूर करें ताकि उन्हें अपने बारे में बेहतर पता चले। जब आपके सामने लोग होते हैं और जबाब माँगते हैं तो झुन्नु ज़्यादा देर झूठ नहीं बोल पाता है बल्कि फिर जो निकलता है उसमें हमारा अहंकार बहुत क्षीण होता है।अहंकार को सीधा चुनौती मिलती है।
✨🪔✨
ख़ासकर लड़कियाँ ज़रूर जाये बुक स्टाल पर। हम इतने अलग अलग तरह के लोगो से बात करते हैं जिससे हमारी अपनी मान्यताएं टूटती हैं।
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Posted by Anamika Tiwari on Acharya Prashant App.
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🩸 जीवन घाव है।
🩸 जीवन रक्त है।
⚔️ जीवन संघर्ष है।
🖤 जीवन दुःख है।
इनमें से किसी से भी भागने की कोशिश करके मुक्ति नहीं मिलेगी।
अहंकार-शून्यता मत माँगो। 🪞
मुक्ति मत माँगो। 🕊️
सच्चा प्रेम मत माँगो। ❤️🔥
संघर्ष को ही अपनी जीवनशैली बना लो। 🔥
ऐसा विशाल हृदय माँगो, जो इन सबके बीच भी मुस्कुराता रहे। 🫀✨
तुम्हारा संघर्ष ही तुम्हारी एकमात्र मुक्ति है। ⚔️
बस, यही अधिकतम है। 🖤
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Posted by Akshada on Acharya Prashant App.
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बँधे हुए होने पर भी
लड़ते रहने का
साहस माँगो।
उस जज़्बे को माँगो,
उस दृढ़ता को माँगो।
शांति, मुक्ति या सच्चे प्रेम के
अपने अनुभवों को लेकर
बेहद संशयशील रहो।
संघर्ष को ही अपनी जीवनशैली बना लो।।
🙏
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Posted by Raghav on Acharya Prashant App.
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✨ *अगर कृष्ण जीवन में आते हैं, तो राजा बनकर आते हैं।*✨
फिर आपकी दुनिया आपके हिसाब से नहीं, उनके हिसाब से चलती है।
*कृष्ण भीतर आ गए, तो बाकी सब बाहर जाना पड़ेगा।*
कृष्ण बाकी सब बर्दाश्त ही नहीं करते। कहते हैं—
*“या तो मुझे रख लो या ये गंदगी रख लो।”*
और जिसने गंदगी से आसक्ति कर ली,
*उसने कृष्ण के लिए अपने द्वार बंद कर दिए।*
इसलिए सवाल बस इतना है—
*आपकी ज़िंदगी के फैसले आप करेंगे या कृष्ण?*
🙏🏻🪔
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*अपने दुःख से इश्क़ करना ❤️🔥*
जीवन खून, पसीना और आँसुओं से बना है।
इसे वैसे ही स्वीकार कर लो।
धैर्य, बड़ा दिल, ईमानदारी,
और तब भी लड़ते रहने का दम माँगो
जब तुम्हारे पास कुछ बचा ही न हो।
मुक्ति मत माँगो।
ऐसी जुझारू भावना माँगो जो बंधी होने पर भी लड़ती रहे।
कड़ी मेहनत को ही जीवन का तरीका बना लो।
तुम्हारा संघर्ष ही तुम्हारा एकमात्र उद्धार है।
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